प्रजेंट्स ऑफ माइंड सबका अलग-अलग होता है। कुछ कमजोरियां सबके अंदर होती हैं। मेरे अंदर भी कमजोरियां हैं। और मेरा प्रजेंट्स ऑफ माइंड भी अलग है। कुछ ऐसी भी मेरी कमजोरियां हैं, जिन्हें मैं चाहकर भी नहीं दूर कर सकता। अब तो कोई आदर्श नहीं बचा जीवन में, मेरे एक कंधे पर कॅरियर की असफलता का बोझ है, अब मैं लेख लिखना चाहता हूं, आन्दोलन करना चाहता हूं। मैं देश के लिए लड़ना चाहता हूं। मुझे आन्दोलन की राह अच्छी लगती है। मैं देश में बदलाव लाने वाले आंदोलनकारियों की एक इकाई बनना चाहता हूं।  हुकुमत की लूट-चोरी पर सवाल उठाना चाहता हूँ। चाहे लोग मुझे कहें कि तुम लोग हिन्दू विरोधी हो!कम्युनिस्ट हो! मुल्ला हो! देशद्रोही हो! कुछ दोस्तों की संगत में पड़कर मेरा रुझान भी वामपंथी हो गया है अब उनको ये कौन बताये कि यह एक विचारधारा है विचारधारा को आप बल प्रयोग से दबा सकते हो। लेकिन विचारधारा ख़त्म कभी नहीं हो सकती। यह गरीबों,आदिवासियों,किसानों को सरकारी तंत्र व पूंजीपतियों द्वारा साझी लूट के विरुद्ध उठी विरोध की ज्वाला है तुम्हारे पाखंड की परत को हर जगह, हर मंच पर उधेड़ेगी। जो सहन किया वो बहुत है।अब और नहीं, इसलिए अब हम उस बेहूदा खरपतवार को साफ़ करने निकले है जो नई फसल के फलने-फूलने में रोड़ा बन रही है । तमाम राजनेता हमें मस्का लगाने आते हैं।  हम किसी स्वार्थ से  उनके साथ हैं। ना हमारा विचारों का नाता ना कुछ और है। फिर भी  आस्था व धर्म के नाम पर फर्जी ठेकेदार हमारा शोषण कर रहें है। भ्रष्टाचार, सरकारी संस्थानों की असफलता, लचर कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, लाचारी, बेबसी आदि को समझना होगा। स्थानीय मुद्दे पर सफेदपोशों की लूट को समझने के लिए हमारे पास सैंकड़ों उदाहरण है।हुतिये सत्ता के नशे में चूर होकर हमारे भविष्य को भूल गए। हमारी मेहनत की कमाई को सोमरस की मदहोशी में उड़ाते रहे है । कल्पित कथाओं के माध्यम से इतिहास को गांधी-नेहरू बनाम गोवलकर-सावरकर में समेट दिया। और हम बूत बनें बैठे है। हम लोगों ने घर में माँ-बाप की आँखों के आईने को भूलकर टीवी पर चीखते-चिल्लाते एंकरों को देश-समाज का आइना समझने की जो गलती की है उसी का खामियाजा आज हमारा देश समाज भुगत रहा है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ उद्योगपतियों के हाथों में है। एंकर-पत्रकार तो बिचारे ख़रीदे हुए घोड़े-गधे है। इनका काम वैचारिक दुश्मनी के बीज बोने के सिवा कुछ नहीं है। अब मीडिया चैनल को देखना ही छोड़ दो! अगर देखना चाहो तो उनके बोल निर्मल बाबा की कृपा से ज्यादा न समझो। रोटी, कपडा, मकान, चिकित्सा व शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता है। कुपोषण, भुखमरी, ठण्ड से सिकुड़कर मरते लोगों के जनाजे इस देश के मुंह पर रोज कालिख पोत रहे है लेकिन कोई चैनल इस पर नहीं बोलेंगे। दोनों बड़े नागनाथ व सांपनाथ का इलाज कर दो छोटे वाले जनता को सर्वोपरि समझने की आदत डाल लेंगे। जब भी जहाँ भी सत्ता का प्रचारक मीडिया बना और सत्ता धर्म गुरुओं के चरणों में नतमस्तक हुई तब जनता मूर्खता की पराकाष्ठा को लांघते हुए अपने ही झुम्पड़े में आग इस उम्मीद के साथ लगा बैठी कि शायद इस आग की लपटें बड़े बड़े महलों तक पहुंचेगी! काश ऐसा होता........जमीर नाम की चीज तो बची ही नहीं इनके अंदर ! बचा है तो अपना स्वार्थ। कहाँ पता था कि विकास के घोड़े पर बैठकर आने वाले लोग विनाश का रास्ता अख्तियार कर लेंगे! अब जाकर समझ में आया कि नागपुरी पेशवाओं की पाठशाला से निकला होनहार, चरित्रवान, पवित्र आत्मा वाला छात्र देश के सवा सौ करोड़ लोगों को बेईमान मानता है और उनके अंदर की बेईमानी को बाहर निकालने के लिए नोटबंदी लागू की थी। यह मीडिया, ये नेता-अफसर सबकुछ लेनदेन से सेट होते है।  शराब व डिस्को पार्टी से निकलकर डिब्बा डिबेट में आकर महिला अत्याचारों का ठीकरा गरीबों पर फोड़ते है। मंदिरों में घंटा बजाने वाले व मंडियों में कम तोलकर ज्यादा वसूलने वाले लोगों ने इस देश को बर्बाद किया है। मीडिया के माध्यम से पूरे देश को हाइजेक करके देशभक्ति के नारों में मशगूल कर देते है। फर्जी मीडिया व चंद दलालों के छाती पीटने को कतई देश की आवाज न समझे। कहाँ-किसको चमत्कारी बताना है! किसके पीछे गरीब जनता की आँखों में धुल झौंककर अंधभक्तों की भीड़ खड़ी करनी है! किसको सब समस्याओं के समाधान का ज्ञाता घोषित करना है! यह सब मीडिया के माध्यम से ये दलाल तय करते है। मीडिया सत्ता के हिसाब से रंग बदल लेती है क्योंकि मीडिया का समाज से कोई सरोकार नहीं रह गया है। उनको अपना व्यापार चलाना होता है। क्या करे जनाब राजनीति वोट बैंक के बुते व सत्ता समझौतों के बुते चलने लग जाये तो क्या देश व क्या देशभक्ति! सब कुछ गौण हो जाता ।।
मुनव्वर राणा साहब का एक शेर याद आ रहा है.....
डरा-धमकाकर तुम वफ़ा करने को कहते हो!
तलवार से भी कभी कोई कांटा निकला है?
जुर्म-ऐ-गद्दारी में जिसका तुम क़त्ल करते हो!
उन्हीं की जेब से क्यों तिरंगा झंडा निकलता है?

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