हमारे नेता बेलगाम है। मनमानी करना उनका धर्म है। सिर्फ वोट पाने और कुर्सी की चाहत में हमारे नेताओ की जुबान पर लगाम लग ही नहीं रही है। सिर्फ जुमलेबाजी बची है। वहीं हम इन नेताओं के पिछलग्गू है। महापुरुषों के सपनों को चूर-चूर करने वाले ऐसे बेटे भी, जो बेशर्मी की सारे हदें पार कर इन चंडालो के राजनीतिक झंडे उठाने में लगे रहते हैं। हाथों में तिरंगा लेकर भारत माता की जय बोलकर नफरतों की मंडी सजाने से देश आगे नहीं बढ़ेगा हर चौक चौराहे पर मानवता शर्मसार होती है। संकरी गलियों में बच्चों का बचपन लूट जाता है। सड़कों के किनारे भूख व इलाज के अभाव में गरीब तिल-तिल कर मर जाता है है। खेती अब फायदा नहीं दे रही है। जैसे तैसे बच्चों को पढ़ाता है लेकिन नौकरी नहीं मिलती। बेरोजगारी व कर्ज में डूबा इंसान निराशा में डूबने लगता है। रोटी,कपडा,मकान, चिकित्सा व शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता है। लोकतंत्र में एक ताकत आम आदमी के पास होती है वो है वोट की ताकत। जब देश की सीमा पर स्थित गांव कमलकोट भी चुनाव में वोट डालने का हकदार है तो आखिर ज्वलंत राजनीतिक मुद्दों से हमारा सरोकार ‘डिसकनेक्ट’ कैसे हो सकता है। सत्ता से विमुख होकर बदलाव का सपना देखते रहना तो कोई विकल्प नहीं इसीलिए आजाद भारत के हर तबके को राजनीतिक सक्रियता बढानी चाहिए। युवाओं को राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहिए । अगर हम लोग आपस में ही उलझे रहेंगेे तो समाज के गरीब तबके का क्या होगा। आने वाली पीढियां हमें कभी माफ़ नहीं करेगी। एक पूरा नेटवर्क खड़ा करके गरीब व अनपढ़ लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने की कोशिश हुई तो हमारी देश भक्ति भी शक की नजर से देखी जाएगी। दुनिया वाले जितना नुकसान हमारे देश को नहीं पहुंचाते उससे ज्यादा नुकसान पहुँचाने के हम भागी होंगे। अपनी अच्छाईयों को कमजोरी मत बनने दो किसान कैमेरा भाई लोगों, इतना भी ना झूको कि पूँजीवाद हमारी पीठ को पायदान बना कर कंधे पर बैठना आसान हो जाये अब एक नया दौर आने की उम्मीद है। कनेक्टिंग वर्ल्ड के साथ बदलती दुनिया का हाव भाव व भविष्य की उम्मीदों को जानने व पहचानने वाले लोग कमर कस रहे है। याद रखिये अगर हम खुला मैदान देगे तो यहाँ शोषण करने वालों की कमी नहीं है। जो सदियों से हम मेहनत करते आये हैं उसका फायदा कोई और उठाता रहा है। हाँ बहुत से मुद्दों पर ट्यूनिंग नहीं बन पाती जिससे हमारे राजनीतिक विचारों का बंटवारा हो जाता है। एक तरफ शहरी भोग-विलास की संस्कृति, दुसरी ग्रामीण मेहनत-उपवास की संस्कृति। ये सभ्यता भी हमारे विचारों के फैसले में अंतर पैदा करती है। लेकिन हमारा लक्ष्य एक ही है। जब तक जाति की भावना से ऊपर उठकर हम वोट करने बूथों पर नहीं जाएंगे, हमारे दिन नहीं बदल सकते। देश 70 साल में विकसित देशों की श्रेणी में क्यों नहीं आया क्योंकि इस देश में देशवासी नहीं अलग अलग समुदाय और जातियाँ रहती है जिनको एक दूसरे की बुराई करने और टाँग खींच कर नीचे लाने में ही मज़ा आता है। भरपुर व असंभव को संभव करने का माद्दा रखने वालों की फौज खड़ी हो उस देश में निकृष्ट,कामचोर अधिकारीयों को राजशाही ठाठ भोगने का मौका क्यों दिया जाये? हम चाहते है कि अंग्रेजो के ज़माने की वो सारी जंजीरे उतारी जाये जो सेवक को शाही बनाती हो। अधिकारी की उपाधि हटाकर सेवक की जाये। जनता व सेवक के बीच की दूरियां ख़त्म की जाये। जब अपनों का हाथ ही अपनों की जेब में डाका डालने लग जाता है तो सारी उम्मीदें,सारे सपने धराशायी हो जाते है। कुपोषण,सड़क,बिजली,पीने का पानी आदि सैंकड़ों समस्याएं त्वरित निस्तारण की कतार में खड़ी है।लेकिन इन समस्याओं से ध्यान हटाकर ज्यादा देशभक्त कौन? इतिहास में किसने कितनी गलतियां की?कौन क्या कर सकता था और क्या नहीं? इन सवालों में उलझाये रखा है । हम खुद अपंग व लाचार हो गए है। हमारे अंदर जड़ता आती जा रहीं है। भविष्य संवारने की कोशिश करने के बजाय इतिहास के अचार का चटकारा लेने में व्यस्त है। इतिहास को मत खोदो। गौरवशाली टीले स्वार्थी तत्व हड़प लेंगे और गड्ढे हमारे लिए छोड़ देंगे जिसको भरने में हमारी पीढियां खप जायेगी....लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया से हमें ज्यादा उमीद नहीं करनी चाहिए इससे अच्छा तो सोशल मीडिया को अगर ढाबा और चाय की दुकानों पर होने वालीं चर्चाओं का इलेक्ट्रॉनिक वर्जन माने तो ही ठीक क्योंकि यंहा कम से कम आम आदमी की पहुँच तो है। मीडिया केवल और केवल उन मुद्दो पर बहस करता है जिनमे उनके खुद के स्वार्थ छुपे होते है यह मीडिया अब केवल भोपू बन गया है जो की बिना पदताल के न्यूज़ को अपने अनुसार पेश करता है इनका भी अपना एजेंडा तय होता है इनको भी तो उन नेताओ की चिरौरी करनी है उनके तलवे चाटने है अपने आप को बहुत बड़ा समझते है देश की जनता को गुमराह करते है और खुद नेताओ के आगे पीछे घूमते है यह मीडिया के पाखंडी लोग इन के पास उस आम आदमी के लिये फुर्सत क्यों होगी क्योंकि उससे इनका कोई भी स्वार्थ सिद्ध नही होता है पुराने समय मे धोखेबाज विश्वासघाती,दगाबाज, गद्दार लोग थे जिन्होने इस देश मे अंग्रेजो को मदद दी , मुग़लो को मदद दी वही काम आज के राज नेता कर रहें हैं।
सावधान रहें!
सतर्क रहें!
सुरक्षित रहें और राजनीति में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करें।
सुनील मोगा
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