भारत कृषि प्रधान देश

वैसे तो हर जगह मानव सभ्यता औद्योगिक काल में प्रवेश करने से पहले कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के दौर से  गुजरी है लेकिन भारत अभी भी कृषि व् औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के बीच झूल रहा है।ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति ने वहां की जनता को सामंतों व् चर्च की जकड़न से बाहर निकाल दिया। फ़्रांसिसी क्रांति ने वहां व्यवस्था  में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया।इसलिए यूरोप में किसानों अर्थात खेती पर निर्भर लोगों की शिफ्टिंग का लंबा दौर नहीं चला था।लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था ने औद्योगिक गर्भधारण तो कर लिया लेकिन औद्योगिक क्रांति नामक बच्चा अभी तक पैदा नहीं हुआ है। जो यूरोप में 15-16वीं शताब्दी में हो रहा था वो आज भी भारत में होता प्रतीत ही नहीं हो रहा है। 21वीं सदी में भी हम 12वीं शताब्दी की व्यवस्थाओं की केंचुली उतारकर फेंकने को तैयार ही नहीं है।

हर सभ्यता की तरह हमारे यहाँ भी प्राचीनकाल से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था चली आ रही है।पहले सामंतों व् धार्मिक संस्थाओं ने लूटा,फिर बाहरी आक्रमणकारियों व् यहाँ की राजशाही ने मिलकर लुटा।जब अंग्रेज आये तो उनका कच्चा माल चाहिए था।उनके शुरुआती उद्योग (कपडा)परिपक्वता की हालत में पहुँच गये थे इसलिए खेती के उत्पादों की पूर्ति के लिए खेती को ही अपने निशाने पर लिया।कार्नवालिस का स्थायी बंदोबस्त,टॉमस मुनरो की रैयतवाड़ी,हाल्ट मेंकेजी की महालवाड़ी कर प्रणाली से भारतीय खेती को पूर्ण रूप से निचोड़ा गया।

अकाल के समय भारत की जनता लाखों की संख्या में भूख से मर जाती थी लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग 
यहाँ से धान तक ले जाते थे।सामंतों-आक्रमणकारियों के झगड़ों व् अत्याचारों से परेशान जनता स्थायी शांति चाहती थी वो अंग्रेजों ने काफी हद तक उपलब्ध भी करवाई लेकिन खेती के शोषण का नमूना 1943 में बंगाल के अकाल ने पेश कर दिया।यह ऐसा भयानक मंजर था कि ब्रिटिश करतूतें दुनियां के सामने उजागर हो गई।

इससे पहले भी किसानों के आंदोलन हुए थे लेकिन वो स्थानीय महाजनों के खिलाफ या कभी-कभार किसी 
अत्याचारी अंग्रेज अफसर के खिलाफ होते थे।थोड़े बहुत आंदोलन स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने किये थे वो तात्कालिक मांगों को लेकर ही थे।खेती में पूर्ण रूप से सुधार के लिए कोई आंदोलन नहीं किया गया।

किसानों के आक्रोश को कांग्रेसी नेता अपने हिसाब से स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ते रहे थे लेकिन उनकी 
समस्याओं को लेकर अलग से आरपार का कोई आंदोलन नहीं किया गया।आजादी के बाद कुचली हुई खेती व् शोषित किसानों का जमघट था लेकिन आजादी के नशे में किसान ऐसे डूबे कि मात्र दो दशक में देश को खाद्यानों में आत्मनिर्भर बना दिया।देश को भूख से मुक्ति देश के किसानों ने मिलकर दे दी।आगे सही दिशा देश चला रहे लोगों को देनी थी लेकिन सत्ता की भूख में ऐसे फंसे कि उद्योगों की बांसुरी बजाते-बजाते 1990 में देश को दिवालिया होने की कगार पर खड़ा कर दिया।1991 में नरसिम्हा राव,मनमोहन सिंह व् चिदंबरम की तिकड़ी ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दो मुखौटों वर्ल्ड बैंक व् आईएमएफ के सामने हथियार डाल दिए।

आधारभूत सरंचना/ढांचागत निवेश पता नहीं न समझ आने वाले क्या-क्या नाम दिए गए और जो बीमारियां 
पहले थी उसका इलाज किया नहीं और देश को पहलवानी की रिंग में धकेल दिया गया।बीमार पहलवान रिंग में कितने समय टिकेगा!

