जरा सोचिये।जिसको किसानी-खेती से कोई लेना देना नहीं वो खेतों की खाक छान रहा है।झुग्गियों में रहने वालों की कभी सुध नहीं ली,वो आज दो कमरों के मकान वालों का हितैषी बन रहा है।तो क्या देश की राजनीति सिर्फ हितैषी दिखने मात्र तक की रह गई?जंतर-मंतर पर एक आदमी मर जाता है।रैली किसानो की थी तो तत्काल किसान घोषित करके आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच सब मुआवजा देने पहुँच गए।ऐसे विलाप हुआ कि शायद आत्महत्या करने वाला यह पहला और अंतिम किसान है।
क्या कुछ बदला है उसके बाद।जरा रोज के अख़बार व् अन्य माध्यम से सजग रहिये और देखते जाइये।एक दिन ऐसा नहीं मिलेगा,जिस दिन किसी किसान ने आत्महत्या न की हो।लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पीपली लाइव कभी नहीं बनाया।क्या माने?मरने वालों को दिल्ली आकर मरना चाहिए?नहीं ।आत्महत्या कायरता है।पहले कारण को ढूंढो।उसका निदान पहले करो।जाते-जाते कुछ बोझ साथ ले जाना चाहिए।बात किसी पार्टी विशेष की नहीं है।हमाम में सब नंगे है। 2012 में एक लड़की की दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के बाद बेदर्दी से हत्या कर दी गई।जमकर हंगामा हुआ।सारे अति महत्वाकांक्षी लोगों ने बहुत विलाप किया था।ऐसा लगा कि आगे बहन बेटियां सुरक्षित हो जायेगी।लेकिन समय के साथ वो भ्रम भी दूर हो गया।आज भी रिकॉर्ड के अनुसार हर दो घंटे में तीन औरतें दरिंदगी का शिकार होती है। जो मोगा में ऑर्बिट बस में हुआ उस पर हंगामा इसलिए मचा,क्योंकि वह बस पंजाब के उप- मुख्यमंत्री की कंपनी की है।तो दरिंदगी पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की पूरी-पूरी सम्भावना नजर आ गई।रोज बसों में छेड़कानी होती है।किसी को क्या मतलब। देश की राजधानी में कोई घटना घटे व् राजनीति की पूरी सम्भावना हो तभी हंगामा मचता है।आज भी दिल्ली में बलात्कार बदस्तूर जारी है।लेकिन अभी कोई चुनाव नहीं है तो क्यों कोई समय ख़राब करेगा।चुनाव पंजाब में होने वाले है तो सारे भागकर मोगा पहुँच गए।लोकतंत्र की इसके रखवाले ही इस तरह हत्या करते रहेंगे तो हम से भरोसे व् विश्वास की कसमें दिलाने का भ्रम क्यूँ पाला जाये?जनता सब जानती है। पिछलों का हिसाब चुकता कर दिया है।अब बारी वर्तमान में मौज उड़ाने की फ़िराक में फंसे हुक्मरानों की है।अगर जनता नादान होती तो आज एसी के कमरों से निकालकर तपती धुप में खेतों की खाक कौन छानने जाये! सजग रहिये,जागरूक रहिये।हुक्मरान आज भी मध्यकाल में जी रहे है।वो सोचते है कि मैंने जो कह दिया,जनता दैवीय प्रसाद मानकर स्वीकार कर लेगी। लेकिन आज हर जगह से जागरूक लोग आगे आ रहे है।उम्मीद है जनता को बिना हवाई सपने दिखाए जागरूक करते रहेंगे।बाकी जनता अपना फैसला खुद दे देगी....
क्या कुछ बदला है उसके बाद।जरा रोज के अख़बार व् अन्य माध्यम से सजग रहिये और देखते जाइये।एक दिन ऐसा नहीं मिलेगा,जिस दिन किसी किसान ने आत्महत्या न की हो।लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पीपली लाइव कभी नहीं बनाया।क्या माने?मरने वालों को दिल्ली आकर मरना चाहिए?नहीं ।आत्महत्या कायरता है।पहले कारण को ढूंढो।उसका निदान पहले करो।जाते-जाते कुछ बोझ साथ ले जाना चाहिए।बात किसी पार्टी विशेष की नहीं है।हमाम में सब नंगे है। 2012 में एक लड़की की दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के बाद बेदर्दी से हत्या कर दी गई।जमकर हंगामा हुआ।सारे अति महत्वाकांक्षी लोगों ने बहुत विलाप किया था।ऐसा लगा कि आगे बहन बेटियां सुरक्षित हो जायेगी।लेकिन समय के साथ वो भ्रम भी दूर हो गया।आज भी रिकॉर्ड के अनुसार हर दो घंटे में तीन औरतें दरिंदगी का शिकार होती है। जो मोगा में ऑर्बिट बस में हुआ उस पर हंगामा इसलिए मचा,क्योंकि वह बस पंजाब के उप- मुख्यमंत्री की कंपनी की है।तो दरिंदगी पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की पूरी-पूरी सम्भावना नजर आ गई।रोज बसों में छेड़कानी होती है।किसी को क्या मतलब। देश की राजधानी में कोई घटना घटे व् राजनीति की पूरी सम्भावना हो तभी हंगामा मचता है।आज भी दिल्ली में बलात्कार बदस्तूर जारी है।लेकिन अभी कोई चुनाव नहीं है तो क्यों कोई समय ख़राब करेगा।चुनाव पंजाब में होने वाले है तो सारे भागकर मोगा पहुँच गए।लोकतंत्र की इसके रखवाले ही इस तरह हत्या करते रहेंगे तो हम से भरोसे व् विश्वास की कसमें दिलाने का भ्रम क्यूँ पाला जाये?जनता सब जानती है। पिछलों का हिसाब चुकता कर दिया है।अब बारी वर्तमान में मौज उड़ाने की फ़िराक में फंसे हुक्मरानों की है।अगर जनता नादान होती तो आज एसी के कमरों से निकालकर तपती धुप में खेतों की खाक कौन छानने जाये! सजग रहिये,जागरूक रहिये।हुक्मरान आज भी मध्यकाल में जी रहे है।वो सोचते है कि मैंने जो कह दिया,जनता दैवीय प्रसाद मानकर स्वीकार कर लेगी। लेकिन आज हर जगह से जागरूक लोग आगे आ रहे है।उम्मीद है जनता को बिना हवाई सपने दिखाए जागरूक करते रहेंगे।बाकी जनता अपना फैसला खुद दे देगी....

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