भारत एक ऐसा देश है जहां के फौजी उसी देश के नागरिकों से पत्थर खाकर भी उन्हीं नागरिकों की रक्षा करते हैं !। ये फौजी देश के किसी छोटे गाँव में बसे साधारण लोग होते हैं , आपसे और मुझसे बहुत अलग। और गरीब परिवारों के बेटे होते हैं! एलीट क्लास के लोग अपने बच्चों को कभी भी फौजी नहीं बनाते क्योंकि उनको लगता है,वहां पर कोई खास स्कोप नहीं है! यह गांव देहात से निकले किसानों के बच्चे ही फौजी बनते हैं,वैसे इनकी कहानियाँ कहीं नहीं छपती इनकी तस्वीरों को कोई फेसबुक पर लाइक नहीं करता। हम वो लोग हैं जो कैलेंडर की तारीखों के हिसाब से उस फौजी को याद करते हैं हमारा राष्ट्रप्रेम किश्तों में बाहर निकलता है। इन लोगों को कभी सिनेमा घरों में जाकर राष्ट्र प्रेम अनुभव करने का अवसर नहीं मिलता,पर देश के लिए ये जो रोज़ , हर पल , हर दिन करतें है , वो आप और मैं कभी नहीं कर सकते। जितना मुश्किल उस फ़ौज़ी के लिए ठण्ड में सरहद पर खड़ा होना होता है , उतना ही मुश्किल उसके परिवार के लिए उस गाँव में अकेले रहना होता है, उतना ही मुश्किल उन दो बच्चों का रोज़ स्कूल अकेले जाना होता है । आपको सरहदों की तस्वीरों में वो फ़ौजी तो नज़र आता है , पर उसका पिता , उसकी माँ उसके बच्चे नज़र नहीं आते। ना पिता का वो गर्व नज़र आता है ना माँ का डर। हम हर साल कैलेंडरों की उन तारीखों पर फ़िर चाहे वो 15 अगस्त हो ,26 जनवरी हो या कारगिल का विजय दिवस, उन फौजियों को याद करते हैं , पर हम कहीं न कहीं उनके परिवारों को भूल जातें हैं।एक फ़ौजी जब फ़ौज में जाता है ,वो अकेला नहीं जाता , उसके साथ उसका पूरा परिवार जाता है , वो अकेला ठण्ड में सरहदों पर खड़ा नहीं रहता ,उसके साथ उसका पूरा परिवार खड़ा रहता है! जब जंग होती है तो उस जंग में वो फौजी अकेला नहीं लड़ता , उसके साथ उसका पूरा परिवार लड़ता है, और जब फ़ौजी शहीद हो जाता है, जब वो मरता है! वो अकेला नहीं मरता , उसके साथ उसका पूरा परिवार मरता है, अपने परिवार की रोजी-रोटी देश की शान के लिए गोली के निशाने पर खड़े हैं! कल देर रात घर वापस आया ठण्ड ज्यादा थी , बचाव के मुकम्मल कपड़ो के बाद भी ठण्ड का एहसास तरी हो रहा था, मोबाईल मेरे शहर का तापमान 20 डिग्री के आस पास का बता रहा था , उत्सुक्तावास सियाचिन का पारा सर्च किया " -27 डिग्री " यानि जिस्म का लहू भी बर्फ का रूप अख्तियार कर ले ! और उसी सियाचिन की सीमा पर हमारा कोई भाई , किसी का बेटा , किसी का सुहाग , किसी का पिता और सबसे पहले भारतीय सेना का कोई जवान एक छोटे से बर्फ से ढके बनकर में बंदूक थामे रात के इस पहर सजक खड़ा था ,कमरे में रूम हीटर जला कर रजाई में दुबक कर सुकून से सो सके। मुझे मेरे एक रिश्तेदार फौजी की डायरी हाथ लग गई थी कुछ दिन पहले उसमें मैंने जो पढ़ा तो उसको पढ़ते हुए में डूब ही गया उसमें लिखा था!वो ऐसी जगह है, जहां पर ऑक्सीजन भी आते आते अपने प्राण छोड़ देती है, और वहां पर सांस लेने के लिए भी जूझना पड़ता हैं, तापमान कम होने के कारण सांस लेने में भी तकलीफ होती है, डिब्बाबंद खाना खाते हैं, और खाना खाते हुए ऐसा महसूस होता है! जैसै कोई खाना नहीं मिट्टी खा रहे हैं कम तापमान की वजह से और ऑक्सीजन की कमी होने के कारण खाना भी बेसवाद लगता है!बर्फ को गर्म करके पानी पीना पड़ता है!माइनस 40 डिग्री के तापमान में जहां तक नजर पड़े सूरज की धूप बर्फ पर आंखें चोंदिया देती हैं। कई बार तो इतने अकेले पड़ जाते हैं, कि हमें खुद से ही संवाद बिठाना पड़ जाता है!और हमारे दोस्त आसपास के पंछी कुछ कुत्ते बिल्ली जैसे जानवर ही बनते हैं। हमसे हमारे दुश्मन की दूरी केवल इतनी है कि वह हमें साफ साफ दिखाई देते हैं , कभी उधर के पाकिस्तानियों के रेडियो पर बजते हुए गुरदास मान,अत्ताउल्लाह खान,नुसरत फतेह अली खान, नसीबो लाल और अकरम राही के पंजाबी गाने और नाचते हुए पाकिस्तानी सैनिक साफ साफ दिखाई देते हैं, खैर फिर भी मैं खुश हूं क्योंकि मेरे ऊपर घर की बहुत सारी जिम्मेदारियां हैं, मुझे रोजगार की तलाश ने देशभक्त बनाया है, अब इसको मेरा रोजगार समझिए या देश भक्ति इस बात को मैं आप सबके ऊपर छोड़ता हूं। और जब पाकिस्तानी सिपाही छुट्टी जाते हैं,जोर जोर से चिल्लाते और कहते हुए निकलते हैं,"अस्सी तां चल्ले तुस्सी भी जाओ औऐ वेरियों ऐवै दुनिया लड़ लड़ के मुक जानी है" भारतीय सेना दिवस के इस मौके पर हम आपको दिल से सलाम करते हैं! आप के दम पर ही यह देश आबाद है! इस देश हजारों किलोमीटर चौड़े सीने पर अपनी छाती तान कर खड़े रहने वाले शेरो जयूंदै वसदे रहो।
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