कुछ लोग कहते है कि गरीबी एक मन की अवस्था है। फिर भी उनकी 3-3 पीढियां इस गरीबी नामक अवस्था को मिटाने की यश गाथा लिखती रही। कुछ लोग घर व् शौचालय बनाने की नई कहानी गढ़कर लालकिले तक पहुँच गये। क्या हो गया इस मानवता का?चाँद पर कम खर्चे में चंद्रयान भेज दिया,ना भेज पाए तो बस,इन गरीबों के मुँह में दो वक्त की रोटी। चाँद पर घर भी बस जायेगा,हाई स्पीड/बुलेट ट्रेने भी दोड़ेगी। बाइक की जगह चमचमाती कारे भी दोड़ेगी। ना दोडेगा तो इन गरीबों का जीवन। किसको क्या पड़ी?क्या लेना देना है इन गरीबों से। एक दिन की पार्टी से 5 साल का पट्टा तो मिल ही जाता है। गरीब भी सोच लेता है 365 दिन में एक दिन ही भरपेट खाना मिलता है,उसको भी जरा क्यों ठुकराए?मूंगफली बेचती इस बुजुर्ग अबला के कांपते हाथ तो देखिये,जार-जार मरती इंसानियत का आलम तो देखिये। कई कारे आई व् गई लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। दिल हो तो पसीजे!दिल तो आजकल किसी और रोग में फंसा हुआ है।70 साल की यह बुजुर्ग महिला 500 साल की लग रही है। कहाँ मर गये लिम्का व् गिनीज बुक वाले,एक रिकॉर्ड तो कायम कर लेते। हमने तो बचपन से यही सीखा है,कि जीवन का पहला मंदिर माँ होती है,फिर बीच सड़क पर इस मंदिर की बदहाली किसी को क्यूँ नहीं दिखती। लानत है उन बेटों पर, जिन्होंने आज माँ को इस अंजाम पर पहुंचा दिया, लानत है उन सरकारों पर जो अपने आपको जन-हितेषी कहती है,लानत है ऐसी मानव सभ्यता व् संस्कृति पर,जो प्रवचन बड़े मनमोहक देती है लेकिन कोई जिंदगी में नहीं उतारता। खूब सुन लिया हमने"यत्र नार्यस्तु पूज्यते,रमन्ते तत्र देवता"।खूब सुन लिया हमने कि स्त्री संस्कारों की खान होती है। रहने दो इन बहकावी बातों को। तोड़ने दो पाखंडी धर्मों की बेड़िया।रहने दो आशाराम, रामपाल, दिनाकरण जैसे बाबाओं को पैदा करने वाले आडम्बरों को। गरीबों की कृपा गोल-गप्पे में नहीं अटकी है और ना ही अटकी है हरी चटनी में। हमारी कृपा तो कभी यज्ञों के नाम पर लुटी गयी तो कभी प्रार्थनाओं के नाम पर। कभी लोकतंत्र के नाम पर आधुनिक लुटेरों ने लुट ली तो कभी पश्चिमीकरण के नाम पर अपनों ने ही लुट ली। बूढी माँ का घर में क्या काम?अब तो कुत्ता पाल लिया है। घर की रखवाली कर लेगा। जंग लगी मशीन कबाड़ में बेच दी जाती है,लेकिन क्या करे इस बुढिया का कोई खरीददार भी तो नहीं मिलता। ऐसी सोच हो गई हमारी। यह तो उदाहरण मात्र है। आप शहरों की सड़कों पर रात को गुजरते वक्त देखते होंगे,ठण्ड में कांपते लोगों को।क्या मजाल की आपको थोडा भी तरस आ जाये।दया धर्म का मूल रहा ही नहीं,रुपया मूल बन गया। मंदिरों में चढ़ावा देकर आपका सर गर्व से ऊँचा हो जाता है,जन्मदिन पर दारू की पार्टी देकर आप गौरान्वित महशूस करते है,लेकिन गरीब को रोटी के 10 रूपए देने हो,तो आपकोे पहाड़ जैसा लगने लगता है। फेसबुक पर सर टकराते-टकराते आपको पूरा दिन छोटा लगता है लेकिन किसी बुजुर्ग को रोड पार करवानी हो,तो आपको समय की बर्बादी नजर आती है। क्या करे जनाब धर्म पथभ्रष्ट हो गया,नेता चोर हो गये,सरकारी कर्मचारी बेईमान हो गये।अब कहीं से सुधार की गुंजाईश ही नजर नहीं आती।कुछ बचा है तो चंद लोगों का जागृत जमीर। वो भी इस बदहाली के झंझावतों में हिचकोले ले रहा है...
सुनील मोगा
सुनील मोगा

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