अब खिड़की से आने वाली हवा साँप की तरह फुफकार छोड़ रही है। बेहतर यही लगता है कि फुफकार डस ले उससे पहले उनका रास्ता बंद कर दिया जाय। किन्तु हम अपने आपको को कहा तक बंद रख पाएंगे ये तो पता नहीं । खैर इससे पहले की ये फुफकार किसी को डसे हम तो यही आशा करते है कि जल्द ही खुला आसमान श्वेत -श्याम चादरों से ढक जाए और दिल खोल कर बुँदे नाचे। जिसमे भीगकर प्रकृति के गर्मी और मानव ताप किसी में भी झुलसे लोगो के दिल में ठंडक पहुंचे।
आहा क्या मजा आता जब हम साथ साथ भीगते। वर्षा की बुँदे जब-जब गुंथे हुए हाथो पे टपकती है तो उसकी उसकी धार उंगलियो से सीधे दोनों के दिलो तक पहुचती है,जिससे रक्तो में स्नेह का मिलन हो जाता है। खैर चलो तुम अन्दजा लगा लो पता नहीं दिल में क्या -क्या ख्याल उठ रहे है । सांसो की धड़कन में जैसे लगता है कि कोई विरहा राग की आलाप हो,धड़कन की ध्वनि न होकर आलाप की आरोहन -अवरोहन ज्यादा लग रही है थोड़ी देर के लिए पलको में प्रेम-आलिंगन भी हो गया ,लगा की गहरी सुरंग के भंवर-शून्य में कुछ मेरा अपना छीनता जा रहा है । ऐसी बातो से घबराहट तो होती है देखो कब से ऐसे ही बैठा हू । पलकों को सजा दे रखी है
अपलक बस तुम्हारी राह को ही निहारे। कितना मुर्ख हू । मै और ये मन भी न जाने क्या-क्या सोचने बैठ जाता है।अब मन का क्या, उसे तो सभी बावरा ही समझते, मेरा कोई अनोखा तो है नहीं जिसमे बसता है उसीको देखना चाहता है। नहीं तो छिप -छिप कर यूँ ही आसमान को तो न निहारता ? लहरे क्यों बार-बार तट की ओर भागती? जानते हो हवा से सुखी पत्तीयाँ क्यों खड़खड़ाती है, उसको लगता है की अभी तक तो चलो टूटने के बाद भी अपने पेड़ के आगोश में था किन्तु जैसे ही हवा चलती है बिछोह के डर से उनकी आत्मा चिल्ला उठती , प्रेम के लिए निर्णय जरुरी नहीं है किन्तु मिलन में बहुतो की निर्णय और अधिकार स्वयं सिद्ध होता है। बेशक प्रेम का कोई रूप न हो वो निराकार हो , लेकिन अभिवयक्ति जैसे -जैसे साकार होती जाती है मानदंडो की अलग-अलग लाक्षा गृह की कोठरियो से गुजरते हुए साबित करना पड़ता है की पारिवारिक मर्यादा , सामाजिक रीति-नियम कही प्रेम की ऊष्मा-आँच से गल कर ढीले तो नहीं पर जायेंगे। मेरे पास अब कुछ समझने को नहीं है इतना सफ़र तय करने के बाद भी प्रेम कुछ बन्धनों का घृणित पात्र अब भी बना हुआ है। शायद मर्यदाओ का प्रेम मिलकर मेरे प्रेम को लील गया, और मै बोल न पाया।

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