उदारीकरण के दौर में कृषि व् किसान

1991में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अपनाते वक्त देश के नागरिकों को यह विश्वास दिलाया गया कि यह देशहित  में होगा। आज 26साल बाद पूंजीवाद के प्रभावों की दुबारा समीक्षा की जानी चाहिए।उदारीकरण ,निजीकरण  व्  वैश्वीकरण की नीतियों से इस देश में सबसे ज्यादा प्रभावित तबका किसान व् मजदुर रहा है। जिसकी ज्यादा जरूरत होती है उसके लिए इस देश में नारे गढ़ लिए जाते है।1965 के युद्ध के दौरान शास्त्रीजी ने जय  जवान का नारा दे दिया।भुखमरी की कगार पर खड़े देश को किसानों की याद आयी और हरित क्रांति के लिए  जय किसान का नारा दे दिया गया। परमाणु परीक्षण के बाद अटल जी ने जय विज्ञान का नारा दे दिया। क्या जिस प्रकार बातों में जवान,किसान व् विज्ञान को महत्व दिया गया है, हकीकत में उसके हिसाब से इनको सहूलियतें दी गई है? आज हर तरफ नजर दौड़ा कर देख लीजिए।तीनों वर्ग त्रस्त नजर आएंगे।मैं आज चर्चा सिर्फ किसानों की करना चाहता हूँ। सरकारें चाहे किसी की भी रही हो लेकिन दिखावी नारों के बीच हमे गौर करना होगा कि आज किसान कहाँ खड़ा है? आजादी के समय जीडीपी में कृषि का योगदानलगभग 23 फीसदी था व् आज यह योगदान घटकर 13 फीसदी हो गया है। वाजपेयी जी के मिशन 20-20के हिसाब से 2020तक इसे 76फीसदी तक लाना है। मैं भी जीडीपी में कृषि के योगदान को कम करने का हिमायती हूँ लेकिन बाकी क्षेत्रों के योगदान को बढाकर न कि कृषि क्षेत्र को लूटकर उद्योगों की तरफ शिफ्ट कर दिया जाये! बढ़ती आबादी, औद्योगिकरण व् नगरीकरण की अंधाधुंग नीतियों तले किसानों की व्यथा व् खेती की उपयोगिता को सरकारों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया। उद्योगों को बंजर भूमि के बजाय कृषि भूमि परस्थापित कर दिया गया,शहरी प्राधिकरणों ने कृषि भूमि का अधिग्रहण करके नगरीकरण को अंधाधुंध बढ़ावा दिया। औद्योगिक केंद्रों के विकेंद्रीकरण के अभाव में चंद बड़े शहरों में मानवभर में बेतहाशा वृद्धि के कारण इन शहरों के आसपास की कृषि भूमि आवासीय कॉलोनियों में तब्दील हो गई।कृषि योग्य भूमि का विस्तार करके सिंचाई की सुविधा उपलब्ध न कराने के कारण पहले से स्थापित कृषि भूमि पर उत्पादन बढ़ाने का बोझ आ गया जिसके कारण केमिकल खाद व् दवाइयों का अधिकतम उपयोग किया जाने लगा व् वो भूमि भी बंजर बनने लग गई।कुल मिलाकर हम कृषि भूमि को विस्तार देने के बजाय उपलब्ध भूमि को समेटते रहे।

आज हमारे सामने दुष्प्रभावों की झड़ी लगी तो गलत नीतियों की समीक्षा करने के बजाय नजरअंदाज करने के 
मूड में है।किसान आत्महत्या हमारी गलत नीतियों का परिणाम है न कि किसी व्यक्तिविशेष की कार्यप्रणाली के। हाँ,हर जिम्मेदार व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वो ईमानदारी के साथ गलत नीतियों व् दुष्प्रभावों  का अध्ययन करके नई व् बेहतर नीतियां लागु करे। लेकिन आज भी लीपापोती ही हो रही है। सरकारी संस्थाएं गलतियों को उजागार करने के बजाय आंकड़ो की हेराफेरी में लग जाएं तो वंचितों में मायूसी छा जाती है व् वो मायूसी आक्रोश के गुब्बार के रूप में सामने आती है।एनसीआरबी के आंकड़े बताते है कि 2013 में 11772 किसानों ने आत्महत्या की थी व् 2014 में 5660किसानों ने आत्महत्या की है।इनके आंकड़ों के मुताबिक पश्चिमी बंगाल,राजस्थान व् बिहार में 2014 में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की है।एनसीआरबी पुलिस व् सरकारी महकमों में रिकॉर्ड आत्महत्याओं का डाटा एकत्रित करके प्रस्तुत करता है। जब हंगामा मचने के बाद भी पूरी सरकारी मशीनरी किसान की आत्महत्या को कर्ज से सम्बंधित होने से इनकार कर देती है तो हम कैसे उम्मीद कर सकते है कि हर किसान की मौत का आंकड़ा दर्ज होता होगा!बात इतनी भर नहीं है। एनसीआरबी ने हेराफेरी के लिए किसानों को दो श्रेणी में बाँट दिया है।भूमि वाले किसान व् भूमिहीन किसान। भूमिहीन किसानों को खेतिहर मजदुर मानकर मजदूरों की श्रेणी में शिफ्ट कर दिया गया।आंकड़े जारी करते वक्त दो नई श्रेणी में जारी किये जाते है।1.स्वरोजगार खेती2.स्वरोजगार अन्य।भूमिहीन किसानों को खेतीहर मजदुर  मानकर इनकी आत्महत्या को स्वरोजगार अन्य में जारी कर दिया गया जिसके कारण स्वरोजगार खेती में तो आत्महत्या के आंकड़े घट गये लेकिन स्वरोजगार अन्य में आत्महत्याओं के आंकड़े बढ़ गए।इस प्रकार किसान आत्महत्या को कम करके प्रदर्शित किया जाता है।

इस प्रकार की शिफ्टिंग महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़ व् मध्यप्रदेश में सामने आयी है।मध्यप्रदेश में किसान आत्महत्या के 
82 मामले घटे लेकिन स्वरोजगार अन्य में 236मामले बढ़ गए।इस तरह की हेराफेरी दर्शाती है कि हमारे नीति-निर्माताओं की मंशा समस्या को स्वीकार करने की ही नहीं है तो सुधार कैसे होगा।छुपाने की तमाम कोशिशों के  बावजूद भी आंकड़े बढ़ते ही जा रहे है।2012तक हर साल किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा 12000था जो 2015 आते आते 42 फीसदी बढ़ोतरी तक जा पहुंचा।इसका मुख्य कारण यही है कि एक तरफ तो बढ़ती आबादी,औद्योगिकरण व् नगरीकरण के कारण कृषि जोत में कमी आई है लेकिन उस अनुपात में कृषि पर मानवभार को कम नहीं कर पाए।खेती पर निर्भर लोगों को दूसरी जगह रोजगार उपलब्ध करवाने में नाकाम रहे।आज हालात यह है कि 5बीघा जमीन पर 10लोग निर्भर है उत्पादन व् आया उनका भरण-पोषण करने में असफल है।हमने जीडीपी में कृषि के योगदान को 53से 13फीसदी तक लाकर छोड़ दिया लेकिन खेती पर निर्भर 80%आबादी को अभी तक 70%सी नीचे नहीं ला पाये।आज भी 13%आय पर 70%आबादी गुजारा ही नहीं कर रही बल्कि बाकी 30%आबादी को भी सस्ता खाद्य उपलब्ध करवा रही है।

उद्योगों को मैनपावर उपलब्ध करवाने के लिए हमने लगभग पूरा शिक्षा बजट ही झौंक रखा है ITI,IIT,Engineering के साथ साथ प्रधानमंत्री कौशल योजना के माध्यम से कुशल श्रमिक उपलब्ध करवाने के लिए हाजरों करोड़ रूपये फूंके जा रहे है तो दूसरी तरफ कृषि शिक्षा की कहीं चर्चा ही नहीं हो रही है। कृषि विश्विद्यालयों,कृषि विकास केंद्रों,जिला व् तहसील कृषि केंद्रों के क्या हाल है वो किसी से छिपे नहीं है। किसान के स्नातक बच्चे को भी नहीं पता है कि नजदीकी कृषि केंद्र कहाँ है।सुने पड़े कृषि संसथान भूतिया खंडहरों के रूप में पड़े है।इसका कारण यह है कि खेती-किसानी का ज्ञान रखने वाले अन्तराष्ट्रीय कंपनियों में खाद-बीज बेच रहे है तो जिनकी सात पुश्तों ने खेत नहीं देखे वो कृषि प्रबंधन का काम देख रहे है तो आप अंदाजा लगा लीजिये कि प्रबंधन किस तरह का होता है।जो बचा-खुचा बजट आता है वो कार्यालय मेंटेनेंस व् यातायात की लॉग बुक भरकर हड़प लेते है।भूमि व् फसल प्रबंधन की कहीं बात ही नजर नहीं आती। देश के अंदर कृषि जींसों की कितनी खपत है?कौनसी फसल कितनी पैदा की जाये कि उचित कीमत प्राप्त करने में समस्या उत्पन्न न हो?निर्यात कब व् कितनी मात्रा में किया जाये?जब तक किसानों को उचित मूल्य न मिल जाये तब तक आयात न किया जाये!भविष्य के लिए कितने भंडारण की जरूरत है?किस फसल का कितना उत्पादन किया जाये ताकि कीमतों में संतुलन बना रहे?इस तरह के तमाम सवालों पर न सोच है व् न सोचने की क्षमता।

सवाल नीति का ही नहीं बल्कि नियत का भी है।एक तरफ दालों का उत्पादन खपत से ज्यादा होता है दूसरी 
तरफ कालाबाजारी से भाव बढाकर अफ्रीकी देशों से दाल आयात कर ली जाती है।फिर कालाबाजारी व् आयातित दोनों डालें एकदम बाजार में आ जाती है और दालों के भाव धड़ाम से गिर जाते है।अब सरकार मूंग व् तुअर की दाल खरीदने में आनाकानी कर रही है।एक तरफ 100रूपये किलो दाल आयात करते हुए कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन किसानों से 50रूपये किलो खरीदने में पसीना छूट रहा है।यह यनहीं विसंगतियों का नतीजा है जिसमे त्वरित सुधार की जरूरत है।
सरकार को अगर वाकई किसानों की दुर्दशा में बदलाव लाने है तो भूमि-अधिग्रहण बिल में सुधार करे साहूकारों पर लगाम लगाने के उपाय खोजे।वितीय संस्थानों द्वारा ऋण बाँटने में किसानों के लिए एक निश्चित हिस्सा तय करे।बैंक किसानों को ऋण देने में आनाकानी करते है।भ्रष्ट बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता लाने का प्रयास करे।किसानों की साख व्यवस्था पर नकारात्मकता फ़ैलाने वाले लोगों के मुंह पर लगाम लगाये।किसानी फसलों के लिए उचित क्रय-विक्रय की व्यवस्था करे।कृषि मंडियां आढ़तियों/दलालों की लूट के अड्डे बन चुके है।महाराष्ट्र में प्याज किसानों द्वारा सड़कों पर फेंके जाते है तो बंगाल में लोग प्याज की कमी से जूझ रहे होते है।इसके निदान के लिए सप्लाई चैन व् परिवहन व्यवस्था का इंतजाम करे।ब्लॉक स्तर पर भंडारण की व्यवस्था करे।कृषि आधारित उद्योग धंधों को बढ़ावा दे।ग्रेडिंग,ब्रांडिंग,पैकेजिंग व् अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कृषि उत्पादों की मार्केटिंग में किसानों का सहयोग करे।

आज देश सरकार के गलत फैसलों के कारण देश आर्थिक संकट से जूझ रहा रहा है।कृषि पर निर्भर मानव का 
अधिभार ही मजदुर के रूप में बड़े नगरों में आता है।किसी उद्योगपत्ति का बेटा मजदूर नहीं बनता है। किसी बड़े व्यपारी या नेता का बेटा मजदूर नहीं बनता है।विडंबना यह भी है कि खेती छोड़कर मजदूर बनने पर भी मजदूरी नहीं मिलती।लगातार अनदेखी के कारण खेती तो बर्बाद हो रही थी लेकिन नोटबंदी के कारण छोटे व् मंझोले उद्योग बर्बाद हो गए जिसके कारण मजदूर दुबारा खेतों की तरफ लौट गए है।एक तरफ क्रोनी कैपिटलिज्म के कंधों पर सेंसेक्स,जीडीपी आदि आंकड़ों को उठाकर घूम रहे है तो दूसरी तरफ बहुसंख्य आबादी हैरान-परेशान घूम रही है।युवा रोजगार के अभाव में अपराध की तरफ बढ़ रहा है तो अब तक शांत व् अहिंसक समझे जाने वाले किसान सड़कों पर उतरकर मज़बूरी में हिंसा अपनाने की तरफ बढ़ रहे है।आज विज्ञान शहरी सुविधाभोगी वर्ग की सुविधा में इजाफा करने तक सीमित है तो जवान रोज होती शहादतों के बीच बेचैनी अनुभव कर रहा है।जय जवान,जय किसान,जय विज्ञान के नारे को इंडिया गेट पर टांगकर जमीनी स्तर पर काम करने की सख्त जरूरत है। जब कृषि प्रधान देश का प्रधान तबका ही आंदोलन की राह पर निकल चुका हो तो पीछे कुछ बचता नहीं। देशद्रोही,उपद्रवी,वामपंथी,नक्सली का तमगा देने मात्र से देश के हालात सुधरने वाले नहीं है।देश अराजकता की तरफ बढ़ रहा।विभिन्न गुटों में बंटे हितसमूहों के आपसी समन्वय में अभाव के कारण संपूर्ण क्रांति तो असंभव सी प्रतीत होती है लेकिन गृहयुद्ध के मोड़ पर जरूर पहुंचा सकती है।विरोधाभास कार्यों में इतना कि गरीबों के घरों पर पीले बोर्ड बनाकर लिखा जा रहा है कि"मैं गरीब हूँ इसलिए बीपीएल मानकर 10किलो गेहूं दिया जाये"जबकि धनी लोगों के घरों के बाहर लिखा जाना चाहिए था कि "मैं किसानों द्वारा उत्पादित गेहूं जो सरकारी नियंत्रण में गरीबों को उपलब्ध करवाने थे लेकिन गरीबों का हक़ मारकर मैं खा रहा हूँ।"
https://sunilmoga.blogspot.com/
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