26 नवंबर 1949 को जब भारत का संविधान अपनाया गया था तो वह दुनियां का सबसे बड़ा लिखित संविधान बन गया।अमेरिका,फ़्रांस,ब्रिटेन,रूस आयरलैंड आदि देशों के संविधान से अच्छी बातों को चुन-चुनकर इकट्ठा किया गया।संविधान बनाते समय जनप्रतिनिधित्व सिद्धांत को अपनाया गया संविधान पर जनमत संग्रह नहीं करवाया गया।उस समय अंग्रेजो की लंबी गुलामी के बाद देश गरीब व् देश की जनता ज्यादातर अनपढ़ थी। इसलिए जनमत को उचित नहीं समझा गया था।संविधान निर्मात्री सभा में ज्यादातर ब्रिटेन में पढ़े लिखे या ब्रिटिश व्यवस्था में पढ़े-लिखे लोग थे क्योंकि उस समय देशी शिक्षा व्यवस्था अपने वजूद को बचाने की जद्दोजहद में फंसी हुई थी।देश को गणतंत्र घोषित किया गया।समय के साथ गण भी बदला व् तंत्र भी बदला लेकिन जिस बदलाव की दरकार इस देश के शोषित समाज को थी,वह समयानुसार हो नहीं सकी। शुरुआती दौर में तंत्र को जिस मोटे परिवर्तन की दरकार थी वो हो नहीं पाया जिसके कारण गण भी अपने आप में बदलाव लाने का आदी नहीं हो पाया।धीरे-धीरे तंत्र भ्रष्टाचार की तो, गण नेताओं की गुलामी की भेंट चढ़ गया। गण व् तंत्र के बीच संघर्ष की शुरुआत हो गई। आज जब संविधान की प्रस्तावना को कोई युवा पढता है तो आज की समस्याओं व् परिस्थितियों में उलझे हुए नागरिकों को देखकर लगता है कि हमारे नेताओं ने आज तक गण अर्थात जनता के साथ सिर्फ भद्दा मजाक किया है।आज की राजनैतिक हकीकत व् सरकारी तंत्र की कार्यशैली को देखकर लगता है कि संविधान की उद्देशिका नागरिकों के लिए सिर्फ सपने बुनने का ग्रन्थ मात्र है जो कभी पुरे नहीं हो सकते।आप भी एक बार प्रस्तावना पढ़कर हालात को दिमाग में रखकर सोचिये कि क्या सही मायने में हम वाजिब दिशा में है या नहीं?."हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा इसके समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक व् राजनैतिक न्याय तथा विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास व् धर्म की उपासना की स्वतंत्रता,प्रतिष्ठा व् अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा व् राष्ट्र की एकता व् अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज 26 नवंबर 1949 ई.(मिति मार्गशीष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत,अधिनियमित व् आत्मार्पित करते है।" तत्कालीन परिस्थतियों व् देश के सामने उत्पन्न चुनौतियों को देखते हुए इससे बेहतर संविधान की आत्मा को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता था।लेकिन आज के हालात को देखता हूँ तो हमारा तंत्र रोज इस आत्मा की हत्या करता नजर आता है।गण अर्थात जनता भी कम दुर्भाग्यशाली नहीं है क्योंकि इन्होंने सिस्टम से कभी हिसाब मांगने की जहमत ही नहीं उठाई या अपने आप को अज्ञानता,धार्मिक उन्माद व् अंधविश्वासों से मुक्त करने की सच्ची कोशिश नहीं कर पाई।इसी का परिणाम है कि हम आज देश से प्यार तो करते है लेकिन तंत्र को सुबह-शाम गाली देते है।हम तिरंगे को सलाम तो करते है लेकिन वापिस मुड़कर खड़ी बुनियादी समस्याओं को देखकर जहाँ मौका मिलता है वहीँ अपनी नाराजगी जाहिर करने लग जाते है। आज हर संस्था की साख दांव पर है।जिसको जो कर्तव्य सौंपा गया,उसको निभाने में असफल रही है। जनता ने इनसे बहुत उम्मीदें पाली थी लेकिन हर जगह मायूसी ही हाथ लगी है।