तारीख पर तारीख.......नहीं मिलता तो इंसाफ मी लार्ड

आजकल चौक-चौराहों पर बैठने वाले लोग किसी घटना का निर्णय एक ही सुनवाई में दे देते है ऐसे ही विचार-विमर्श को न चाहते हुए भी सुनता गया। दिमाग घूम गया एक की बात सुनकर! जब लोलु ने बोला की देखो भाई सबको पता है कि माल्या पैसा लूटकर भागा है। क्योंकि अगर लुटेरा न होता तो भागता क्यों? अगर ईमानदारी के साथ गया और पूरा हिंदुस्तान चोर चोर,लुटेरा-लुटेरा चिल्ला रहा था तो गुस्सा क्यों नहीं आया? क्योंकि ईमानदार को कोई चोर बोल दे तो सीने में आग लग जाती है आग!!!!
मानलो उसको गुस्सा आया तो वो गुस्से में जवाब देने के लिए भारत क्यों नहीं आया?

दूसरा बोला-अब देखो न्यायालय में सुनवाई होगी।लुटेरा है या नहीं उसके लिए सबूत पेश किये जायेंगे।
बड़े-बड़ेवकील सबूत पेश करने के लिए समय मांगेंगे और जज साहब तारीख पर तारीख देते रहेंगे और 
माल्या अय्यासीके अड्डे सजाता रहेगा।

तीसरा-अगर मुझे जज बना दिया जाये तो मैं तो लोलु की बात के हिसाब से ही सजा दे दूँ।जब वकील  
बोलेंगे किमी लार्ड मुझे और सबूत पेश करने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए तो मेरा निर्णय इस प्रकार होगा "तमाम गवाहों व् सबूतों के झंझटों को दरकिनार करते हुए माल्या दाना मांझी की पत्नी की लाश को कंधे परउठाकर 60किलोमीटर दूर उसके गांव तक पहुंचाकर आये और अगली तारीख पर सबूतों के साथ सात दिनोंबाद मेरे सामने पेश किया जाये"

यह चर्चा सुनकर मैं भी भौंचक सा देखता रह गया।बन्दे का आईडिया तो मस्त है। जब आरोपी का वकील सबूतों को इकट्ठा करने के लिए समय मांगे तो अगली तारीख तक जो समय मिलता है उस 
समय में आरोपी से 18 घंटे की कड़ी मजदूरी करवाई जाए।कूड़ा साफ़ करवाया जाए,मृत पशु उठवाए 
जाए फिर देखना उनके वकील जैसे ही समय मांगेंगे तो आरोपी चीखकर बोलेगा जज साहब मैं दोषी हूँ 
मुझे तिहाड़ जेल ही भेजा जाए! दूसरी तरफ पुलिस वक्त मांगे तो पुलिस वाले से तब तक रोज 18 घंटे  तक काम करवाया जाए जब तक वो पुरे सबूत पेश न कर दे!घर जाने के लिए एक दिन भी छुट्टी न दी  जाये !फिर देखना हर तीसरे दिन पुलिस वाला एक अपराधी की कॉलर पकड़कर जेल में धकेलता 
नजर आएगा। कहने का मतलब यह है कि आईडिया कहीं से भी मिल सकता है बस आपके अंदर ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिए। जब आपके मन में यह भावना आ जायेगी कि मैं ही एकमात्र 
बुद्धिजीवी व् सटीक निर्णय लेने वाला हूँ तो आपने अपने अंदर ज्ञान संग्रह करने व् सुधार करने की  गुंजाईश को ख़त्म कर दिया।कम बोलना व् ज्यादा सुनना ज्ञान को बढ़ाने का अचूक मन्त्र है।यदि किसी सभा में मंच से कोई ज्ञानी भाषण देता है तो उसका कतई यह मतलब नहीं है कि श्रोताओं की भीड़ में उससे ज्यादा कोई ज्ञानी नहीं है।हो सकता है माइक हाइजेक करने की एक कला कम है लेकिन बाकी कलाओं में उससे ज्यादा क्षमता रखता हो!भीड़ बनकर सुनना कोई आसान काम नहीं है।आपने देखा होगा मंच पर भाषण देने वाला जैसे ही माइक छोड़ता है तो वो दूसरों को सुनने के बजाय बाकी लोगों के साथ कानाफूसी करने लग जाता है और जाते समय गाडी में बैठकर गूगल गुरु से ज्ञान लेने लगता है। ऐसे लोग ही सत्ता को हाईजैक करके कानून बनाते है और न्याय व्यवस्था का बेडा गर्क कर जाते है फिर शुरू होता है तारीख पर तारीख,तारीख पर तारीख.......नहीं मिलता तो इंसाफ मी लार्ड!
https://sunilmoga.blogspot.com/
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