लगभग सत्तर साल पहले हमारे पुरखों ने हमारे लिए अपनी जान का नजराना पेश किया था यह सोचकर कि हमारी आने वाली नस्ले आजादी का लुत्फ़ उठा सके। क्या सही मायनों में हम आज आजादी पाकर खुश है? क्या हकीकत मैं हम आजाद भी हुए या नहीं? कहीं सत्ता के लालची लोगों ने सत्ता के साथ-साथ देश काबंटवारा करके हमारी आँखों में धुल तो नहीं झौंकी है? सदियों से भेदभाव व् बंटवारे की मार झेल रहे समाजों को क्या वाकई में आजादी के नाम पर चुने गए लोकतंत्र रूपी मंदिर की खुली हवाओं में साँसे लेने का सुकून मिला है? क्या अज्ञानता के अँधेरे में डूबे लोगों के लिए तालीम का मुक्कमल इंतजाम हुआ है?क्या स्वास्थ्य सेवाएं गुरबत में जी रहे लोगों के आँगन तक पहुंची है या पहुँचने की और अग्रसर है? क्या भूख के भय में जी रहे लोगों के दिलों में विश्वास जगाने को कामयाब हुए है कि अब तुम बेफिक्र काम करो किसी नागरिक की मौत भूख से नहीं होगी?क्या पाखंड व् अन्धविश्वास में डूबी जनता को वैज्ञानिक सोच उपलब्ध करवाकर हम सांत्वना देने में सफल हुए है कि अब आस्था व् धर्म के नाम पर फर्जी ठेकेदार तुम्हारा शोषण नहीं कर पाएंगे? क्या गांव के किनारे व् अशिक्षा के अंधियारे में धकेले गये लोगों को हमारे शैक्षिक संस्थानों,मंदिरों आदि हर सार्वजनिक स्थानों पर समानता के साथ-साथ हमसफ़र बनकर चलने का विश्वास दिलाकर दिलों में व्याप्त भेदभाव के भय को दूर कर पाए है? अगर इन तमाम सवालों पर आपका जवाब स्पष्ट तौर पर हाँ या ना में नहीं है तो न तो वास्तविक आजादी आई है और न ही आजादी की तरफ बढ़ने का माहौल भी बना पाए है। क्योंकि जवाब या तो ना होगा या लीपापोती में होगा।आजादी के सत्तर वालों में भी हम लोग अपने आप को उस मोड़ तक नहीं पहुंचा पाये जहाँ से सुधार की उम्मीदें खिलने लगे। क्या संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थायी सदस्यता आजादी होगी! क्या एन एस जी की सदस्यता आजादी होगीक्या आईएमएफ से कर्जा लेकर बड़ी बड़ी इमारते खड़ी करना आजादी होगी! क्या एडीबी से उधार मांगकर विभिन्न क्षेत्रों में उस कर्जे का बंटवारा करना मात्र आजादी का सवेरा ले आएगा? क्या निजी उद्योगपतियों के हाथों पांच सितारा अस्पताल बनाकर हर तन तक चिकित्सा व्यवस्था पहुंचाई जा सकती है? क्या नेताओं व् भ्रष्ट अफसरशाही के कालेधन से रोज खड़े किये जा रहे निजी शिक्षण संस्थानों से हर गरीब तक शिक्षा सुलभ करवाई जा सकेगी?क्या किसानों द्वारा उत्पादित धान की लूट करके गरीब की थाली में पहुँचाने के बजाय,सड़ाकर शराब कारोबारियों के हाथों सौंपने से हर गरीब की थाली में दो वक्त के खाने का इंतजाम किया जा सकता है? क्या धर्म के नाम पर फर्जी बाबाओं व् मौलवियों-पादरियों को बेलगाम छोड़कर अन्धविश्वास व् पाखंड से मुक्ति पाई जा सकती है?
अगर नहीं तो हम हमारे पूर्वजों की कुर्बानियों पर शर्मिंदा क्यों नहीं होते है? क्या हमने चौतरफा लूट की इस प्रतियोगिता में हमारी संवेदना को ही पलीता लगा लिया है? क्या हम लूट में बंटवारे को ही असली आजादी समझ बैठे है? हमे आजादी के 70 साल बाद राष्ट्रवाद के प्रमाणपत्र बाँटने की जरूरत क्यों पड़ती है? आजादी के सात दशक बाद हर हाथ में तिरंगा देने की नौबत क्यों आ पड़ी? क्या मायूस व् निराश जनता हाथ में तिरंगा आ जाने व् देशभक्ति के चार नारे बोलने मात्र से असली आजादी का लुत्फ़ उठाने लग जाएगी? क्या हाथ में तिरंगा देखकर घर में पानी-बिजली आने लग जाएगी?क्या भारत माता की जय बोलने से थाली में खाना परोसा जाने लगेगा?क्या गाय-गाय चिल्लाने से हर गरीब बच्चे को रोज सुबह एक गिलास गाय का दूध मिलने लग जायेगा? क्या कुरान-बाइबिल या गीता के श्लोक या आयते याद कर लेने से हर बेरोजगार को रोजगार मिल जायेगा? अगर इन सभी सवालों के जवाब ना है तो फिर संस्कृति-धर्म-नैतिकता की दुहाई देकर गरीबों का शोषण ही आजादी की असली परिभाषा तो नहीं गढ़ बैठे हो!जरा आप भी सवालों व् जवाबों की फेहरिस्त तैयार करके बार-बार पढ़िए ताकि आजादी का असली रूप समझ में आ सके।आप वो चीज समझने में कामयाब हो जायेंगे कि हमे जाना किस तरफ था और जा किस तरफ रहे है!
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