रात का वक़्त है। ज़िंदगी का, अकेलेपन का, उदासी का और चुप्पी का मिलाजुला कोई नशा चढ़ा हुआ है ज़ुबान
पर। उँगलियाँ सच लिख देना चाहती हैं। मगर इन दिनों बहुत ज़्यादा ही उलझनें हैं...दिमाग़ एक साथ कई सारे
ट्रैक पर काम कर रहा है और असल में कन्फ़्यूज़ हो रहा है।
बाद तेरे बरसों तक उड़ती रही धूल
ज़िंदगी चुभती रही, बारीक कांटे सी.
जबकि मालूम है कि तुम मेरे नहीं हो
मैं किसी का सौंदर्य वर्णन नहीं करना चाहता हू। डर है मुझे! किसी नवयौवना के झांघो पर दृष्टि फिसलने से कही
मोहित न हो जाऊ । आखिर कुछ भी हो मेरी लोलुपता को मैं ही जानता हू ।नहीं इस विरह में भी सन्देश तुझे, नहीं रहने दो। तुम इन अटखेलियों के बारे मे क्या सोचोगी । यह संदेशा तुम छोड़ ही दो। मंजर बदल गए है । काल बदल गए है न कोई रूसवाई है , न प्रियतम का निर्वासन है । फिर भी......मन बेचैन लग रहा है ।
आँखों से देखा. आँखों में झाँक कर, उसकी आँखों के नीचे हलकी स्याही थी. स्याही के नीचे गालों पर कुछ बेहद
छोटी लाल फुंसियाँ निकली हुईं थी. बाल लम्बे थे और कलमें बेतरतीब थीं
“तुम्हारा हाथ छू लूँ?”
“क्या तुम कभी थोड़े से बड़े हो जाओगे? मुझे तुम्हारी कुछ चीज़ें जो अच्छी लगती है , अब उनका न बदलना
अच्छा नहीं लगता, मुझे मालूम है. मेरे हाँ कहने पर तुम कहोगे कि छूना थोड़े ही था, पूछना था”
एक बार उसने कहा था- “तुम चाय पीने के लिए आते हो या कोई और वजह है?” सवाल सुनकर मेरे बंद होठों पर हंसी ठहर गयी थी. मैने कहा- “पगली ये उबला हुआ पानी पीने कौन आता है? ये चाय तो बहाना है. असल में तुम्हारे साथ बैठने में मजा आता है. मैं बहुत सी बातें भूल जाता हूँ. जब तक हम साथ होते हैं मन जाने क्यों सब सवालों को एक तरफ रख देता है.”होठों पर हंसी अब भी थी
“अब किस बात की मुस्कान है?”
“कभी बताउंगा तुमको” फिर चाय का कप छोड़कर पलगं पर सीधा हो गया-
“अभी बताओ” वो फिर से मुस्कुराई. “प्लीज अभी बताओ”
“तुम अभी ये समझने के लायक ही नहीं हो”कोई राह भूला हुआ बादल हवा की मद्धम लय से इस तरह बह रहा था, जैसे रुका हुआ हो.
मैने उसे छुआ. जैसे बरसात की पहली बूँद अचानक ललाट पर गिरती हो. जैसे नंगी पीठ पर पंख फिसलता हो.
जैसे पानी में रखे पैर के तलवे को कोई गुदगुदा दे. उसकी अंगुलियाँ मेरी अँगुलियों से बाहर आ रही थी.
उसने कांपते स्वर में अधूरा प्रश्न किया- “क्या तुम...?”
अधूरे प्रश्न को बिना समझे कहा- “नहीं”
जब बात-चित के प्रसंग में कामुक चेष्टा से भरी हुई अटपटी बातें करना चाहता तो मुह से कुछ न कहकर अपना
सिर हिलाते हुये प्रश्नो का उतर दे देती । उसकी गरम-गरम सांसो ने अपने मन की कामना बता दी थी । किंतु मेरा
मन सशंय मे पड़ गया था । किन्तु जैसे शुक्ल पक्ष की चन्द्र्कला दिनों-दिन बडती है वैसे ही मेरी कामवासना बडने लग गई और लावण्य से भरे उसके शरिर का हर अंग कठोर हो रहा था । आभूषण योग्य शरिर काफी तप रहा था उसके ताप से मेरा रोम रोम पिघल कर बस उसमे समा जाना चाहता था या यूँ कहे उसमे मिल जाना चाहता था। प्रेम की तपिश का कोई पूर्वानुमान मुझे नहीं था। नजरे बिलकुल सतर्क जैसे डाका डालने की तैयारी में हो और चौकीदार आसपास घूम रहा हो। फिर भी इश्क के जंग में आज आमना सामना हो ही जाय इस भाव को भर कदम बढ़ते जा रहे थे। आँखों में कसक दिल में धड़क रही गती के साथ तैरता डूबता रहा । अब तो इस दुरी पर आकर ठिठक कर रुक जाने के कितने पूर्वाभ्यास हो चुके है मुझे खुद भी याद नहीं । उसका अल्हड़पन उसकी पटपटाते होंठ साँसों की धड़कन से उभरते सिमटते उभार और उन आँखों में शर्म की हरियाली निखर जाती,बिंदास और अल्हड़पन अंदाजों पर छुई मुई का प्रभाव छा जाता , सूरज की तपिश बाहर भले ही अंगारे बरसारही थी लेकिन भीतर अचानक मौसम बेहद खुशगवार हो उठा था। नज़रों में लौ जल पड़ी।... दोनों एक दूसरे की आहट महसूस कर रहे थे। शब्द लापता थे और दोनों के बीच मानो मौन पहरा दे रहा था।
सुनील मोगा

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