नेता पाला इस तरह बदल रहे है जैसे इस देश की जनता मुर्ख है हुकूमत मुंह भराई की रस्म से खूब वाकिफ है यह हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है शाही कुत्ते टुकड़ों की तलाश में निकल चुके है। हमे बखूबी पता है कि कौनसा कुत्ता किसके दरवाजे पर दुम हिला रहा है फिर भी हम खामोशियों की चादर ओढ़कर सोये हुए है। बुझदिल लोग राष्ट्रवाद के प्रमाणपत्र हासिल करने की दुकान के आगे पंक्ति में सबसे आगे खड़े है ।70 साल बाद राष्ट्रवाद के प्रमाणपत्र बाँटने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या भारत माता की जय बोलने से थाली में खाना परोसा जाने लगेगा? सब लोग आज अपनी-अपनी थैलियां देशभक्ति के प्रसाद से भर रहे है भारतीय जज्बाती पार्टी गरीबों के जज्बातों को मोहरा बनाने लगी है भक्त अपने नेता के हंगामे को जायज व दूसरे दल के नेताओं द्वारा किये जाने वाले हंगामें को नाजायज बता रहे है। जो लोग माता-गौ माता चिल्लाकर गरीबों को पीटते हैं उनको भी एक देशभक्ति ताम्रपत्र की जरूरत है। हमारे हाथों में आज सोशल मीडिया आया है जिसके माध्यम से हम गरीबों-मजदूरों की आँखों के आईने में झांक सकते है। । लेकिन यहाँ पर भी हम लोग ग्रुपों में विभक्त है जब तक अपनी समस्याओं व इनके वादों का हिसाब लेना शुरू नहीं करेगे तब तक ये लोग हमे इसी तरह आभासी दुनियां में डुबकी लगवाते रहेंगे। अब सोशल मीडिया का जमाना है लोग टीवी खोलने या अख़बार पढ़ने से पहले फेसबुक या व्हाट्सअप देखते है। इसलिए इसको हल्क़े में न ले । समान विचारधारा व समान उद्देश्यों वाले लोग मिलकर बेहतर परिणाम लाने का प्रयास कर सकते है। आज अपने आप पर गर्व करने का दिखावा करने वाले लोगों की फ़ौज तो तैयार हो गई है लेकिन वास्तव में उनके पास गर्व करने लाइक कुछ होता नहीं है। जो संवैधानिक अधिकारों के सहारे आगे बढ़ रहे है वो आज आँखों में कंकड़ की तरह चुभने लगे है। गरीब के नाम पर लूट के पैसों से ही गरीबों का शोषण हो रहा है।कभी कभार गाँव के अंतिम गरीब के घर में चूल्हे पर रोटी पकाती किसी अबला के जीवन को भी देख लीजिए! पूंजीवादी दौड़ में खेती को दरकिनार करते हुए जिस प्रकार मंडी-पाखंडी हावी हो रहे है! अब देश कृषि प्रधान नहीं, कुर्सी प्रधान बनने जा रहा है। जब झूठे वादों व इरादों से देश चल सकता है तो खेती किसानी की जरूरत ही क्या? किसान का शिकार इन तथाकथित किसान नेता के कंधे पर बंदूक रखकर कर रहे हो वो बेहद शर्मनाक है। इसलिये जटिलताओं से भरे देश व समस्याओं में उलझे तंत्र से बाहर निकलने का एक ही तरीका है और वह है राजनीति।
आइये!मिलकर आगे बढिये और समाज में राजनैतिक चेतना लाने के आंदोलन में अपनी भागीदारी निश्चित कीजिये.....
सुनील मोगा
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सुनील मोगा
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