जब पम्पोर में सेना आतंकियों से लड़ रही थी उस समय पास की मस्जिदों से पाकिस्तान के समर्थन में नारे लग
रहे थे।पाकिस्तानी आतंकियों के शवों को अपने कब्जे में लेने के लिए अलगाववादियों ने खूब सुरक्षा बलों पर
पत्थरबाजी की। चंद देश विरोधी नारों से देश टूट जायेगा?मैं ऐसा नहीं मानता।1990 से कश्मीर में नारे लग रहे
है लेकिन अभी भी हमारा अभिन्न अंग है।देश की जनता की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सरकार
व् मनुवादियों द्वारा रची जा रही साजिश का शिकार मत होइए।हमे समाज में व्याप्त भेदभाव व् हर इंसान को
धर्म व् जाति के परे बराबरी का दर्जा हासिल करना है। इस देश में पूंजीपतियों व् नेताओं के बच्चे विदेशों में
पढ़ते है जिससे हमारे खून-पसीने की कमाई के लगभग 2लाख करोड़ रूपए ही बाहर नहीं जाते बल्कि हर देश
में हमारे देश की इज्जत बेच रहे है।लेकिन इन लोगों के पास हर साल देश में कुपोषण से मरने वाले बच्चों के
लिए रोज 16 रूपए प्रति बच्चे खर्च करने के लिए पैसे नहीं है। हर साल 16000 किसान आत्महत्या करते है
लेकिन सरकारें हर किसान के खेत तक पानी नहीं पहुंचा सकती।लेकिन जब दिल्ली में 24 घंटे पानी बंद हो
जाता है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री रात में कोर्ट भागे फिरते है।सेना भेजने की अपील करते है।पानी आने पर
शुक्रिया अदा करते है लेकिन किसानो का नाम आते ही नपुशंकता, फैशन,इश्क आदि पता नहीं क्या-क्या
बकने लग जाते है।कोई किसानो के खेत तक पानी पहुँचाने की बात नहीं करता।देश के 67 करोड़ लोग आज
भी खुले में शौच करने को मजबूर है लेकिन मीडिया सोच बदलो देश बदलो का स्लोगन लेकर अपनी सोच की
नीलामी कर देता है।15 करोड़ लोग पीने के पानी को हलक तक पहुँचाने के लिए रोज दो किलोमीटर पैदल
यात्रा करते है। हर साल 25 हजार महिलाये बलात्कार की शिकार हो जाती है लेकिन मीडिया व् कैंडल गैंग
निर्भया तक ही सीमित रह जाती है।कमेटी बन जाती है।कानून में संशोधन कर देती है लेकिन लकवा मार चुके
तंत्र में सुधार की बात कभी कोई नहीं करता।14 लाख लोग इलाज के अभाव में हर साल अस्पतालों की चौखट
पर दम तोड़ देते है लेकिन सरकारें चंद रूपए देकर इस तरह टेढ़ी नजर से देखती है जैसे भिखारी पीछे पड़
गए थे किसी तरह कटोरे में चवन्नी डालकर पीछा छूटा।हमे ऐसे मानसिक रोगियों से पीछा छुड़ाना जरुरी है।
अगर दो चार विलेन देश-विरोधी स्लोगन लेकर नारे लगाने लगे, मीडिया व् राजनीतिक पार्टियाँ टूट पड़े और
चारों तरफ देशद्रोही व् देशभक्ति की गूंज सुनाई देने लगे तो यकीन मानिए ये लोग आम जनता को मूलभूत
मुद्दों से भटकाने में सफल रहे है।जिसके घर शाम को रोटी बनाने को आटा न हो,रात को सोने के लिए छत व्
बिस्तर न हो,बच्चे भूख से बिलख रहे हो लेकिन इस देशभक्ति के खेल में उलझकर झाड़ियों के बीच में फंसे
मेंढक की तरह छलांग लगाने लग जाता है।आप खुद अपने आसपास के लोगों का विश्लेषण करके सच्चाई की
इस समय पुष्टि कर सकते हो।गरीब व् बेरोजगार ही ऐसी फर्जी देशभक्ति का शिकार होता है। आप जब तक
अपनी समस्याओं व् इनके वादों का हिसाब लेना शुरू नहीं करोगे तब तक ये लोग हमे इसी तरह आभासी
दुनियां में डुबकी लगवाते रहेंगे।जब हम खुद बेवकूफ बनने को तैयार बैठे है तो ये क्यों न कभी देशभक्ति का
सर्टिफिकेट दे या क्यों न धर्म का नशा करवाये? जरा सोचिये.
