देश के सामने काम करने के लिए समस्याओं का अभाव नहीं है और न ही उन समस्याओं का त्वरित निदान करने के लिए संसाधनों का अभाव है।बस अपने ही लोगों पर उन्हीं के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का अत्याचार करने का मलिन स्वभाव है।कार्यपालिका सिर्फ वोटबैंक व् दलाली के मद्देनजर निर्णय लेने लग जाये व् अपनों का हित साधने की नीतियां बनाने लग जाये तो सत्ता सिर्फ चंद कुलीन लोगों के हाथों का मोहरा बनकर रह जाती है जिसको देखकर कुछ नागरिक अपने आप को गर्वित महसूस करने लग जाते है तो कुछ लोग अपनी विरोध की भड़ास इधर-उधर चिपकाकर शांत हो जाते है। लोकतंत्र के नाम पर जब विधायिका गुंडागर्दी व् हंगामे का अखाडा बन जाती है तो नागरिकों के सब्र की सीमा टूटने लग जाती है।लोग उद्वेलित होने लगते है तो मीडिया मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए कूद पड़ता है। साक्षी महाराज के विवादित बोल ओवैसी ने उगला जहर! प्रवीण तोगड़िया के जहरीले तेवर! इस बीच न्यायपालिका आबोहवा को देखकर एक्शन मोड में आ जाती है और एकाध टिप्पणी इस प्रकार करती है कि कल ही सबकुछ बदल देगी।मतलब लोगों के दिलों में जलती आग पर ठन्डे पानी के छींटे डालकर शांत कर दिया जाता है। कुछ दिनों तक नागरिक शांत हो जाते है फिर वही चतुष्कोणीय मुकाबले का चक्र शुरू हो जाता है।ऐसा नहीं है कि लोगों के सब्र की सीमा नहीं है या लोग रोज समस्याओं से मुकाबला करते हुए व्यवस्था के प्रति नाराज नहीं होते है या गुस्सा जाहिर नहीं करते है।लोग बिजली पानी से लेकर हर सरकारी दफ्तर की खिड़की पर परेशान नजर आते है लेकिन लोकतंत्र के नाम पर सत्ता उच्च कुलीन लोग हड़पकर उसके ऊपर कुंडली मारकर बैठ जाते है तो छोटी सी समस्या इतनी लंबी खिंच जाती है कि लोगों की जिंदगी गुजर जाती है लेकिन समस्या उसी रूप में समाधान खोजने की मुद्रा में खड़ी रह जाती है।आधार कार्ड में नाम में कुछ गड़बड़ आ जाये या जमीन के पट्टे में पटवारी ने नाम गलत लिख दिया तो फिर आपके लिये ये दो समस्या ही काफी है उलझकर रह जाने के लिए। फिर देश भ्रष्टाचार,आतंकवाद आदि समस्या आपके लिए बेमानी हो जायेगी।ऐसा नहीं है कि रोज-रोज की इन समस्याओं के लिए सिस्टम के पास समाधान नहीं है या इस देश के लोगों के पास समझ नहीं है।सब कुछ है लेकिन जब आप छोटी-छोटी परेशानियां से निजात पा लोगे तो फिर आप सवाल-जवाब करने लग जाओगे।सत्ता में बैठे लोगों से हिसाब मांगना शुरू कर दोगे जो कि सत्ताधारियों के परेशानी का सबब बन जायेगा।इसलिए सत्ताधारी लोग सत्ता पर पकड़ को बनाये रखने के लिए आपको कभी भी समस्याओं से मुक्त नहीं होने देंगे। लोकतंत्र नाम की घूंटी ही मिल बांटकर खाने के लिए होती है।सत्ता में बैठा कुलीन वर्ग मोटा माल खा रहा है तो निम्न वर्ग रोज जहर खाकर चुप रहने को मजबूर है।मध्यम वर्ग दोनों के बीच झूल रहा है।मध्यम वर्ग की परेशानियां भी अजीब है।उसको गरीब से हटकर उच्च दिखना है लेकिन उतनी पूंजी नहीं होती कि उच्च वर्ग की तरह जी सके। इसलिए अंदर ही अंदर समस्याओं का अम्बार लिए डोलता रहता है।इसी वर्ग को लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार दिया गया है ताकि वो जब चाहे अपनी भड़ास निकाल सके।निम्न वर्ग के पास दो जून की रोटी के जुगाड़ के अलावे समय होता नहीं। मीडिया सत्ता के हिसाब से रंग बदल लेती है क्योंकि मीडिया का समाज से कोई सरोकार नहीं रह गया है।उनको अपना व्यापार चलाना होता है।कार्यपालिका में बैठे लोगों की कुर्सी देश से बड़ी हो गई है।असली स्वतंत्रता का फायदा तो न्यायपालिका ने उठाया है।ऐसी चादर ओढ़कर सोई है कि उस चादर की रंगीली बूंटियों की चर्चा भी कर दो तो तिलमिलाने लग जाती है।विधायिका किस प्रकार नागरिकों के सपनो की हत्या करती है इसके बारे में मैं क्या लिखूं आप खुद ही बजट सत्र देख लेना।
रामनारायण बाजा बजाता....
सब लोगों का दिल बहलाता......
रामनारायण बाजा बजाता....
सब लोगों का दिल बहलाता......
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