सामाजिक कुरीति मृत्युभोज

आजकल विकास व् तकनीक के बल पर आगे बढ़ते समाज में रूढ़िवादी व् विज्ञानं की कसौटी पर असफल सामाजिक कुरीति मृत्युभोज का सिलसिला जारी है।सदियों से चलती आ रही इस कुप्रथा को रोकने की थोड़ी बहुत सुगबुगाहट होती भी है तो भी लोग यह सोचकर चुप हो जाते है कि कहीं मुझे समाज विरोधी का तमगा न मिल जाये।इस प्रथा को समझने के लिए आपको कोई भौतिक विज्ञानं या रसायन विज्ञानं पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। आप जरा अपने आसपास किसी मरे हुए जानवर को देख लीजिये।जहाँ कुत्ते व् कौवे कंकाल को नोचते हुए नजर आ जायेंगे।यहाँ फर्क इतना ही है कि मरने वाले की जगह पीछे जिन्दा बचे उनके बेटों व् बेटियां के जीते जी तन को नोचा जाता है।मृत्युभोज का इतिहास बहुत लंबा है।किसी को कुछ पता नहीं है।शव दफ़नाने व् जलाने के सबूत तो हड़प्पा सभ्यता में भी मिलते हैलेकिन मृत्युभोज के नही।मानव एक सामाजिक प्राणी है।

किसी के सुख-दुःख में शामिल होना एक नैतिक कर्तव्य है।होना भी चाहिए लेकिन आज जिस प्रकार इस 
कुरीति को बढाने की जो प्रतिस्पर्धा मची है,वो वाकई शर्मनाक है। अगर घर में किसी कमाने वाले की मौत हो जाये,तो उनके बीवी ,बच्चों के भविष्य पर अँधेरा छा जाता है।एकदम संघर्ष के लिए तैयार भी नहीं होते।ऐसी विपदा के समय समाज को उस परिवार का जहाँ सहारा बनने की जरुरत होती है वो ही समाज उस दुःखी व् व्यथित परिवार को लूटने के मौके के तौर पर देखना शुरू कर देता है।साहूकार जिसने बच्चों की पढाई के लिए चंद रूपए उधार देने के बजाय दर से खाली हाथ लौटा दिया,आज वो ही इस कुप्रथा का तारणहार बनकर खड़ा हो जाता है।समाज के लोग गारंटर बन जाते है।काश ऐसी तत्परता उसके जीते जी दिखाई होती तो मरने वाला शायद आज हमारे बीच में ही होता। आज बड़ी-बड़ी बाते तो हर जगह सुनने को मिलती है लेकिन वास्तविकता के धरातल पर हिम्मत नहीं कर पाते या यूँ कहूँ कि एक जगह आधुनिक दिखने के लिए थोड़ी जबान को धार दे देते है लेकिन हकीकत में विरोध करने की मंशा ही नहीं होती।ख़ुशी के पलों में तो खाने-पीने का शौक हर सामान्य इंसान का होता है लेकिन किसी के घर में किसी की मौत हो जाये और लोग उसके पीछे खाने को टूट पड़े तो अपने आप को मानव कहने में भी शर्म आती है।क्या रश्म है?क्या रीति है?अशिक्षा,अज्ञान में लिपटे पूर्वजों की यह कुप्रथा आज शिक्षित व् आधुनिक कहे जाने वाले 21वीं सदी के लोगों द्वारा भी बदस्तूर जारी है। एक तरफ लोकतंत्र के नाम पर पश्चिमपरस्त भोगवादी संस्कृति तो दूसरी तरफ रूढ़िवादी कुप्रथाओं व् पुरातनपंथी सोच के बीच झूलता,झुंझलाता हमारा समाज।पहले वाले पाखंडियों के जाल से बाहर निकल पाये नहीं और ऊपर से पूंजीपतियों का नया जाल।लेकिन इस जकड़न को दूर करना ही होगा।हिम्मत दिखानी ही होगी।आज कोई राजा राम मोहनराय रॉय वापिस नहीं आएंगे।उनको प्रेरणा स्रोत मानकर खुद को आगे बढ़ना होगा।हम खर्चा करने वाले का हाथ नहीं पकड़ सकते,हम समाज के जिद्दी व् दुश्मन लोगों का मुंह भी बंद नही कर सकते लेकिन एक छोटी सी शुरुआत तो कर ही सकते है कि दुःख की घडी में परिवार वालों के दुःख में जरूर शामिल होऊंगा लेकिन मातम मना रहे उस घर में पानी तक नहीं पिऊंगा। एक छोटी शुरुआत बड़ा बदलाव ला सकती है।बस कुछ करने की मंशा होनी चाहिए।सच की धार पर चलने का जज्बा होना चाहिए।

आपके अंदर जागता हुआ जमीर होना चाहिए।समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता होनी चाहिए।बदलाव लाने की 
चाहत होनी चाहिए।मजबूत दीवार कंकड़ व् छोटे-छोटे पत्थरों के टुकड़ों की नींव पर ही खड़ी होती है।आपके अंदर वाकई इस कुप्रथा को मिटाने की इच्छा हो तो आप इस छोटी सी शपथ से बहुत बड़ा बदलाव ला देंगे। ''मैं शपथ लेता हूँ आज के बाद किसी भी मृत्युभोज में शामिल होकर खाना नहीं खाऊंगा।
https://sunilmoga.blogspot.com/
Add caption

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts