प्रधानाचार्य या किसी शिक्षक को सजा शिक्षण व्यवस्था में खामी पर देने के बजाय रसोइये के रूप में गलती पर मिले तो बड़ा अचरज होता है।मैं भी मानता हूँ कि आजकल युवाओं का झुकाव शिक्षक बनने के लिए इसलिए नहीं बढ़ा है कि वो वास्तव में देश से निरक्षरता का अँधियारा भगाना चाहते है बल्कि इसलिए बढ़ रहा है कि वो जानते है स्कूल की एक फेरी लगाकर शादी-पार्टियों का आराम से लुत्फ़ उठाया जा सकता है, स्थानीय नेतागिरी करने का सुनहरा मौका मिल जाता है व् साथ में हर वो धंधा कर सकते है जो हकीकत में एक शिक्षक को नहीं करना चाहिए। शिक्षा का स्तर देश में क्या है इसकी जानकारी हर रिपोर्ट व् सर्वेक्षण से जाहिर हो रही है!अच्छी शिक्षा बिखरकर चंद सरकारी स्कूलों से होते हुए निजी शिक्षण संस्थानों के माध्यम से कोचिंग संस्थानों में जाकर दम तोड़ रही है।सरकारी स्कूलों में सरकार ध्यान देती नहीं है क्योंकि वहां गरीबों के बच्चे पढ़ते है व् इस देश में गरीबों को इंसान कम जानवर ज्यादा समझने की होड़ मची हुई है तो इनकी सुध कौन ले?जिनसे संघर्ष की उम्मीद थी वो लोग अपने बच्चों को चमकते निजी स्कूलों में डालकर अपने आप को गरीबों से ऊपर समझ बैठे है या यूँ कहूँ कि वो अधजले कुलीन मानव बन बैठे है।अब यह एक तरह की प्रतियोगिता बन गई है कि जिसका बच्चा निजी स्कूल में जाता है वो बच्चा बहुत ही होनहार व् उसके परिवार वाले उच्च वर्गीय होने का तमगा हासिल कर लेते है।यहाँ शिक्षा व् संस्कारों की किसी को जरूरत नहीं है बस दिखावे की डेंटिंग-पेंटिंग झकास वाली होनी चाहिए। अब आप ही देख लो मीनाकुमारी को!इनको ठीक से अंग्रेजी की किताब पढ़नी नहीं आती लेकिन कोई सजा मिलना तो दूर ,प्राथमिक शिक्षक से प्रधानाचार्य तक पदोन्नति पाती रही और सजा मिली तो ठीक से रसोइये का काम अंजाम न दे सकने के कारण।है न अजब देश की गजब शिक्षा व्यवस्था व् शिक्षक!अगर घर में पानी गन्दा आ जाये और डॉक्टर को सजा मिले! समय पर राशन न मिले आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को जेल हो जाये!चौंकियेगा मत अब ऐसा ही होने वाला है...
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