वर्षों से देखता आया हूँ कि धार्मिक स्थलों को लोग बीमारियों के इलाज के स्थलों के रूप में मानते/प्रचारित/प्रसारित करते है।मैं इस बात से पूर्ण सहमत हूँ कि धार्मिक स्थल बीमार लोग ही चलाते है व बीमार लोगों से ही आबाद है।बीमारी चाहे मानसिक हो चाहे शारीरिक उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है!मजार,मूर्ति,कुंड की रखवाली करने वाले लोग मानसिक बीमार है तो वहां भटकने वाली भीड़ शारीरिक रुप से बीमार होकर अज्ञानता के कारण वहां पहुंचती है।मैंने कुछ दिनों पहले एक ईसाई धर्म के बाबा के बारे में जानकारी ली थी।वो बाबा तो चमत्कार इस अंदाज में करते है कि उनके आगे रजनीकांत का किरदार भी बौना नजर आता है।किसी भक्त के सामने हाथ किया और भक्त धड़ाम से जमीन पर गिरकर इस तरह की हरकतों को अंजाम देता है जैसे मछली को पानी से निकालकर मरुस्थल में फेंक दिया हो!ये बाबा लोग बड़े आराम से अज्ञानता का फायदा उठाते है।किताबी डिग्रियों व अवार्डों को कंधों पर लेकर घूमने वाले लोगों को आप वास्तविक ज्ञानी समझने की भूल मत करिए!ये मंदिर/मस्जिद/गिरिजाघर अज्ञानी भारतीयों की मानसिक गुलामी के प्रतीक है!ज्ञान वैज्ञानिक शिक्षा से ही प्राप्त होता है।हर चीज को तर्क की कसौटी पर आजमाकर स्वीकार करने की नसीहत सिर्फ विज्ञान ही देती है!
धर्म/चमत्कार/अध्यात्म आदि के नाम पर इस देश की जनता के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ किया गया है!पहले पंडितों ने जमकर लोगों को मूर्ख बनाकर ऐशो-आराम किये तो उसके बाद बाहर से आने वाले धर्मों ने भी पंडितों के धंधे से बहुत बड़ी सीख ली थी!इस्लाम मक्का में चमत्कार नहीं करता है लेकिन भारत मे आते ही मजारों-दरगाहों के माध्यम से सारे दुःख दर्द दूर करने का टेंडर प्राप्त कर चुका है!ईसायत यूरोप में विज्ञान को बढ़ावा दे रही है लेकिन भारत मे HIV/CANCER आदि बीमारियों का शर्तियाँ इलाज कर रही है!जैसा देश वैसा भेष हर किसी को बहुत अच्छा लगता है!इस देश की गरीब-लाचार-बेबस जनता के साथ हर धर्म के लोगों ने अपने-अपने हिसाब से अपना खेल खेला है।
अगर आइंस्टीन इस देश मे पैदा होता तो या तो तुलसीदास की तरह काल्पनिक साहित्य लिख रहा होता या पॉल दिनाकरन बाबा की तरह उसका भाविज बनकर हाथों को हवा में लहराकर चमत्कारों के चिराग जला रहा होता!अगर इन दोनों में सेट नहीं होता तो किसी मजार पर बैठकर सूफियाना अंदाज में कव्वाली सुना रहा होता!मनोरंजन के लिए हर प्रकार की कला जायज मानी जा सकती है लेकिन जनता की तकदीर व तदबीर ये लोग बनाने लगते है तो सवाल खड़े करना जायज माना जाना चाहिए!हम भारतीय अजीब लोग है!हमे न धर्म से लेना देना है न विज्ञान से!हमे संतुष्टि देने वाला वो हर हथकंडा सुहावना लगता है जो चमत्कारों में ले जाकर हमारी बुद्धि पर राख डाल दे!ब्राह्मणों ने 8-10 काल्पनिक साहित्य रच दिए और हम आज भी ढोएं जा रहे है!चाहे हम उनको स्वीकार करके ढो रहे हो चाहे विरोध करके लेकिन हम बोझ को किनारे करने को आज भी राजी नहीं है!ब्राह्मणवादी आडंबरों के अड्डों के पास जमा पूंजी बहुत है।ये लोग बड़े शातिर किस्म के लोग है!सदियों की बगावत व विद्रोह को बड़े शातिराना अंदाज में निगल गए!जो दूसरे धर्म आये उनको भी अपने रंग में रंग लिया।भारत मे धर्म का नेतृत्व ब्राह्मण कर रहे है व उनके सिपाही बौद्ध,जैन,इस्लाम,इसाई, सिक्ख बन चुके है!एक सेना के रूप में पूरा साजो-सामान इन्होंने जुटा लिया है!आप चाहे भारत मे मौजूद किसी भी धर्म को मानते हो लेकिन खाद तो ब्राह्मण धर्म की जड़ों में ही डाल रहे हो!इसलिए कहा गया है "यह हस्ती कभी मिटती नहीं!"
