साफा या पगड़ी तो आपने देखी होगी।हिंदुस्तानी पहनावे का गौरव जो सदियों से चला आ रहा है आज अंतिम साँसे गिन रहा है।पगड़ी सिर्फ एक पहनावा है।मैं भी शादी ब्याह में शामिल होता हूँ तो पहन लेता हूँ लेकिन जब तक वापिस घर की खूंटी में टांग न दूँ तब तक दिल में एक कसक सी रहती है।सोचता हूँ कि वाकई यह इज्जत वाली पगड़ी है या सिर्फ अहंकार भाव जगाने की रश्म मात्र!पुराने जमाने में पगड़ी के कई महत्व होते थे।सर्दी व् गर्मी से बचाव के साथ साथ सर पर बोझ उठाते समय सीधी चुभन को रोकने का काम भी करती थी। लेकिन आज हालात बदल चुके है।आज लोग पगड़ी का रूप देखकर इंसान की माली हालात का अंदाजा लगा लेते है।जब सभ्यता समाजवाद से पूंजीवाद की तरफ बढ़ रही हो तो इंसान का इज्जत से अर्थ की तरफ सोच का पलायन लाजमी है।आज शादी समारोह हो या कुछ और अवसर,बड़े बड़े खांटी राजनीतिज्ञ आते है और साफा पहनावे की रश्म अदायगी शुरू हो जाती है।फोटो खींचे जाते है।मीडिया में तस्वीरे प्रचारित होती है।इसी से रसूक तय होने लगता है।वार्डपंच से लेकर क्या सरपंच,क्या विधायक! सांसद हो या राजनीतिक पार्टियों के पदाधिकारी। सब अपनी भागीदारी निभाते ।जैसे ही जनता ने इनको चुन लिया,बस इनका यह धंधा शुरू हो जाता है।शुरुआती एक साल तो इसी के माध्यम से सम्बन्ध बनाने का काम होता है।
साफा पहनाते व् पहनते फोटो से जब तक इनके कमरे की दीवारें आबाद न हो जाये तब तक नेता होने के गुण में कमी सी लगती है।जब कार्यकाल पूरा हो जाता है तो अपने काम का आकलन कोई नहीं करता बस साफों की गिनती करते है।अगला चुनाव जब हार जाते है तो विपक्ष की भूमिका छोड़कर बार बार साफों की गिनती कर,अपना मन बहलाते है।खुद को फिर से प्रेरित करते है।पिछली बार इतने साफे इकट्ठे किये थे,अगली बार तो किसी तरह चुनाव जीतना ही है।जिन बड़े लोगों के साथ फोटो नही खिंचवा पाये,उनकी भरपाई अगली बार करनी होगी। साफों को देख देखकर तमाम सवाल जवाब खुद से ही करते रहते है। आज युवा लोग भी इसी साफामेनिया से पीड़ित हो रहे है।जहां देखो वहीं पगड़ी रोग से ग्रसित युवा लोग नजर आते है। भाई दुनिया में हर जगह आधुनिकता का दौर चल रहा हो वहां वापिस जड़ता की और लौटने की कहाँ जरुरत है।पगड़ी पहनकर अगर अपनी संस्कृति निभाने की डींग हांकते हो तो धोती कुर्ता भी पहनो।एक तरफ राजनीति को बदलने की बात करते हो तो फिर राजनीति की और कदम बढ़ाते ही जीन्स के ऊपर खालिस राजनीति की नुमाइंदगी करने वाली यह पगड़ी क्यों? आधुनिक दिखने के लिए जीन्स तो पहनोगे लेकिन राजनीति उसी पुराने ढंग से क्यों? मुझे पगड़ी पहनने वालों से कोई एतराज नहीं है।न मैं इस संस्कृति की पहचान व् पहनावे का विरोध करता हूँ।मुझे आपत्ति दिखावे का ढोंग रचाने से है।आप बहुत अच्छे नेता होंगे।आप बड़े बुद्धिजीवी होंगे।
आप बड़े अफसर होंगे लेकिन मेरी आपसे विनती है।इस पगड़ी को संस्कृति की पहचान रहने दो। इसे इज्जत का लक्षण रहने दो।अंत में इतना ही कहूँगा...और बेइज्जती सही जाये ना.....मेरी पोस्ट का सम्बन्ध किसी धर्म से नहीं है।मैं हर धर्म का उसी स्वरूप में आदर करता हूँ जैसा उनके अनुयायी मानते है।
साफा पहनाते व् पहनते फोटो से जब तक इनके कमरे की दीवारें आबाद न हो जाये तब तक नेता होने के गुण में कमी सी लगती है।जब कार्यकाल पूरा हो जाता है तो अपने काम का आकलन कोई नहीं करता बस साफों की गिनती करते है।अगला चुनाव जब हार जाते है तो विपक्ष की भूमिका छोड़कर बार बार साफों की गिनती कर,अपना मन बहलाते है।खुद को फिर से प्रेरित करते है।पिछली बार इतने साफे इकट्ठे किये थे,अगली बार तो किसी तरह चुनाव जीतना ही है।जिन बड़े लोगों के साथ फोटो नही खिंचवा पाये,उनकी भरपाई अगली बार करनी होगी। साफों को देख देखकर तमाम सवाल जवाब खुद से ही करते रहते है। आज युवा लोग भी इसी साफामेनिया से पीड़ित हो रहे है।जहां देखो वहीं पगड़ी रोग से ग्रसित युवा लोग नजर आते है। भाई दुनिया में हर जगह आधुनिकता का दौर चल रहा हो वहां वापिस जड़ता की और लौटने की कहाँ जरुरत है।पगड़ी पहनकर अगर अपनी संस्कृति निभाने की डींग हांकते हो तो धोती कुर्ता भी पहनो।एक तरफ राजनीति को बदलने की बात करते हो तो फिर राजनीति की और कदम बढ़ाते ही जीन्स के ऊपर खालिस राजनीति की नुमाइंदगी करने वाली यह पगड़ी क्यों? आधुनिक दिखने के लिए जीन्स तो पहनोगे लेकिन राजनीति उसी पुराने ढंग से क्यों? मुझे पगड़ी पहनने वालों से कोई एतराज नहीं है।न मैं इस संस्कृति की पहचान व् पहनावे का विरोध करता हूँ।मुझे आपत्ति दिखावे का ढोंग रचाने से है।आप बहुत अच्छे नेता होंगे।आप बड़े बुद्धिजीवी होंगे।
आप बड़े अफसर होंगे लेकिन मेरी आपसे विनती है।इस पगड़ी को संस्कृति की पहचान रहने दो। इसे इज्जत का लक्षण रहने दो।अंत में इतना ही कहूँगा...और बेइज्जती सही जाये ना.....मेरी पोस्ट का सम्बन्ध किसी धर्म से नहीं है।मैं हर धर्म का उसी स्वरूप में आदर करता हूँ जैसा उनके अनुयायी मानते है।
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