हर शाख पर उल्लू बैठा है,अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा? - किसान

किसान आंदोलन बेतरतीब अपनाये पूंजीवाद के साइड इफ़ेक्ट है।शहरों के आधारभूत ढांचे को बिना मजबूत किये खेती से सेवा क्षेत्र में शिफ्टिंग शुरू कर दी गई।सेवा क्षेत्र भी बदहाली का अड्डा बन गए।खेती के घाटे से त्रस्त लोग जब शहरों की तरफ पलायन करने लगे तो शहरों पर इतना बोझ बढ़ा कि नगरीकरण की व्यवस्था चरमरा गई।पहले से स्थापित अवैध कॉलोनियों व झुग्गी-झौम्पड़ीयों में बेतहाशा वृद्धि होने लगी। मूलभूत सुविधाओं से वंचित इन जगहों पर पलायन के लिए मजबूर हुए लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह जी रहे है। शहर में रहने वाले हर व्यक्ति को मजदूरी मिलेगी तभी वह इस पूंजीवादी दौड़ में टिक पायेगा लेकिन हमारे शहरों में इतने रोजगार के संसाधन ही नहीं है कि हर हाथ को काम दे सके।हालात यहां तक पहुंच चुके है कि परिवार का आदमी दिहाड़ी पर निकलता है तो महिला बच्चों को लेकर लालबत्ती,चौराहों पर भीख मांगने के लिए निकलती है ताकि पेट की भरपाई हो सके।
ज्यों-ज्यों पूंजीवाद की जकड़न बढ़ती जा रही है सरकारें अन्तराष्ट्रीय समझौतों-संबंधों का हवाला देते हुए इस देश के सबसे बड़े रोजगार क्षेत्र खेती को बर्बाद करती जा रही है।पूर्व राष्ट्रपति ऐ पी जे अब्दुल कलाम ने "पूरा" अर्थात गांवों में शहरों वाली सुविधाएं उपलब्ध करवाने की योजना पेश की थी लेकिन सरकार ने उसे कूड़ेदान में फेंक दिया।मेरे आज तक समझ मे नहीं आया कि सरकार देश की 70%आबादी को जड़ों से काटकर कहाँ समायोजित करने जा रही है?खेती को बर्बाद करके किसानों को कहां सेट करेगी?विश्व व्यापार संगठन के साथ जो एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर किया है उसमें मुख्य शर्त यह है कि सरकार किसानों को न सब्सिडी दे सकती है और न अन्य तरह की कोई घरेलू मदद कर सकती है।

एक तरफ देशभर के किसान आंदोलन कर रहे है कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करो तो दूसरी तरफ 
सरकार WTO के समझौते से बंधी हुई है।स्वामीनाथन सब्सिडी व बोनस देने की बात कर रहे है तो सरकार दी जा रही सब्सिडी में कटौती कर रही है।सरकार काम किसानों को हर हाल में बर्बाद करने का कर रही है और बातें 2022 तक आमदनी दुगुनी करने की कर रही है। 

यह कैसे संभव होगा?जब आईएमएफ,डब्ल्यू टी ओ,वर्ल्ड बैंक के साथ मिलकर हमारे ही सत्ताधीश खेती की 
बर्बादी कर रहे है तो इतनी बड़ी ताकत के सामने गरीब-लाचार किसान कैसे लड़ पायेगा?तमाम योजनाओं,समझौतों, संबंधों का गहराई के साथ अध्ययन करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि देश की बहुसंख्यक आबादी के पास एक ही मजबूत आधार है वो है लोकतंत्र।

लोकतंत्र का इंजिन है मत।लोकतंत्र की आत्मा है संविधान।शांतिपूर्ण तरीके से संवैधानिक प्रावधानों के तहत 
हमारी सम्पूर्ण स्थापित राजनैतिक जमात को सत्ता से बेदखल करके सत्ता पर कब्जा कर लिया जाए।जब सत्ता पर कब्जा हो जाएगा तो डब्ल्यू टी ओ के समझौते से हटकर खेती के उत्थान के लिए काम शुरू किया जा सकता है।कोई भी सरकार आये स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं कर सकती।जब तक खुद सरकार नहीं बनाओगे तब तक किसानों का भला होने की संभावना नगण्य सी है।एकमात्र व अंतिम उपाय सत्ता की चाबी है।किसान आंदोलन किसानों को जागरूक करने का काम तो कर सकते है लेकिन स्थापित सत्ता से किसानों का भला कभी नहीं कर सकते।बार-बार किसानों के साथ सरकार द्वारा हुए समझौते इस तरफ ही इंगित करते है।हर बार आंदोलन के बाद किसान निराश होकर ही घर लौटा है 
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