ठीक है सैनिक देश के खातिर बलिदान देने के लिए ही सीमा पर जाते है।यह भी सच कि देशभक्ति की लहर देश की आम जनता के दिलों से ही होकर गुजरती है।यह भी सच है कि जो करोड़ों रूपए बर्बाद करके आयोजित तिरंगा यात्राओं से देशभक्ति की बयार पैदा नहीं कर पाए वो गरीब देशवासियों के बेटों की थमती सांसों ने करके दिखा दिया।उरी आतंकी हमले से पहले भी बहुत इस देश के लिए कुर्बान हुए व् आगे भी कुर्बान होने के लिए देशभक्तों की युवा फ़ौज हरदम,हरकदम,हर मोड़ पर तैयार खड़ी है लेकिन बिना युद्ध के कब तक इस तरह बलिदान देने होंगे? सीमा के उस पार जंगलराज है।जनता डरी-सहमी है।जनता के नाम पर मानवता के वहसी दरिंदों के हाथों में सत्ता है।हम संप्रभु देश होने के कारण इस असमंजस में फंसे हुए है कि इन दरिंदों के कारनामों की सजा पाकिस्तान के नागरिकों को दे या कुछ अलग रास्ता अपनाये!सीधा युद्ध दोषियों को सजा देगा व् कूटनीतिक युद्ध वहां के नागरिकों को,आम जनता को,निर्दोष गरीबों को तिल-तिलकर मरने को मजबूर कर देंगे।अगर हम एक कमजोर,दलदल में डूबे देश से,जिसमे पता है कि जीत हमारी ही होगी लेकिन सीधी लड़ाई करने में कतराते है क्योंकि हम जानते है कि युद्ध हमे दशकों पीछे धकेल देगा।गरीब-निरक्षर जनता को बुनियादी सुविधाएं हासिल करने की दौड़ से बाहर कर देंगे तो सोचो उस देश की हालत क्या होगी जो दूसरों की रहमत से जिन्दा है,दूसरों की खैरात को गरीबों के बजाय इन दरिंदों पर लुटा रहा है?
मैं मानता हूँ कि शहीदों की शहादत पर लगाम लगनी चाहिए क्योंकि दोनों तरफ शहीद होने वाले वतन की मिट्टी से मोहब्बत करने वाले लोग है।शहीदों की चिताओं पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले लोग दोनों तरफ की सत्ता पर काबिज है।जो गुस्सा उरी अटैक के बाद सीमा के इस पार भड़का है वो सिर्फ और सिर्फ आम जनता,गरीबों,किसानों का गुस्सा है क्योंकि उन्होंने अपने घरों के चिराग गवांए है।सीमा के उस पार बैठे हुक्मरान जनता की नहीं ,कुर्सी की चिंता में सिमटे हुए है।अगर नवाज शरीफ सेना-आईएसआई-आतंकवादियों की भाषा नहीं बोलते तो न्यूयार्क से इस्लामाबाद लौटने के बजाय अमेरिका में राजनीतिक शरण मांगते नजर आते!ऐसे बिगड़ैल पडौसी की हरकतों का इलाज क्या हो?सवाल बड़ा गंभीर व् उलझा हुआ है क्योंकि हम मानवता,इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानने वाले लोग जंग के मैदान में खड़े है तो स्वभाविक है कि ऐसे जटिल सवालों से हमे सामना करना ही होगा!मानवता के दुश्मन सीमा के इस पार भी कम नहीं है जो हम एकतरफा सोच में सिमटकर "कर चले फ़िदा तन साथियों,अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों"की धुन में नाचते हुए मानवता के पागलपन की हदें पार करते हुए चलते रहे! मैंने हर बार कहा कि यह मुर्दों का देश है उसका मतलब है कि इस देश की जनता वीर है लेकिन सत्ता मुर्दों के हाथों में है।मुर्दों का देश मातम मनाने में माहिर है इसका मतलब देश का हर तंत्र देश की जनता के जज्बातों के साथ भावनात्मक अत्याचार करके सत्ता पर कब्ज़ा बरकरार रखने की कोशिश में लगा रहता है और यही कारण है कि हम सही मौके पर सही निर्णय नहीं ले पाते।18जवानों की मौत के बाद तुरंत हमारी सेनाओं को हिसाब चुकता करना चाहिए था लेकिन अनिर्णय की अवस्था ने हमे सही कार्य से वंचित कर दिया।हिंसा का जवाब हिंसा से,हिंसा का जवाब दोषियों से,हिंसा का जवाब समयबद्ध तरीके में ही लिया जाना चाहिए।घटना के 72घंटों के बाद जो भी निर्णय लिए जाते है वो सत्ता व् पूंजी के नफे-नुकसान के हिसाब से लिए जाते है जिसमे मरना गरीब-किसान व् आम जनता को ही पड़ता है चाहे सीमा के इस पार हो या उस पार और हुक्मरान सत्ता बरकरार रखने के नुस्खों को आजमाने में लग जाता है।उरी में आतंकी हमले के बाद के हालातों का समयबद्ध तरीके से अपने हिसाब से विश्लेषण कीजिये व् किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश कीजिये।
जो टीवी-अख़बारों में बुद्धिजीवी लोग आये है वो मौसमी कीड़े है।हर घटना व् मौसम के हिसाब से नए-नए कीड़े आते रहते है।हमने बचपन में बरसाती मौसम में तमाम कीड़ों की प्रजातियों को नजदीकी से देखा है।खेत की मेड पर खड़े होकर इनके आगमन का स्वागत भी किया है।हम बखूबी जानते है कि ये थोड़े समय के मेहमान मात्र है।हम तो अनादि काल से ऐसी प्रजातियों के दर्शन के अभ्यस्त हो चुके है।हमे पता है कि ये जिस तेजी से आये है उससे दुगुनी तेजी से गायब हो जायेंगे इसलिए इनके जज्बाती नारों,घड़ियाली आंसुओं में बहने की कोई जरूरत नहीं है।हम इंसानियत-मानवता में भरोसा करने वाले लोग है लेकिन दोषी को सजा हर हाल में,तत्काल मिले!इसके हिमायती है.