रहे थे।पाकिस्तानी आतंकियों के शवों को अपने कब्जे में लेने के लिए अलगाववादियों ने खूब सुरक्षा बलों पर
पत्थरबाजी की। चंद देश विरोधी नारों से देश टूट जायेगा?मैं ऐसा नहीं मानता।1990 से कश्मीर में नारे लग रहे
है लेकिन अभी भी हमारा अभिन्न अंग है।देश की जनता की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सरकार
व् मनुवादियों द्वारा रची जा रही साजिश का शिकार मत होइए।हमे समाज में व्याप्त भेदभाव व् हर इंसान को
धर्म व् जाति के परे बराबरी का दर्जा हासिल करना है। इस देश में पूंजीपतियों व् नेताओं के बच्चे विदेशों में
पढ़ते है जिससे हमारे खून-पसीने की कमाई के लगभग 2लाख करोड़ रूपए ही बाहर नहीं जाते बल्कि हर देश
में हमारे देश की इज्जत बेच रहे है।लेकिन इन लोगों के पास हर साल देश में कुपोषण से मरने वाले बच्चों के
लिए रोज 16 रूपए प्रति बच्चे खर्च करने के लिए पैसे नहीं है। हर साल 16000 किसान आत्महत्या करते है
लेकिन सरकारें हर किसान के खेत तक पानी नहीं पहुंचा सकती।लेकिन जब दिल्ली में 24 घंटे पानी बंद हो
जाता है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री रात में कोर्ट भागे फिरते है।सेना भेजने की अपील करते है।पानी आने पर
शुक्रिया अदा करते है लेकिन किसानो का नाम आते ही नपुशंकता, फैशन,इश्क आदि पता नहीं क्या-क्या
बकने लग जाते है।कोई किसानो के खेत तक पानी पहुँचाने की बात नहीं करता।देश के 67 करोड़ लोग आज
भी खुले में शौच करने को मजबूर है लेकिन मीडिया सोच बदलो देश बदलो का स्लोगन लेकर अपनी सोच की
नीलामी कर देता है।15 करोड़ लोग पीने के पानी को हलक तक पहुँचाने के लिए रोज दो किलोमीटर पैदल
यात्रा करते है। हर साल 25 हजार महिलाये बलात्कार की शिकार हो जाती है लेकिन मीडिया व् कैंडल गैंग
निर्भया तक ही सीमित रह जाती है।कमेटी बन जाती है।कानून में संशोधन कर देती है लेकिन लकवा मार चुके
तंत्र में सुधार की बात कभी कोई नहीं करता।14 लाख लोग इलाज के अभाव में हर साल अस्पतालों की चौखट
पर दम तोड़ देते है लेकिन सरकारें चंद रूपए देकर इस तरह टेढ़ी नजर से देखती है जैसे भिखारी पीछे पड़
गए थे किसी तरह कटोरे में चवन्नी डालकर पीछा छूटा।हमे ऐसे मानसिक रोगियों से पीछा छुड़ाना जरुरी है।
अगर दो चार विलेन देश-विरोधी स्लोगन लेकर नारे लगाने लगे, मीडिया व् राजनीतिक पार्टियाँ टूट पड़े और
चारों तरफ देशद्रोही व् देशभक्ति की गूंज सुनाई देने लगे तो यकीन मानिए ये लोग आम जनता को मूलभूत
मुद्दों से भटकाने में सफल रहे है।जिसके घर शाम को रोटी बनाने को आटा न हो,रात को सोने के लिए छत व्
बिस्तर न हो,बच्चे भूख से बिलख रहे हो लेकिन इस देशभक्ति के खेल में उलझकर झाड़ियों के बीच में फंसे
मेंढक की तरह छलांग लगाने लग जाता है।आप खुद अपने आसपास के लोगों का विश्लेषण करके सच्चाई की
इस समय पुष्टि कर सकते हो।गरीब व् बेरोजगार ही ऐसी फर्जी देशभक्ति का शिकार होता है। आप जब तक
अपनी समस्याओं व् इनके वादों का हिसाब लेना शुरू नहीं करोगे तब तक ये लोग हमे इसी तरह आभासी
दुनियां में डुबकी लगवाते रहेंगे।जब हम खुद बेवकूफ बनने को तैयार बैठे है तो ये क्यों न कभी देशभक्ति का
सर्टिफिकेट दे या क्यों न धर्म का नशा करवाये? जरा सोचिये.
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