डब्लयू टी ओ के दबाव में आकर खेती के पर कतरने शुरू कर दिए।खेती की बर्बादी से स्थानांतरित लोगों को
 उद्योगों व् सेवा क्षेत्रों में समायोजित करना था लेकिन यहाँ न तो उस अनुपात में उद्योग खड़े हुए और न सेवा क्षेत्र मगर खेती को बर्बाद करने की हर संधि प्राथमिकता के आधार पर लागू कर डाली उसी का नतीजा है कि कृषि प्रधान कहे जाने वाले देश में हर साल 12000किसान आत्महत्याएं कर रहे है।समझ नहीं आता कि भारत एक कृषि प्रधान देश है कहते हुए हमें गर्व करना चाहिए या शर्मिदा होना चाहिए!जब भारत वर्ल्ड बैंक व् आईएमएफ का सदस्य बना था उसी साल ग्रेनेडा मूल के आईएमएफ के सदस्य डेविसन एल बुद्दू ने यह  कहते हुए इस्तीफा दे दिया था कि यह पूंजीवादी व्यवस्था विकासशील देशों व् अविकसित देशों के लिए उपयुक्त नहीं है।यह तीसरी दुनियां के देशों में चौथी दुनियां खड़ी कर देगी जो भविष्य की मानव सभ्यता पर कलंक के रूप में हमेशा विद्यमान रहेगी।


आज दुनियां का हर तीसरा गरीब भारत में मिलता है।गरीबों की संख्या के मामले में भारत आज टॉप पर है। 
आज किसान भिखारी बने घूम रहे है लेकिन भरपेट खाना तक नहीं मिल रहा है।शहरों में झुग्गियों का जाल सज गया।चौराहों,पुलों व् लाल बत्तियों पर महिलाएं,बच्चे पेट के लिए हाथ फैलाएं खड़े है।घर के बुजुर्ग आँखों में शर्मिंदगी की घटा बांधे मदद की गुहार लगाते नजर आते है।हर शहर में महिलाएं एक विशेष एरिया में अपनी अस्मत का सौदा करती नजर आती है तो निश्चित चौक पर रोजी की रोजाना होने वाली अनिश्चितता को समेटे दीन चेहरे मजदूर के रूप में खुद की बिक्री का इंतजार करते नजर आते है।ये सब के सब खेती से बेदखल लोग है जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से निर्मित चौथी दुनियाँ है।इस चौथी दुनियां के दरिद्र लोगों के प्रति नजरिया हमेशा संवेदनहीन रहता है।फुटपाथ पर सो रहे लोगों में से कोई बीमारी से तड़पे या भूख से तड़पकर मर जाये किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।सत्ता पूंजी से निर्मित दिखावी प्रतिमानों के आंकड़े दिखाकर पीठ थपथपाती रहती है और उद्योगपत्तियों के सहयोग से मीडिया पर कब्ज़ा करके बहुसंख्यक लोगों को बहकाती रहती है।

अभाव की तुलना में आधिक्य का प्रभाव ज्यादा खतरनाक होता है।आज किसानों की आत्महत्या अभाव के 
कारण नहीं बल्कि उत्पादों के आधिक्य के कारण हो रही है।उपज का उचित दाम नहीं मिलता।

दलालों,व्यपारियों,नेताओं व् भ्रष्ट अफसरशाही के कारण किसानों की बर्बादी हो रही है।जो पैसा हकीकत में 
आधारभूत सरंचना में खर्च होना था वो कागजों में योजना बनाकर लूट लिया गया।उसी के कारण किसानों की समस्या उस मोड़ पर आ खड़ी हो गई कि आज किसी के पास समाधान का कोई रोडमैप ही नहीं है।किसानों का व्यवस्था के प्रति असंतोष जो उभरता है उसको षड्यंत्रों के द्वारा तोड़ दिया जाता है या बंदूकसाजी के बल पर दमन कर दिया जाता है।जिस प्रकार महात्मा गांधी ने अहिंसा के नाम पर जनता के आक्रोश को दबाकर क्रांतियों का गला घोंटा था उसी का नाम ले-लेकर आज उनके अनुयायी वैसा ही कर रहे है।आज इस जाल से निकलने के लिए ,आमूल-चूल परिवर्तन के लिए किसानों द्वारा बड़ी क्रांति की जरूरत है।


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