जिन हाथों में सपने साकार करने की जिम्मेवारी सौंपी गई उनमे से ही कुछ गद्दारों ने इनका सौदा कर डाला।ऐसा नहीं है कि इस प्रकार के लोग सिर्फ भारत में ही है बल्कि दुनियां के हर कोने में है लेकिन उनको सजा देने का स्तर सिर्फ भारत में ही इतना ख़राब है।जिम्मेदारी तय नहीं होती है।तंत्र इतना उलझा दिया गया कि कभी कोई काम समय व् गुणवत्ता साथ पूरा होता नहीं है और न ही जिम्मेदारों के ऊपर कोई कार्यवाही होती है। आज के समय संविधान की आत्मा ऊर्जावान युवाओं को पुकार रही है।देशप्रेम से औतप्रोत नौजवानों को अपना कर्तव्य याद दिला रही है। संविधान निर्माताओं के सपनों व् जनता की उम्मीदों को संविधान में बरकरार रखने के लिए हर नागरिक को अपने गिरेबान में झाँकने का सन्देश दे रही है।जब तक हम अपने देश के प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं निभाएंगे तो अधिकारों की मांग करना तो अपराध की श्रेणी में ही आएगा।तंत्र को गण के प्रति समर्पित करने की जिम्मेवारी हम सबके कन्धों पर है।अगर हम म्मेवारी से बचने की कोशिश में लग जायेंगे या हमे क्या है... इस तरह की मानसिकता से ग्रसित हो जायेंगे तो प्रस्तावना में हम भारत के लोग के बजाय हम कुलीन चोर लोग होते देर नहीं लगेगी। आइये हमारे देश व् खुद के भविष्य को उज्जवल बनाने की जिम्मेवारी उठाये ताकि इस देश का हर बच्चा,हर नागरिक तिरंगा उठाते समय लालच के बजाय अपने अंदर से गौरान्वित महशूस करे.........
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
Popular Posts
-
देश का प्रधानसेवक बोधि वृक्ष की पूजा कर रहा है , खजांची लंदन में गांधीजी की प्रतिमा का अनावरण कर रहा है और मुख्य विपक्षी संकट ग्रस...
-
हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत यहाँ की युवा पीढ़ी है. दुनिया में भारत एक मात्र ऐसा देश हैं जहाँ की सबसे ज्यादा आबादी युवा है जब भी किसी देश क...
-
सोनू दरभंगा बिहार से अपने गाँव के ठेकेदार के साथ दिल्ली आया था । पांच भाई बहनों में सबसे बड़ा था लेकिन उम्र यही 14 वर्ष के करीब थी । बाप की...
-
आज प्रथम विश्वयुद्ध हुए शताब्दी बीत चुकी है इस विश्व युद्ध में पूरे विश्व को कितना संकट झेलना पड़ा इसका अंदाजा आप इस पोस्ट में दिए गए आंक...
-
जी मैं किसान हूँ क्योंकि मेरी व्यथा न हुक्मरानों के वादों में समा पाती है न सत्ता के दलालों की ठेकेदारी का हिस्सा बन पाती है। कभी धर्म के...
-
इंसान सम्मान चाहता है। इंसान प्रशंसा चाहता है। इंसान अपनी ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता है। न जाने कितनी चाहते लिए हुए तड़पता रहता है! जब उनक...
-
बादलों की अठखेलियों के चलते वातावरण में हल्की सिहरन है। काली चाय बनाने के बाद तुमको खत लिखने बैठा हूँ।बार-बार मन रोमांटिक होना चाह रहा है...
-
लोकतंत्र जैसी व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जहाँ लागू की जा रही है वहां की जनता कितनी जागरूक है! अगर जनता पांच साल में एक...
-
नौजवानो को इस विचारधारा को समझना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी देश में नौजवान देश के विकास की धुरी होते है। उनकी समझ, लगन, विचार ही राष्ट्र ब...
-
कर्ज में डूबा किसान यह सोचता है कि शायद फसल अच्छी आएगी तो कर्ज चुका दूंगा। बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ हाथ में आ...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें