केंद्रीय कृषि बजट व राजस्थान के चुनाव परिणाम

आज मोदी सरकार ने अपना अंतिम पूर्ण बजट पेश कर दिया।मोदी सरकार ने 2014 में जो किसानों से वादे किए थे उसका क्या हुआ,उससे आज पूर्ण रूप से पर्दा उठ गया।मोदी कार्यकाल में कृषि वृद्धिदर औसतन 1.4% रही जबकि सेवा सेक्टर की वृद्धि दर 8%के लगभग रही है। कृषि विकास दर 2014-15में 1%थी तो 2017-18में 1.9%रही है।तमाम समस्याओं/आपदाओं/सरकारी बेरुखी के बावजूद इस साल किसानों के बूते 3.30लाख टन अनाज उत्पादन करने का लक्ष्य सरकार ने तय किया किया है।पेश बजट के आंकड़ो के मुताबिक 9.5करोड़ किसान परिवार यानि 59%आबादी खेती पर निर्भर है।59% आबादी के लिए किए गए प्रावधानों को देखकर सिर शर्म से झुक जाना चाहिए।सरकारों का किसानों के प्रति नजरिया क्या है वो समझ मे आ जाना चाहिए।

1. रबी फसल के मूल्य की तरह खरीफ फसल का मूल्य भी किसानों को लागत का डेढ़ गुना देने का प्रयास किया जाएगा!यानि स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट गेहूँ, जौ, चना,मसूर,सरसों आदि पर पहले से ही लागू है व चावल , मक्का,ज्वार, बाजरा,मूंग,मूंगफली,गन्ना आदि पर भी लागू करने का प्रयास करेंगे उसके लिए नीति आयोग को व्यवस्था करने के लिए कहा जायेगा।

2.मिजोरम,त्रिपुरा,नागालैंड,मेघालय में बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए बांस मिशन चलाया जाएगा जिसके लिए 1290करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।ध्यान रखना होगा इस देश मे बांस मिशन पहले से ही चल रहा है।

3.2000करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर मार्किट व इंफ्रा फण्ड बनाया जाएगा ताकि किसानों के उत्पाद बिकने की 
व्यवस्था हो सके!ध्यान रखना होगा कि किसानों की समस्या कर्ज,बिजली व लागत का डेढ़ गुना कीमत है जबकि इससे बिचौलियों की व्यवस्था होगी!

4.आलू,प्याज,टमाटर आदि सब्जियों के भावों के उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए ऑपरेशन ग्रीन के नाम पर 
500करोड़ रुपए के फण्ड का प्रस्ताव किया गया है।इसमें स्पष्ट नहीं किया गया है कि भाव ज्यादा होने पर आयात करने में व कम होने पर किसानों को राहत के रूप में कितनी राशि दी जाएगी।यह बजट भी इस काम के ऊँट के मुंह मे जीरा है।

5.खाद्य-प्रसंस्करण मंत्रालय को पिछले साल 715करोड़ रुपये मुकाबले इस बार 1400करोड़ रुपये आवंटित किए गए है।इसमें भी अभी कोई स्पष्ट नहीं है कि यह राशि सीधे किसानों को खाद्य प्रसंस्करण करने के लिए दी जाएगी या बीच मे खेती के नाम से व्यापारियों को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने के लिए दिए जाएंगे!

6.कृषि ऋण पिछले साल 10लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 11लाख करोड़ रुपये बांटने का लक्ष्य रखा गया है जबकि किसान देशभर में कर्जमाफी के लिए आंदोलन कर रहे है।किसानों को सीधे कितना ऋण पिछले साल दिया गया है व इस साल कितना दिया जाएगा इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है।कृषि ऋण के नाम पर कृषि यंत्र,खाद-बीज बनाने वाली कंपनियां व कृषि आधारित उद्योग-मंडिया आदि भी आती है।

7.किसानों के लिए उत्पाद बनाने वाली ऐसी कंपनियां जिसका सालाना टर्न ओवर 100करोड़ रुपये है उसको टैक्स में 100%छूट दी गई है जबकि ट्रेक्टर व पार्ट्स पर जीएसटी 18%लगा दिया गया है।यानी इधर से उद्योगपत्तियों को टैक्स राहत के नाम पर लुटाओ और उधर से किसानों को जीएसटी के नाम पर लूट लो! 8. 22हजार करोड़ रुपये रूरल हाट बाजार को एग्री मार्किट से जोड़ते हुए ई-नाम से जोड़ने के लिए प्रावधान किया जाएगा।छोटे व मंझोले व्यापारियों के हर धंधे को खेती-किसानी वाले बजट में धकेल दिया गया जबकि ग्रामीण हाट बाजारों में सुई से लेकर प्लास्टिक की बाल्टी/कपड़ा तक बिकते है।

9. देशभर में 42मेगा फ़ूड पार्क बनाये जाएंगे उसके लिए कितना बजट होगा उसका उल्लेख तक नहीं किया गया।कांग्रेस कार्यकाल के मेगा फ़ूड पार्क के नाम पर किसानों से छीनी गई जमीनें अभी कूड़ा फेंकने के रूप में काम आ रही है!मेगा फ़ूड पार्क में प्रसंस्करण होने वाले उत्पादों पर 5%कस्टम ड्यूटी का प्रावधान जरूर पहले ही कर दिया गया है यानि गांव बसने से पहले लुटेरों की तैनाती कर दी गई है!

