डगर कठिन है लेकिन मैदान न छोड़ेंगे

किसानों की दुर्दशा का कारण सिर्फ लुटेरा वर्ग ही नहीं है बल्कि किसान नेता व किसानों के पढ़े लिखे बच्चे भी  मुख्य भूमिका में है।लुटेरा वर्ग तो किसानों का शोषण करेगा ही क्योंकि उनका वजूद ही शोषण की बुनियाद पर टिका हुआ है।अगर वो लूटने के नए नए तरीके ईजाद नहीं करेगा तो वो बिना मेहनत के जियेगा कैसे? जिसका जो धंधा है वो करेगा ही।लेकिन शोषित किसान वर्ग आज क्या कर रहा है उस पर हमें विश्लेषण जरूर करना चाहिए।
आज किसान कौमों में जागरूकता की बेहद कमी है।किसानों के बच्चे शिक्षा के नाम पर सर्टिफिकेट या डिग्री हासिल करने तक ही सीमित है।किसान कौम के छात्र नेता पार्टियों के बड़े नेताओं के साथ फोटो सेशन करके व चापलूसी करके जान-पहचान बढ़ाकर टिकट की दौड़ में भागे जा रहे है।किसान कौम के ज्यादातर सामाजिक संगठन किसी न किसी राजनेता के साथ खड़े होकर कौम के छोटे छोटे झुंड बनाये घूम रहे है। किसान नेता इतने निज स्वार्थी है कि अपने छोटे से फायदे के लिए पूरी कौम का सौदा कर लेते है। किसान कौमों के जो सक्षम लोग है वो अपनी प्रसिद्धि व स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अपनी पूंजी पाखंड व अंधविश्वास पर उड़ाकर किसानों को दिग्भ्रमित करते नजर आते है।
किसी को मतलब नहीं है कि गरीब किसान का चूल्हा जला कि नहीं जला!किसानों को बिजली मिल रही है या नहीं!आपदाओं में बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा मिला है या नहीं!खाद बीज डीजल कितने महंगे है!फसलों के भाव ठीक से मिल रहे है या नहीं!किसानों के बच्चों को पढ़ाई का उचित अवसर मिल रहा है या नहीं!खेती करने में लगी महिलाओं में कुपोषण का स्तर क्या है!गरीब व बीमार किसान को सरकारी अस्पतालों में उचित मिल रहा है या नहीं!देश के लिए शहादत देने वाले युवाओं के बूढ़े माँ-बाप आज किन हालातों में दिन काट रहे है!सरकारी दफ्तरों में बिना पैसे दिए किसानों के काम होते है या नहीं! आज किसानों के बच्चे क्या कर रहे है?आज किसान कौम के राजनेता किस स्तर की राजनीति कर रहे है? तमाम तरह के सामाजिक संगठन आज किस कार्यशैली व लगन से समाजसेवा कर रहे है?किसान कौमों के वैचारिक लोग आपस मे ही आरोपों-प्रत्यारोपों का खेल खेल रहे है!हर कोई झुंड बनाकर गोल-गोल खेल रहा है। रातों-रात बड़ा नेता,अभिनेता,राजनेता ,समाजसेवी बनने की भूख से तड़प रहे है।एक दूसरे को नीचा दिखाने का खेल खेलते-खेलते थोड़े दिनों बाद ही खुद का डिब्बा गोल कर बैठते है।बेचारा किसान मजबूरी का दर्शक बनकर तमाशा देखता रहता है।अपनी लाचारी-बेबसी-गरीबी का दर्द किसके कंधे पर माथा रखकर छलकायें? किसान के बच्चे को कलम-किताब देने का बीड़ा कौन उठाएगा?बर्बाद होते किसान,छिनती जमीनों,इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के बरामदों में तड़पते,सरकारी दफ्तरों में जलील होते किसानों की चिंता कौन करे? सब जगह अपनी ढपली व अपना राग अलापते निज-स्वार्थी लोग भरे-पड़े है।कुछ लोग विपरीत हालातों से जूझकर भी काम कर रहे है  लेकिन उनकी डगर बड़ी कठिन है। हर राजनेता के पास एक तथाकथित समाजसेवी संगठन का सरगना होता है व दो-चार तथाकथित बुद्धिजीवी टाइप के प्राणी होते है। जो भी ठीक कार्य करता दिखेगा या उसका समर्थन नहीं करेगा या उसकी भाषा नहीं बोलेगा तो उसको बदनाम करने के लिए चापलूस बुद्धिजीवियों की कलम चीत्कारें मारने लग जाती है।खुद का तैयार किया सामाजिक संगठन का सरगना उसके योगदान का हिसाब मांगने लग जायेगा व खुद का कुछ अता-पता नहीं होगा। फिर राजनेताओं की अंधभक्ति में खोई उन्मादी भीड़ न समाज देखती है न छोटे बड़े का भेद और जहर उगलना शुरू कर देती है। फिर किसान की दुर्गति की अबाध गाड़ी दुबारा सरपट दौड़ने लगती है।
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