आपसे प्रेम ... रोज़ खुल के आपस में बात करना ... एक दूजे पे विश्वास रखना ... समय निकालना परिवार के लिए ... ये एक ऐसी धुरी है जो संबंधों को मजबूत करती है ...
कुछ लिखू, पर क्या लिखूं, अक्षरों की दुनिया में जाना तुम्हारे लिए । पर तुम मेरे लिए सदैव से वैसे ही हो ,अक्षरों और शब्दों से परे हो, शब्दो में क्षमता नही है, वो जो मेरे भाव को समेट सकेे, मेरी जीवन की धुरी तुम ही हो । एक सन्देश तुम्हारे लिए जो भेज रहा हु, क्या पता मेरा संदेशा पाने से पहले ही कही तुम इन पहाड़ी प्रदेश की घाटी में खो जाओ।
भटक गए तो मैं कहाँ तुन्हें ढूंढता फिरूंगा , मन बेचैन लग रहा है। हवा के झोंके से भी सशंकित हो जाता, कही कोई अपना तो नहीं टकरा गया। आँखों में मिलन की चाहत से ज्यादा शंका की परिछाई निखर रही है। प्रेम के कोरे कागज पर दिल में छपी हस्ताक्षर कही कोई पढ़ न ले। दिल में उमंगें कम वैचैनी का राग ज्यादा छिड़ा हुआ है। आज मन ज्यादा बैचैन है कई दिन गुजर गए अब। बीतते पल बदलते रूपो में नए नए कलेवर के साथ खुद को आनंददित करने के नए -नए बहाने होने चाहिए। कक्षा दसवी से न जाने कितने ही प्रेम-पत्र जिसको भेजे। कहना मुश्किल है। उसकेे प्रेम का पराभव भागते समय के साथ कही पीछे छूट सा गया । फिर भी उससे मिलने का इन्तजार आज भी रहता। जल क्या रहा है....रोम को तो सदियाँ गुजर गई...फिर जलने कि दुर्गन्ध ...नही..नही..मैं तो कहूंगा सुंगंध है...ये तो नहीं कि ये प्रेम-पत्र जलने का कारक है। छोड़ो जो भी है जाने दो । आप अभी प्रेम ही पढ़ो। इस गाँव के बीच में वह सुन्दरी कौन है, जो पीले पत्तों के बीच में नई कोंपल के समान दिखाई पड़ रही है।’ क्या ये वो ही तो नहीं जिसे देखने के लिए पनघट के पास वाले पीपल के पेड़ के नीचे जिसका तुम इंतजार करते थे। आज इतने दिनों बाद देखना ऐसा लग रहा था जैसे आग की गर्मी से मुर्झाया पत्ता ओस की बूँदें पड़ने पर पुनः ताजा हो उठत हैं। वह भी ऐसे देख रही थी कि शिकारी का जाल देख जैसे हिरणी टुकुर-टुकुर देखती है, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अभी-अभी खिला चमेली-पुष्प बिखरकर नीचे गिर पड़ा हो। कारण ज्ञात होने पर पता चला उसका छोटा भाई उसके साथ है, वह अकेली नहीं है, ऐसा सोचने के कारण निराश थी। प्रेम निर्माण के आरम्भ के बारे में सोचना आनन्दमय होता है, लेकिन ढह जाने और पुराना पड़ जाने का विचार बहुत दुखमय होता है। राजमहल का जंगल में परिवर्तित हो जाना, राजा का पद्च्युत होकर जंगलों में खो जाना, धनवान का दरिद्र हो जाना-कितना हृदयविदारक होता है! कुछ ऐसा ही वो बचपन का प्रेम था। अब वह मन मे व्याकुलता लिए हुए घर की तरफ कुच कर रहा था। जैसे एक ही डाली पर बैठे दो पक्षियों में से एक पकड़ लिया गया हो, एक ही डंठल पर साथ खिले दो फूलों में से एक को तोड़ दिया गया हो।
by सुनील मोगा
कुछ लिखू, पर क्या लिखूं, अक्षरों की दुनिया में जाना तुम्हारे लिए । पर तुम मेरे लिए सदैव से वैसे ही हो ,अक्षरों और शब्दों से परे हो, शब्दो में क्षमता नही है, वो जो मेरे भाव को समेट सकेे, मेरी जीवन की धुरी तुम ही हो । एक सन्देश तुम्हारे लिए जो भेज रहा हु, क्या पता मेरा संदेशा पाने से पहले ही कही तुम इन पहाड़ी प्रदेश की घाटी में खो जाओ।
भटक गए तो मैं कहाँ तुन्हें ढूंढता फिरूंगा , मन बेचैन लग रहा है। हवा के झोंके से भी सशंकित हो जाता, कही कोई अपना तो नहीं टकरा गया। आँखों में मिलन की चाहत से ज्यादा शंका की परिछाई निखर रही है। प्रेम के कोरे कागज पर दिल में छपी हस्ताक्षर कही कोई पढ़ न ले। दिल में उमंगें कम वैचैनी का राग ज्यादा छिड़ा हुआ है। आज मन ज्यादा बैचैन है कई दिन गुजर गए अब। बीतते पल बदलते रूपो में नए नए कलेवर के साथ खुद को आनंददित करने के नए -नए बहाने होने चाहिए। कक्षा दसवी से न जाने कितने ही प्रेम-पत्र जिसको भेजे। कहना मुश्किल है। उसकेे प्रेम का पराभव भागते समय के साथ कही पीछे छूट सा गया । फिर भी उससे मिलने का इन्तजार आज भी रहता। जल क्या रहा है....रोम को तो सदियाँ गुजर गई...फिर जलने कि दुर्गन्ध ...नही..नही..मैं तो कहूंगा सुंगंध है...ये तो नहीं कि ये प्रेम-पत्र जलने का कारक है। छोड़ो जो भी है जाने दो । आप अभी प्रेम ही पढ़ो। इस गाँव के बीच में वह सुन्दरी कौन है, जो पीले पत्तों के बीच में नई कोंपल के समान दिखाई पड़ रही है।’ क्या ये वो ही तो नहीं जिसे देखने के लिए पनघट के पास वाले पीपल के पेड़ के नीचे जिसका तुम इंतजार करते थे। आज इतने दिनों बाद देखना ऐसा लग रहा था जैसे आग की गर्मी से मुर्झाया पत्ता ओस की बूँदें पड़ने पर पुनः ताजा हो उठत हैं। वह भी ऐसे देख रही थी कि शिकारी का जाल देख जैसे हिरणी टुकुर-टुकुर देखती है, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अभी-अभी खिला चमेली-पुष्प बिखरकर नीचे गिर पड़ा हो। कारण ज्ञात होने पर पता चला उसका छोटा भाई उसके साथ है, वह अकेली नहीं है, ऐसा सोचने के कारण निराश थी। प्रेम निर्माण के आरम्भ के बारे में सोचना आनन्दमय होता है, लेकिन ढह जाने और पुराना पड़ जाने का विचार बहुत दुखमय होता है। राजमहल का जंगल में परिवर्तित हो जाना, राजा का पद्च्युत होकर जंगलों में खो जाना, धनवान का दरिद्र हो जाना-कितना हृदयविदारक होता है! कुछ ऐसा ही वो बचपन का प्रेम था। अब वह मन मे व्याकुलता लिए हुए घर की तरफ कुच कर रहा था। जैसे एक ही डाली पर बैठे दो पक्षियों में से एक पकड़ लिया गया हो, एक ही डंठल पर साथ खिले दो फूलों में से एक को तोड़ दिया गया हो।
by सुनील मोगा
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