वो चीखती रही,चिल्लाती रही और मर्दानगी मरती रही

यह घटना जंगलों में गुम गाँव,घाटी में छिपे बसेरे या तलहटी में तड़पती बस्ती की नहीं है।यह घटना 21वीं सदी की दुनियां में नुमाइंदगी करने वाले देश की राजधानी की है।21वर्षीय लड़की पर 34वर्षीय शादीसुदा दरिंदा बुराड़ी में बीच रोड़ पर, भोर की किरणों के बीच 8बजे कैंची से ताबड़-तोड़ हमला कर रहा था और आधुनिक,उच्च शिक्षित,उच्च सभ्य लोग उसकी दरिंदगी को देखते हुए,अपनी नामर्दानगी पेश करते हुए गुजरते गये।एक अबला इस मेट्रो शहर के खोखले दावों-खोखले वादों से रूबरू होते हुए देश के माथे-मुंह पर कालिख पोतकर रुखसत हो गई लेकिन देश के हुक्मरानों,अपने अहम में डूबी दिल्ली पुलिस व् देश की संस्कृति व् मानव सभ्यता को दिशा देने की बात करने वाले धर्मगुरुओं की छिपी हकीकत दुनिया के सामने उजागर कर गई। न अपने आप को नंबर -1 कहने वाले दलाल मीडिया का दिल पसीजा और न दिल्ली जैसे शहरों में सोफे पर बैठकर हमेशा गरियाने वाले नकली देशभक्तों का मुंह खुला।जिस देश में नेता जवान,किसान,महिला के मुद्दों को चुनावी समर में भुनाने की फ़िराक में हो उस देश का गर्त में खिसकना निश्चित है। आज यह लड़की मरी है,कल कोई और मरेगी!कड़ी निंदा होगी!दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा!कानून अपना काम करेगा!पीड़ित परिवार की हरसंभव मदद करेंगे आदि वक्तव्य आ जायेंगे लेकिन राजधानी की मुख्य रोड़ पर जो कानून का जनाजा निकला है उसका सन्देश हर नागरिक के दिलो-दिमाग का प्रदर्शन है जिसे सत्ता में बैठे लोगों को समझना चाहिए।क्यों लोग पास से गुजर रहे थे लेकिन बीच-बचाव करने नहीं आये?क्यों सनकी किस्म का दरिंदा  इतना हौंसला जुटाने में सफल हो गया कि भरी सड़क पर एक लड़की को मारने पर उतारू हो गया?स्कॉटलैंड पुलिस की तर्ज पर सुरक्षा का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस कहाँ थी?इस दरिंदगी के बाद भी दिल्ली के नागरिकों की संवेदना क्यों खामोश हो गई?पहले भी दिल्ली में ऐसी घटनाएं हुई लेकिन हम सबने उससे सबक क्यों नहीं लिया?बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों हो जाती है? जो स्मार्ट सिटी की हर महीने बौछारे हो रही है वो देश की राजधानी का प्रतिबिंब ही होगी।जब राजधानी कलंकित है,दरिंदों-गुंडों के हाथों में नाच रही है तो नहीं चाहिए ऐसे शहर जो महिला को महिला की इज्जत न दे सके!नहीं चाहिए हमे ऐसे शहर जहाँ के नागरिक कानून से कम गुंडों से ज्यादा डरकर खामोश हो जाए!नहीं चाहिए ऐसे शहर जहाँ मानवता ही बीच सड़क पर दम तोड़ दे और कानून-सत्ता असुरी मुस्कान के साथ वातानुकूलित कमरों में बैठकर हाई लेवल मीटिंगों के नाम पर मस्कारे मारती रहे!नहीं चाहिए सड़कों पर दूधिया रौशनी जिसकी चकचौन्ध के बीच माँ-बहनों की इज्जत ही लुट जाये!घर में माँ महफूज नहीं,सड़क पर बहन सलामत नहीं,दफ्तर में पत्नी सुरक्षित नहीं! क्या करेंगे हम आधुनिकता के बदबूदार फूलों को सजाकर?जरा सोचिए! ऐसी हृदय-विदारक घटना पर कोई सभ्य समाज कैसे खामोशी की चादर ओढ़कर सो सकता है?कैसे कानून के हाथ राजनीति के खोलते तेल में जलकर खाक हो जाते है?कैसे हुक्मरानों का कलेजा अपने बेटे-बेटियों के चेहरे की मुस्कान तक सिमटकर रह जाता है?कैसे पुलिस वाले अपनी माँ-बहन के चेहरे को आँखों में देखते हुए ऐसी घटनाओं पर ऊपरवाले के आदेशों की गुलामी में भविष्य तलाशने लग जाते है?यह मानवता का क्षरण है,यह देश की दुर्गति की मिसाल  है, कितनी ही तरक्की व् तकनीक हासिल कर लो लेकिन इंसानियत का इस तरह कत्ल होगा तो भविष्य  अंधकारमय ही होगा।इन सभी दुविधाओं-समस्यायों-नाकामियों-संवेदनहींताओं का प्रदर्शन ही इस लड़की की मौत ने हमारे सामने प्रस्तुत किया है....
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