आस से उपहास की तरफ छात्र राजनीति

राजस्थान में जैसे ही छात्रसंघ चुनावों की घोषणा हुई वैसे ही जितने छात्र थे उनमें से ज्यादातर छात्रनेता बन गए व बचे-खुचे उनकी टीम के कर्णधार। मेरी फेसबुक मित्रता सूची में ज्यादातर युवा है इसलिए न्यूज़ फीड चुनावमय होना लाजिमी है। अगर वर्तमान स्वरूप में छात्र राजनीति को देखा जाए तो मेरा मानना है कि छात्रसंघ चुनाव औचित्यहीन है इसमें एक विधायक बनने से ज्यादा खर्च होता है।कोई काबिल और ईमानदार नेतृत्व तो इन चुनावों से उभर नहीं सकता।इक्के-दुक्के उदाहरण होते होंगे बाकी अमूमन यही देखा जाता है कि पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई खराब करने,शहरों व कॉलेजों की दीवारें खराब करने,जातीय विद्वेष फैलाने,छात्रों में आपसी गुटबाजी पैदा करने,मारपीट-मुकदमों में फंसाने के अलावे इन चुनावों व छात्रनेताओं का कोई योगदान देखा नहीं गया है।
अक्सर यह देखा जाता है कि किसी भी देश के युवा क्या चाहते है,उनकी क्या सोच है,वो भविष्य में अपने देश को किस रूप में देखना चाहते है यह सब विश्विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र संगोष्ठी परिचर्चा आपसी संवाद,चुनाव आदि प्रक्रिया के तहत जाहिर करते है।लेकिन भारत के विश्विद्यालयों में अब यह सब नहीं होता है या यूं कहूँ कि पहले थोड़े बहुत प्रयास हुए थे लेकिन इसको हम कल्चर कांसेप्ट के स्तर पर स्थापित नहीं कर पाए है।राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियों के जितने भी छात्रसंगठन है वो अपनी मुख्य पार्टी के इर्दगिर्द ही रिजिड हो चुके है।जब मुख्य राजनैतिक पार्टियां ही अवसर वादी, विचारविहीन होकर येन-केन-प्रकारेण जीत को ही अंतिम सत्य मान चुकी है तो यह कल्पना करना कि इन पार्टियों के आदर्शों से छात्र राजनीति खड़ी होकर भविष्य में देश की दिशा व दशा तय करने के काबिल हो जाएगी तो मैं इसे निरीह बेवकूफी समझता हूँ।ऊपर से विचार या ज्ञान के रूप में इनको कुछ मिलना नहीं है और नीचे से ये लोग कटने लग गए है। मुझे याद है पिछले साल राजस्थान में एक सीकर से बड़े किसान आंदोलन की शुरुआत हुई थी और 50%से ज्यादा बच्चे विश्वविद्यालयों में किसान कौमों से है।बाकायदा किसान छात्र संघ व इनसे मिलते-जुलते कई छात्र संगठन व छात्र नेता है लेकिन किसी भी विश्विद्यालय में किसान आंदोलन को लेकर कोई संगोष्ठी या परिचर्चा नहीं हुई और न किसी ने किसान आंदोलन का समर्थन किया व न किसी ने सरकारी नीतियों का विरोध किया। मेरे कहने का मतलब है कि जिस समाज/देश का भविष्य तय करने,सामाजिक ,आर्थिक,धार्मिक समस्याओं का समाधान ढूंढने,नवाचारों द्वारा जिंदगी सरल बनाने हम हमारे बच्चों को इन शिक्षण-संस्थानों में भेजते है वहां ऐसा कुछ भी नहीं है।रोज छात्र नेता व छात्रों के हुड़दंग/सार्वजनिक जगहों पर तोड़फोड़ आदि से साबित करते है।मेरी चिंता उन छात्रनेताओं को लेकर बिल्कुल नहीं है जो सक्षम परिवारों से है और राजनीति में अपने कैरियर का विकल्प ढूंढ रहे है!मेरी चिंता उन गरीब व सामान्य परिवारों से निकले बच्चों के लिए है।ये बच्चे बड़ी उम्मीदों के साथ इन कॉलेजों/विश्विद्यालयों की दर पर पहुंचते है।उनके पीछे पूरे परिवार के सपने होते है!पूरा परिवार उनकी सफलता या नौकरी के बाद जीवन सरल होने की उम्मीद लिए इंतजार करता है।हर शाम उस उम्मीद की किरण के आसरे कटती है। मेरा ऐसे सभी छात्रों से निवेदन है कि बूढ़ी राजनीति विश्विद्यालयों में गिरकर मर चुकी है और छात्र नेता उनके नीचे दबे पड़े है।इसलिए अपना कीमती समय बर्बाद न करें।चुनावों तक अपने घरों/कमरों में बैठकर पढ़ाई करो।चुनाव वाले दिन शांतिपूर्ण चुनाव हो तो जाकर अपना मत देकर आ जाओ।एक भावी विचारविहीन अतार्किक फासिस्ट भ्रष्ट नेता पैदा करने से बेहतर है कि पढ़ लिखकर खुद को विचारवान तार्किक विवेकशील बनाएं।यही आपकी जिंदगी तय करेगा। अंत मे उन छात्र नेताओं से निवेदन है जो इस बार चुनाव की घोषणा होते ही संघर्षशील होने का स्वलिखित प्रमाणपत्र लेकर तैयार हुए है, लड़ाई-झगड़ों,दंगों-मुकदमों में फंसाकर गरीब बच्चों का भविष्य बर्बाद मत करना।हम तो जानते है कि आप कितने संघर्षवान हो लेकिन ग्रामीण परिवेश से शहरों में नए आने वाले बच्चों को आपकी संघर्षशीलता एकाएक समझ मे नहीं आती है और जब तक समझ मे आयेगी तब तक समय निकल चुका होगा।नये बच्चे स्कूल यूनिफार्म को छोड़कर रंग-बिरंगे कपड़ों में कॉलेज आते है तो उनका सपना होता है कि मेरी जिंदगी भी रंग-बिरंगी होगी!इन सुहावने रंगों पर कालिख मत पोत देना!इन बगीचे के नये खिले फूलों को मसल मत देना


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