निजीकरण का दुर्लभ दृश्य....

मरीजों के रिश्तेदारों व् अस्पतालकर्मियों के बीच झड़प के बाद अस्पताल के कर्मचारी सुरक्षा की मांग करते हुए हड़ताल कर देते है। तुरंत मामले को नहीं सुलझाया जाता। छोटी सी घटना को बड़ा रूप दिया जाता है। घटना को बड़ी करके पेश की जाती है व् इसकी आड़ में आला अधिकारी अपने चहेते को निजी सुरक्षा गार्ड उपलब्ध करवाने का ठेका दे देता है। निजी सुरक्षा गार्ड को कोई क़ानूनी अधिकार नहीं दिया जाता। इसलिए वो गेट के पास चुपचाप खड़े हो जाते है। कोई आये-कोई जाये, उसको कोई लेना देना नहीं होता। हाँ शक्ल देखकर वसूली करने का तरीका वो तुरंत सीख जाते है। 10 रूपए गार्ड को दो बेधड़क icu में पहुँच जाओ। गार्ड को क्या पता icu क्या होता है?सुबह 8से2 बजे अस्पताल में ड्यूटी करता है,शाम को सड़क किनारे ठेला लगाता व् रात को किसी एटीएम में जाकर सो जाता है।हो गई सुरक्षा! क्या करे सैलरी इतनी कम है तो और काम करना ही पड़ेगा!कोई गरीब रास्ता पूछ लिया तो उनके ऊपर चिल्लाकर अपनी भड़ास निकाल लेते है।ठीक ठाक कपड़ों में आने वाले तो एक मरीज के साथ 10 लोग भी घुस सकते है क्योंकि गार्ड तो खुद अपनी पहनी हुई वर्दी से ही डरता है।वर्दी देखकर सब जानते है कि यह निजी गार्ड है।इनके पास कोई पॉवर नहीं होती।जब भी डॉक्टरों व् परिजनों में झड़प होती है तो सबसे पहले ये रक्षक गायब होते है।झड़प के बाद कुछ सामान्य होता है तो ये जनाब प्रकट हो जाते है।कहते है मैं तो जी और लोगों को बुलाने गया था। अस्पताल में मरीजो के लिए दूध व् खाने का लुत्फ़ ये लोग मजे से उठाते है। ड्यूटी पर आते समय बैग जेब में होता है व् जाते समय भरा हुआ कंधे पर।सब जानते है,ऊपर से नीचे तक। गेट पर चेकिंग भी तो ये लोग ही करते है तो इनको रोकेगा कौन?दूध वाली ट्राली खींची है तो बदले में कुछ मिलना भी चाहिए। जैसे दूध की सप्लाई बँटाई पर दी गई हो। अपनों को सुरक्षा का ठेका दिया हुआ हो तो मॉनिटरिंग करने की जरुरत ही नहीं होती।शिकायत किसी ने कर दी तो करने वाले को लगेगा कि मेरे हाथों से बहुत बड़ा अपराध हो गया!फिर कसम खानी पड़ती है कि आज के बाद No complain!लेबर रूम का गेट गार्ड की नौकरी करने वालों के लिए स्वर्ग का द्वार है।सरकार अस्पताल में प्रसव को बढ़ावा देने के लिए 1800 रूपए का चेक देती है लेकिन उससे ज्यादा तो गेट पर व् अंदर आया और सफाई वाले वसूली कर लेते है।क्या नजारा होता है निजीकरण का!आदमी को पास में जाने नहीं दिया जाता और महिला को धमकाकर ले लेते है।

अगर अपनों को लाभ पहुँचाना हो सर्विस का आउटसोर्सिंग कर दो अर्थात ठेके पर दे दो।कुछ लोगों का नौकरी 
के नाम पर शोषण भी किया जा सकता है और रिकॉर्ड में सुविधा भी दर्ज हो जाती है।बड़ी बड़ी कॉन्फ्रेंस में दावे कर लिए जाते है कि देखो मैंने सिर्फ 2 लाख में सुरक्षा व् सफाई करवा दी।यह नहीं बताते कि निजीकरण के बाद लोगों को कितनी सुविधा हुई? अस्पताल के संसाधनों का कितना दुरपयोग हुआ है? यह तो एक विभाग की सीधे व् सरल रूप में निजीकरण की हकीकत बताई है।जहाँ जहाँ सीधे जनता से जुड़े विभागों में निजीकरण हुआ है वहां सब जगह यही हाल है।ईमानदार अफसर भी इस बात को मानते है।
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