10. 96जिलों को कवर करने वाली प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए 2600करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।भारत मे तहसील के क्षेत्रफल देखें व उसके हिसाब से सिंचाई का प्रावधान करने के लिए होने वाले खर्चे का हिसाब करे तो इस बजट में एक तहसील में पूर्ण सिंचाई की व्यवस्था नहीं हो सकती है।

11.दिल्ली में वायु प्रदूषण न हो इसके लिए पराली जलाने वाले किसानों के लिए मदद का एलान किया गया है लेकिन न बजट की व्यवस्था न किस तरह मदद की जाएगी उसकी रूप रेखा पेश की गई।

12.कृषि बजट से ही मछुआरों व पशुपालकों को किसानों की तरह क्रेडिट कार्ड दिए जाएंगे।यानी किसान 
क्रेडिट कार्ड के कर्ज में फंसकर जिस प्रकार किसान आत्महत्या कर रहे उसी प्रकार का इंतजाम मछुआरों व पशुपालन करने वालों के लिए किया जाएगा!इनके सशक्तिकरण के लिए अन्य किसी तरह की मदद का कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

13. जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा व औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए 200करोड़ रुपये के बजट 
 प्रावधान किया जाएगा।जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए कोई बजट का आवंटन नहीं किया गया तो क्या सिर्फ भाषणों व विज्ञापनों से जैविक खेती बढ़ जाएगी?पेस्टिसाइड के उपयोग को बंद करके जैविक खेती के लिए मुनाफे के दौर तक पहुंचने के लिए तीन साल का समय व आज के मुताबिक 2साल तक बिना आय के किसानों को खर्च करना होगा।क्या हमारे किसान इतने सक्षम है कि भाषण सुनकर ही इस कार्य मे लग जाएंगे?

14.कृषि निर्यात 100अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है।खेत से मंडी तक कृषि उत्पाद पहुंचाने का कोई 
सुव्यवस्थित इंतजाम नहीं है। अनाज भंडारण की व्यवस्था के अभाव में खुले में सड़ रहा है लेकिन भंडारण की व्यवस्था के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है और बातें निर्यात बढ़ाने की जा रही है!

मैँ पहले से कहता आया हूँ कि कृषि मंत्रालय के बजट का लगभग 65%हिस्सा कृषि के यंत्र, खाद-बीज व 
दवाइयां बनाने वाली कंपनियां खा जाती है!सरकारी सब्सिडी का अधिकतर हिस्सा यही कंपनियां हड़प जाती है। एक तरफ सब्सिडी लूटती है तो दूसरी तरफ जमकर किसानों को लूटती है।इनके ऊपर नियंत्रण का कोई नियामक नहीं है।राजनैतिक पार्टियां वादे करती है,सत्ता में आने पर सरकार किसानों को बेवकूफ बनाकर आंकड़ों में खेलती है और हर बार किसान आक्रोशित होकर इस पार्टी से उस पार्टी की ओर चला जाता है।सेस अर्थात एक निश्चित काम के लिए एक निश्चित उपकर लगाया जाता है।पिछले साल तक विभिन्न तरह के 20 उपकर वसूले गए।6मुख्य उपकर(सेस)लगाकर जनता से 4लाख करोड़ रुपये वसूले गए लेकिन जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपकर लगाए गए वहां खर्च ही नहीं किये गए व सीएजी के हिसाब से 1.81लाख करोड़ का कोई हिसाब-किताब ही नहीं मिल रहा है।कृषि उपकर के नाम पर जो किसानों के बेटे मध्यम वर्ग में शामिल हुए उनसे लुटा गया पैसा किसानों को मिला ही नहीं!गया कहाँ उसका पता नहीं! आज राजस्थान में 2लोकसभा व एक विधानसभा चुनाव के नतीजे आये जिसमें वो पार्टी जीत गई जो स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट पर 2007 से कुंडली मारकर बैठी थी।नाराज किसानों ने 2014 में मोदीजी को वोट देकर सत्ता सौंप दी व आज किसानों का धैर्य टूटा तो कांग्रेस के अलावे कोई विकल्प नजर नहीं आया!कुँए से निकले व खाई में गिरे!खाई से निकले तो वापिस कुँए की कगार पर खड़े हो गए!किसान एकता व राजस्थान में तीसरे मोर्चे की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले लोगों के मुंह पर तमांचे से कम नहीं है। देशभर के किसानों की उम्मीद राजस्थान के किसानों व किसान राजनीति से जुड़ी हुई है।देखना यह होगा कि राजस्थान के किसान नेता नामांकन भरकर भाग खड़े होने,दोस्ती का हवाला देकर दुश्मनों की गोदी में बैठकर या तीसरा मोर्चा बनाने का दावा करते करते अंत मे कांग्रेस या बीजेपी की गोद मे बैठ जाएंगे!बजट में तो किसानों की कोहनी  के गुड़ चिपकाने की पूरी कोशिश हुई लेकिन चिपका नहीं पाए लेकिन किसान नेता कोहनी के गुड़ चिपकाने का प्रयास करते रहेंगे या मैदान में उतरेंगे यह राजस्थान व देशभर के किसानों को दोपहरी की रोशनी में खुली आँखों से देखते रहना चाहिए!
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