सुबह उठकर अपना फेसबुक अकाउंट खोलते ही हताशा,निराशा,हिंसा,क्रोध आदि से लबरेज दीवार खुलती है। अन्धविश्वास का महिमामंडित करने वाले अधजले कुलीन मानव झूठी शेखी बघारने के चक्र में ज्ञान की टोकरियाँ मुफ़्त में थमाते थमाते थकते नहीं है । फेसबुक एक विचार व्यक्त करने का माध्यम है पर अब लग रहा कि ये जन्मदिन मनाने का प्लेटफार्म बन गया है । अजीब सा कॉकटेल बना रखा है जिस दिन किसी का जन्मदिन न हो उस दिन किसी धार्मिक उन्माद फैलाकर संस्कारवान गालियों के कल कारखाने में निर्मित करते है कुछ लोग तो साफामेनिया से पीड़ित है साफा पहनाते व पहनते है और उस फोटो से जब तक इनके आभासी दीवारें आबाद न हो जाये तब तक नेता होने के गुण में कमी सी लगती है। आजकल तो पेड़-पौधे भी फैसबुक की दीवारों पर ही लगाये जाते है । कुछ और भी अजीब लोग है पूरे दिन इंकलाब जिंदाबाद । भगतसिंह जिंदाबाद । ‘लेकिन क्या, क्या तुम सिर्फ विचारों और नारों में ही गांव-क्षेत्र की उन्नति चाहते हो, या उसके लिए कुछ जमीनी प्रयास भी करोगे?’’यकीन मानिए ये वो लोग है जो आम जनता को मूलभूत मुद्दों से ध्यान भटकाने में प्रयास कर रहे है। मैं इनको नर-पिशाच से ज्यादा कुछ नहीं समझ सकता । तुम समझते क्या हो ? हम तुम्हारे इस राजनीतिक चूतियापे को समझते नहीं है क्या? आम आदमी ने राजनीति को अपने सरोकार से बाहर की ‘गंदी चीज’ समझ लिया था, इसीलिए राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ के लिए आम आदमी को बदहाली के नरक में धकेल दिया।’’ ‘‘सिर्फ वोट देने तक आप क्यों राजनीति का हिस्सा बनते हैं? लोकतंत्र के प्रति आपका सिर्फ इतना ही सरोकार और धर्म थोड़े ही है। कि आप सिर्फ नारे लगाकर ही अपना दायित्व समझते हो। याद रखिये, हमारा संवैधानिक लोकतंत्र उस छप्पर के समान है, जिसे गांव-शहरों के करोड़ों लोग मिलकर उठाते हैं। इसलिए लोकतंत्र हर भारतीय का छप्पर है। हर भारतीय के सिर पर लोकतंत्र का ‘दायित्व’ है, इसलिए सबको उसकी छाया मिलनी ही चाहिए। लोकतंत्र की छाया सबको तब मिलेगी, जब सब उस ‘छप्पर’ की टोंग अपने हाथ में रखेंगे।’’ न कि फैसबुक पर हाय-तौबा मचाने से ।संसद और विधानसभा में बनने वाली नीतियों में गांव-ग्रामीणों का न हस्तक्षेप होता है न दबाव इसलिए सरकारी योजनाओं-इमदादों की सारी मलाई ‘मिडिल क्लास’ और ‘बिजनेस क्लास’ के लोग खाते हैं। बहुसंख्यक ग्रामीणों के हिस्से तो उनकी जूठन आती है। गांव की उन्नति तब तक नहीं हो सकती, जब तक देश की राजनीति में ग्रामीणों का हस्तक्षेप नहीं बढ़ेगा। सफेदपोश लुटेरे रंगीन श्याम में वाइन की चुस्कियों के साथ नहर की नहर भी पी गए । किसानों के लिये अन्न के गोदाम को कौन बनाएं, नेता जी तो कोयला खाते हैं बादियो से बच्चीयों के बलात्कार की सिसकिया गूंजती है,और उनको संगीत-उल्फ़ते आभास है। आप चाहे तो पुराने काले जादू से भी चमत्कार की उम्मीद कर सकते है इन हुतियो से नहीं।इंसान होने का सबसे बड़ा सबूत भावुक होना है न कि तर्कसंगत होना।तर्क आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है लेकिन भावुकता इंसानियत को जिन्दा रखने का वाहन है।अगर अचानक से देशद्रोही व देशभक्ति की गूंज सुनाई देने लगे तो समझ लीजिए कि धर्मगुरु और राजनेता-उद्योगपत्ति मिलकर आपके भविष्य का फैसला कर रहें है।
सुनील मोगा
सुनील मोगा
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