नक्सलवाद ख़त्म क्यों नहीं होता ?

नक्सलवाद एक विचारधारा है। इस विचारधारा से पैदा हुआ आंदोलन सरकार बल प्रयोग से दबा सकती है  लेकिन विचारधारा ख़त्म कभी नहीं हो सकती।गरीबों, आदिवासियों, किसानों की जमीनों की सरकारी तंत्र व पूंजीपतियों द्वारा साझी लूट के विरुद्ध उठी विरोध की ज्वाला है नक्सलवाद। जब तक पूंजीवाद की आड़ में  जमीनों पर पूंजीवादी लुटेरों की गिद्ध दृष्टि रहेगी तब तक यह विरोध की आग जलती रहेगी। 1967 में पश्चिम  बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से कान्हू सान्याल व् मजूमदार के नेतृत्व में जमीनों पर कब्जे को लेकर शुरू हुआ  छोटा सा विद्रोह देखते ही देखते 9राज्यों के 90%इलाके में फ़ैल गया। इतने बड़े क्षेत्र में व् इतने सारे लोगों की  भागीदारी किसी षड्यंत्र द्वारा भाड़े के पैसे से नहीं हो सकती है। इसको समझने के लिए इतिहास की घटनाओं  को दरकिनार करके वर्तमान में आते है ऐतिहासिक घटनाओं क समकालीन  मीडिया, सामाजिक  कार्यकर्ता, इतिहासकार,सरकार आदि अपने अपने नजरिये से पेश करते है। बेहतर तरीके  से समझने के लिए  उसी तरीके की ,उसी इलाके की वर्तमान घटना का तार्किक विश्लेषण करना जरुरी है। झारखण्ड के इतिहास में पहली बार सितम्बर 2016 में निवेश के लिए झारखण्ड समिट अर्थात मेक इन झारखण्ड का आयोजन किया जाता है जिसमे अडानी ग्रुप पावर प्लांट लगाने की घोषणा करता है लेकिन भूमि अधिग्रहण को लेकर सरकार के सामने आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिए बने दो कानून आड़े आ रहे थे। जिन्हें सामान्य भाषा में सी एन टी/सी पी टी अधिनियम भी कहते है।

1.संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949


2.छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908


इनमें आदिवासियों की कृषि जमीन को गैर कृषि कार्यों में उपयोग लेने पर रोक है। यही अधिनियम रैयतों अर्थात आदिवासी किसानों को सुरक्षा कवच देता था लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के दोस्त अडानी के निर्देश पर प्रधानमंत्री के राजनितिक एजेंट रघुवरदास ने तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए नवंबर 2016 में इनमें संशोधन कर दिया। मैं मुख्यमंत्री न कहकर राजनितिक एजेंट इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि रघुवरदास झारखण्ड के कोई जननेता नहीं है बल्कि मनोहरलाल खट्टर,देवेंद्र फडणवीस की तरह जनभावना के विरुद्ध थोपे गये नेता है और ऐसे ही 5एजेंटों को थोपने की फ़िराक में निर्वाचन वाले राज्य में घूम रहे है क्योंकि यहाँ भी मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित नहीं किये है। जब सी एन टी/सी पी टी में संशोधन कर दिया गया तो अडानी ग्रुप के कर्मचारी/समर्थक झारखण्ड के गोड्डा जिले के मोतिया गाँव पहुँचने लगे। आदिवासी किसानों के बीच हलचल बढ़ने लगी। विधायक प्रदीप यादव ने बताया कि गाँव की 1700 एकड़ जमीन अडानी ग्रुप को दे दी गई और पावर प्लांट लगाया जायेगा। झारखण्ड सरकार की पुलिस व् अडानी ग्रुप के कर्मचारी, समर्थक पुरे इलाके को घेरने लग जाते है। 6दिसंबर को 2016 को जनसुनवाई के नाम पर एक स्कूल में ड्रामा किया जाता है। स्कूल के गेट पर सख्त चेकिंग होती है। कहा जाता है कि इस इलाके से बाहर का कोई भी व्यक्ति प्रवेश न कर पाए इसलिए चेकिंग का कहा गया लेकिन वोटर आईडी कार्ड लेकर पहुंचे ग्रामीणों को भी अंदर नहीं घुसने दिया गया। लेकिन गौर करने  वाली बात है कि अडानी ग्रुप के लोगों व् इनके समर्थकों से स्कूल का मैदान खचाखच भरा हुआ था। नाराज लोगों  ने गेट पर हंगामा किया तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया व् अश्रु गैस के गोले दागकर लोगों को भगा दिया।आदिवासियों की गोलबंदी के सुचना के बाद कल 5मार्च 2017 को जनसुनवाई के नाम पर ऐसा नाटक दुबारा रचा गया।समर्थकों को मंच से बोलने दिया लेकिन विरोध करने वाले ज्यादातर लोगों को बाहर ही रोक दिया गया व् जो अंदर घुसने में कामयाब हो गए,उन्हें बोलने ही नहीं दिया गया।नाराज लोगों ने विधायक प्रदीप यादव के नेतृत्व में गेट पर धरना दिया तो पुलिस ने फिर लाठीचार्ज व् अश्रुगैस के गोलों से दमन कर दिया। पथराव में डीएसपी सहित 14लोग घायल हो गए जिसमे से 12आदिवासी किसान है और अस्पताल में भर्ती है। आदिवासियों के सुरक्षा कवच के रूप में बने कानून बदल दिए गए,जमीन छीनी जा रही है,विस्थापितों के पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं की गई सिर्फ इतना ही बताया गया कि मुआवजा बाजार रेट से कम नहीं  मिलेगा।आदिवासी इलाकों को राज्य सरकारों के अत्याचारों से बचाने के लिए राज्यपाल को संविधान के तहत विशेष शक्तियां दी गई है लेकिन गौर करने वाली बात है कि झारखण्ड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने इस मुद्दे पर आजतक मुंह नहीं खोला है।संविधान की पांचवी अनुसूची में आदिवासी क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्र के रूप में रखकर राज्यपाल को अपार शक्तियां दी गई है।राज्यपाल चाहे तो कानून में संशोधन करने वाले विधेयक को  रोक सकती है,एक आदेश से भूमि अधिग्रहण को निरस्त कर सकती है लेकिन राष्ट्रपति के एजेंट के बजाय प्रधानमंत्री के एजेंट नियुक्त होंगे तो ऐसी उम्मीद करना बेमानी हो जाती है। सदियों से आदिवासी लोग जंगलों/वनों को सींचते आये है।इनका मुद्दा सिर्फ आरक्षण नहीं है बल्कि जल,जंगल,जमीन है।जब डरा धमकाकर हाथों में चंद नोटों के टुकड़े थमाकर रवाना करने की कोशिश करोगे तो वो लोग तंत्र से निराश होकर ,अपना सबकुछ लुटने के बाद हथियारबंद नक्सलियों से मदद नहीं मांगेंगे या उनके साथ नहीं जायेंगे तो क्या करेंगे?सरकारों को चाहिए कि दमन के बजाय इनकी मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करे नहीं तो आग बुझने के बजाय भड़कती ही जायेगी। जमीन को अपनी माँ समझने वाले लोगों  को माँ के आंचल से बेदर्दी के साथ बेदखल करोगे तो बगावत पैदा होगी ही!


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