मौत-मौत में फर्क है......

एक मौत पर दिल्ली की सड़के जाम हो जाती है।एक मौत पर संसद में सारा काम रोककर चर्चा होती है। एक मौत पर पुरे देश में नमन होता है तो एक मौत पर पुरे देश में बहस छिड़ जाती है।एक मौत पर सब राजनेताओं की एकाएक संवेदनशीलता जाग जाती है तो एक मौत पर मीडिया इस तरह मातम मनाता है कि लगने लगता है पूरा देश बहुत ग़मगीन है,बहुत सदमे है।होना भी चाहिए क्योंकि जो भी मरता है वो देश का नागरिक होता है।नागरिक के रूप में सबकी जान की कीमत समान होती है। रोहित वेमुला की मौत से दुःख हुआ है लेकिन उनकी मौत पर राजनेताओं के नंगे नाच ने संवेदेनशील समाज की संवेदना की हत्या कर दी। जिन लोगों ने रोहित की मौत पर संवेदना जताई थी वो अपनी संवेदना का स्व-परीक्षण करने लग गए।वामपंथी विचारधारा से जुड़ा था।हिन्दू धर्म का विरोधी था।दारु पीता था।न जाने क्या-क्या कहा गया!कहना भी जरुरी है क्योंकि जब तक कोई किसी संगठन से जुड़ा न हो,जब तक हित-साध्य समूहों से कोई जुड़ा न हो तब तक जान की कीमत का महत्व ही पता नहीं चलता। दुनियां के लगभग 21 करोड़ गरीब इस देश में रहते है।रोज कीड़े-मकोड़े की तरह मरते है। आपके आस पास भी जब कोई गरीब मरता है तो कितनी संवेदना जागती है आप खुद को पता ही है।लाखों बच्चे कुपोषण से मर जाते है।हर घंटे दो कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या करते है लेकिन सब तरफ सन्नाटा पसरा रह जाता है क्योंकि गरीबों की मौत का मातम मनाने का नाटक करने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है।किसान की मौत पर संवेदना जताते समय मुआवजे की बात आ जाती है।इनकी मौत पर हंगामा करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। जब बात मौत से भी लाभ कमाने की हो तो फिर सोचने-लिखने के लिए बच क्या जाता है?देश की आजादी के 70 साल बाद हम इस मुकाम पर पहुँच जायेंगे यह किसी ने सोचा नहीं होगा। राजनीति को सुधारने का बीड़ा उठाकर मैदान में कूदे लोग भी जब इस खेल में सबसे आगे रहने की ललक पाल बैठे हो तो उम्मीदें भी आत्महत्या करने पर उतारू हो जाती है।आत्महत्या करने वाले लोगों को मैं कभी कायर नहीं मानता।मरने के लिए भी बहुत बड़े साहस की जरुरत होती है।मैं कभी आत्महत्या करने वालों का समर्थन नहीं करता।संघर्ष करो,जिंदगी को जीयो। लेकिन जब 100%आत्महत्या करने की ठान चुके हो तो चार दोषियों को साथ लेते जाओ। व्यवस्था इतनी निष्ठुर हो चुकी है कि इंसानी मौत को सिर्फ एक इवेंट मानती है।राजनेता ऐसे राक्षस बन बैठे है जिनकी इंसानी खून से ही प्यास बुझने लगी है तो मेरा सुझाव ही इसका तात्कालिक उपाय बचता है।या तो व्यवस्था खुद बदल जायेगी या छुपने लग जायेगी। फोटो बाँदा के किसान राममिलन का है।सागर दीक्षित ने fb पर अपलोड किया है।मुझे परेशान कर गया क्योंकि वो किसान था।किसी पार्टी से नहीं जुड़ा था इसलिए शांतिपूर्ण तरीके से विदाई हो गई....


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