सोच रहा हू कि कुछ कॉलेज समय की भावना आप के साथ लिख कर शेयर करूं । एसा करना कितना उचित है पता नही पर खाली समय मे अकेलेपन को दुर करने क अच्छा विकल्प है। अकेले में बिती बातें याद कितना आनन्दमय असहास होता है ना। बिते समय को दुबारा जीना मुमकिन नही है पर कोरी कल्पना मात्र से मन रोमांचित हो जाता है । कामभावना हर प्राणी का स्वभाव है । एसा ही मेरा कामीमन था जिसको जीतने के लिये तो कॉलेज की बालाओं  की  लीला को देखकर ही पूरा हो जाता था, जब वे भौंहें तिरछी करके अपने कटाक्ष छोड़ती थी जो कामीमन में अचूक निशाने पर बैठते थे। नितम्‍ब से सरका हुआ वस्‍त्र अपने हाथों से पकड़ना उनकी रोज की आदत थी। बहुत बार तो वहाँ से हटना कठिन ही  होता, और  जानलेवा भी लगता । कभी कभी मन करता की मैं अपना शरीर इन सुन्दरियों को त्याग कर दू। एसे उघड़े हुए जघन भाग को देखकर किसी पुरूष की तबीयत ढ़ीली पड़ सकती है।  जिसका गंगारूपी वस्त्र नितम्ब से सरक गया हो एसी कमसिन दिल जलाने वाली बाला को देखकर मन कामचारी हो जाता था। और वो बेचारी लज्जा में डूब जाती, और अपने पत्थर जैसे कठोर वक्ष (चूचुकों) को ढ़कने में सफल नही होती । कभी कभी दुकूलों के बिच में वस्त्र को  खींचते किसी को देखता, तो सोचता अंतर्वस्‍त्रों का जोड़ा इस कन्या को भी भेंट कर दू । फिर तन्मय चुंबन के दौरान उसकी कमीज के बटन खोल दू । उस समय एक बाला के साथ मेरी भी प्रेम लीला थी । उसके बारे में पहले भी आपको बता चुका हू । नाम आप जानती ही हो, कुछ कामवासना के फलसफे यहॉ लिख रहा हू । एक बार काफी दिनों के बाद मैं उस बाला से मिला तब बड़ा कृत्रिम प्रतिरोध किया। थोड़ी देर बाद चुंबन-श्रृंखला शुरू हुई , उसके एक कान की लौ अपने होंठों में ली, चुभलायी और हल्के से काट ली। अब दृढ़ आलिंगन में पीठ पर चपल हाथ का स्पर्श था। जहां-जहां हाथ फिसलता, त्वचा रोमांचित होती जाती।  सहसा हुक खुला और उसकी कंचुकी ढ़ीली पड़ गई । उसके बायें उरोज को चुंबनों की लड़ी से बांधते हुए चूचुक को होंठो में भर लिया। सीत्कार के साथ सांस रूक गई। तलवों से झुनझुनी उठी और पूरे जिस्म को स्पंदित रह गया । कुमारी कन्या के नीवि-बंधन को छेड़ रहा था । बिस्तर पर उसे उलटा और सीधा लिटाकर स्पर्शों और चुंबनों से पूरे शरीर में थरथराहट भर दी। मिलने से पहले वह जितनी मुखर थी, बाद में उतनी ही मौन हो गयी। मेरा एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे रख, दूसरे हाथ से उसकी कमर को घेरे हुए उसे अपने से सटा रखा था। और अंगुलियां उसके बालों में उलझी थी।  धीरे-धीरे सांस छोड़ी। तन-मन आह्लाद और तृप्ति से शिथिल था। अपनत्व एवं सुरक्षा की ऐसी अनुभूति पहले कभी नहीं हुई थी।
सुनील मोगा

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