मैं मानता हूँ कि शहीदों की शहादत पर लगाम लगनी चाहिए क्योंकि दोनों तरफ शहीद होने वाले वतन की मिट्टी से मोहब्बत करने वाले लोग है।शहीदों की चिताओं पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले लोग दोनों तरफ की सत्ता पर काबिज है।जो गुस्सा उरी अटैक के बाद सीमा के इस पार भड़का है वो सिर्फ और सिर्फ आम जनता,गरीबों,किसानों का गुस्सा है क्योंकि उन्होंने अपने घरों के चिराग गवांए है।सीमा के उस पार बैठे हुक्मरान जनता की नहीं ,कुर्सी की चिंता में सिमटे हुए है।अगर नवाज शरीफ सेना-आईएसआई-आतंकवादियों की भाषा नहीं बोलते तो न्यूयार्क से इस्लामाबाद लौटने के बजाय अमेरिका में राजनीतिक शरण मांगते नजर आते!ऐसे बिगड़ैल पडौसी की हरकतों का इलाज क्या हो?सवाल बड़ा गंभीर व् उलझा हुआ है क्योंकि हम मानवता,इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानने वाले लोग जंग के मैदान में खड़े है तो स्वभाविक है कि ऐसे जटिल सवालों से हमे सामना करना ही होगा!मानवता के दुश्मन सीमा के इस पार भी कम नहीं है जो हम एकतरफा सोच में सिमटकर "कर चले फ़िदा तन साथियों,अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों"की धुन में नाचते हुए मानवता के पागलपन की हदें पार करते हुए चलते रहे! मैंने हर बार कहा कि यह मुर्दों का देश है उसका मतलब है कि इस देश की जनता वीर है लेकिन सत्ता मुर्दों के हाथों में है।मुर्दों का देश मातम मनाने में माहिर है इसका मतलब देश का हर तंत्र देश की जनता के जज्बातों के साथ भावनात्मक अत्याचार करके सत्ता पर कब्ज़ा बरकरार रखने की कोशिश में लगा रहता है और यही कारण है कि हम सही मौके पर सही निर्णय नहीं ले पाते।18जवानों की मौत के बाद तुरंत हमारी सेनाओं को हिसाब चुकता करना चाहिए था लेकिन अनिर्णय की अवस्था ने हमे सही कार्य से वंचित कर दिया।हिंसा का जवाब हिंसा से,हिंसा का जवाब दोषियों से,हिंसा का जवाब समयबद्ध तरीके में ही लिया जाना चाहिए।घटना के 72घंटों के बाद जो भी निर्णय लिए जाते है वो सत्ता व् पूंजी के नफे-नुकसान के हिसाब से लिए जाते है जिसमे मरना गरीब-किसान व् आम जनता को ही पड़ता है चाहे सीमा के इस पार हो या उस पार और हुक्मरान सत्ता बरकरार रखने के नुस्खों को आजमाने में लग जाता है।उरी में आतंकी हमले के बाद के हालातों का समयबद्ध तरीके से अपने हिसाब से विश्लेषण कीजिये व् किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की कोशिश कीजिये।
जो टीवी-अख़बारों में बुद्धिजीवी लोग आये है वो मौसमी कीड़े है।हर घटना व् मौसम के हिसाब से नए-नए कीड़े आते रहते है।हमने बचपन में बरसाती मौसम में तमाम कीड़ों की प्रजातियों को नजदीकी से देखा है।खेत की मेड पर खड़े होकर इनके आगमन का स्वागत भी किया है।हम बखूबी जानते है कि ये थोड़े समय के मेहमान मात्र है।हम तो अनादि काल से ऐसी प्रजातियों के दर्शन के अभ्यस्त हो चुके है।हमे पता है कि ये जिस तेजी से आये है उससे दुगुनी तेजी से गायब हो जायेंगे इसलिए इनके जज्बाती नारों,घड़ियाली आंसुओं में बहने की कोई जरूरत नहीं है।हम इंसानियत-मानवता में भरोसा करने वाले लोग है लेकिन दोषी को सजा हर हाल में,तत्काल मिले!इसके हिमायती है.
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