जब भी तुम मेरे साथ  में होती  तो मैं स्वर्ग और मृत्युलोक को एक ही स्थान पर देखता  हू ।  पर जब तुम से अलग होता हू तो विरही प्रेम के साथ अनन्य कामवासना से भर जाता हू । आजकल तो कामदेव कुछ ज्यादा ही सता रहे है । तो सोचा क्यों न एक  संदेश भेज दिया जाए। कामवासना के साथ मेरा सम्बन्ध अटूट है।  कहीं ऐसा न हो कि  किसी और कन्या के प्रती कामभावना बीज अंकुरित  हो जाये । यहॉ कन्यायें इतनी सुन्दर हैं कि हर किसी का  रिझना स्वभाविक है । अभी लिखने बैठा हू मन में अजीब से भाव आरहे है । शायद पास में होती तो तन की तपत मिटती , अपनी होठों से तुम्हारे कॉपालों को चुम कर , बालों में हाथ¬ डालकर  उनके साथ कुछ लुका-छिपी  का खेला करता । संभोग के लिए अपने हाथों से कमर की गांठें खोलकर तुमहारी  साड़ी  को हटाता  तब तुम किसी  प्रेमिका की भातीं  लज्जा से  सकुचा जाती, तुम्हे कसकर अपनी छाती से चिपका लेता और अपने दोनों हाथों को कस लेता । जब धीरे-धीरे सम्भोग का रस मिलने लगता है, तो तुम्हारी झिझक  भी दुर हो जाती। जब तुम्हारे ओठ का चुम्बन लेता और  फिर करधनी पकड़कर अपनी ओर खींचता , तो  तुम आधे मन से केवल दिखावे के लिए मेरा  हाथ रोकने का बहाना करतीं। और बिना बात के तुम्हारा हंसना उस समय मैं तुम्हे चुमना नही चाहुंगा अपितु बहुत देर तक अपलक अपनी आंखों से ही उस सुंदरता का पान करता ।  उस समय कुछ और वस्तु न पाकर अल्प मात्रा में मदिरा पान  करना चाहुंगा । पसीने के बिन्दुओ के कारण वायु और भी शीतल लगती । तुम्हारे तपते बदन से सुगन्धित भाप निकलती , सांसों की आवाजों मे भौंरे गूंजते , असा लगता की पसिने से तन की सिंचाई हो रही है ,  और अंतिम क्षणों मे जैसे सूखी धरती पर वर्षा की बूदें पड़ती है वैसा ही अहसास तन और मन को मिलता । बिकानेरी कामिनियां जब लम्बे-लम्बे डग भरती हुई जल्दी-जल्दी में अपने-अपने गंतव्य तक जाती है तो एसा लगता है कि ये सब भी अपने-अपने प्रेमियों के पास जा रही है ॥ आज मैं बाजार के तरफ ग्या था वहॉ कुछ तो नागीन की तरह लम्बी-लम्बी चोटियों में गुंथें हुए बालों वाली बालायें देखने को मिली , पुरे मार्ग में सोन्दर्य बिखरा हुआ था , देखकर मन तृप्त सा हो गया । अभी तुम्हारे वियोग में विक्षिप्त-सा हू । पता नही अब कितने दिनों तक नहीं मिल सकते । तुम्हारे विरह में उन्मत्त होकर कोई उन्माद न कर बैठू । अभी तो तुम्हारे साथ बिते पल याद करके छटपटा रह हू । इससे अच्छा तो इस अवधि में किसी पर्वत  पर स्थित आश्रमों की शरण लेना अनुचित नही होगा । शायद  उस  आश्रम के समीप घनी छायावाले हरे-भरे वृक्ष लहलहाते होगें  और वहां जो तालाब तथा सरोवर मे कोई नवयोवना स्नान करती दिख जाये । एसा  हो तो कुछ  मास  उस पहाड़ी  आश्रमों में किसी-न-किसी प्रकार बिताए जा सकते है  ।  पर यहां इसका उल्टा है । तेज आन्धियां को देखकर एसा लगता है कि कोई पागल हाथी अपने माथे की टक्कर से मिट्टी के टीले को ढोने का प्रयत्न कर रहा है।मन अभी विरह के कारण व्याकुल है । बेचारा पत्नी के वियोग में तड़प रहा है । तौबा की थी, मैं न पियूंगा कभी शराब।
बादल का रंग देख नीयत बदल गयी।।
सुनील मोगा

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