पिछले काफी दिनों में ओम बन्ना,बुटाटी धाम,बसंत लेन की दरगाह व बुराड़ी के चर्च से जुड़े लोगों ने मुझे बताया कि यहां वाकई चमत्कार होते है व दुर्घटना,लकवा, मन मांगी मुराद व असाध्य रोगों के इलाज होते है तो दिमाग मे चुभने वाली इन बातों को आपके साथ साझा करना जरूरी समझा है इसलिए लिख दिया।इन पाखंड के अड्डों पर अज्ञानी/लाचार/बेबस भीड़ को देखकर सिर शर्म से झुक जाता है व माथा पकड़कर बैठ जाता हूँ लेकिन क्या करे यह हस्ती है कि कभी मिटती ही नहीं?जब सारे पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी लोग अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए इनका गुणगान करने लग जाये तो बर्बाद हो रही नादान जनता को जागरूक कौन करे?जब इस देश के राजनेता इन चमत्कारिक अड्डों वाले सरगनाओं के चरणों मे गिरते नजर आए तो बेचारी जनता हौंसला खोकर इन अड्डों पर जाकर ही अपना माथा फोड़ने को मजबूर होगी!तिरुपति जाकर अमिताभ बच्चन करोड़ों दान करे तो उनके अनुयायी अपने बाल चढ़ाकर ही सही लेकिन दान देने की मजबूरी की पूर्ति तो करेंगे ही!श्रीनाथजी के मंदिर में अम्बानी परिवार सोने का मुकुट भेंट करेगा तो नादान लोग यह समझकर लड्डू क्यों नहीं चढाये कि यहां चढ़ावा करने से ही अरबपति बना जा सकता है!
इन फिल्मी हीरो,उद्योगपत्तियों ,राजनेताओं का इन धार्मिक अड्डों पर कोई विश्वास नहीं है लेकिन ये लोग अज्ञानी जनता को हांकने का नायाब नुस्खा सीख चुके है इसलिए खुद एकाध बार जाकर जनता को गड्ढों में धकेलने की लकीर खींच आते है!जनता लकीर की फ़क़ीर बनकर भेड़ चाल में इन अंधेरे कुओं में गिरती जाती है!कोई लालसा में लिपटा बीमार है तो कोई मुफ्त में जीवनयापन करने की फिराक में बैठा मानसिक बीमार है!कोई मंत्री बनने की आड़ में भटक रहा पेट की बीमारी से ग्रसित मरीज है तो कोई पद-प्रसिद्धि का भूखा धार्मिक चोला पहनकर दिमागी दिवालियेपन का मरीज है!मूर्ति/मजार/क्रोस के पास दिमागी संतुलन खोकर बैठा कोई बीमार हो या इन धर्मस्थलों के बाहर दो रोटी की आस में भिखारी के रूप में बैठा कोई बीमार हो!ये बीमारी व बीमारों के अड्डे इस देश की बर्बादी की असली जड़ है!जैसे जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ता जा रहा है वैसे वैसे ये बीमारी के अड्डे सजते जा रहे है!विज्ञान मरी जा रही है और अंधविश्वास की यह बीमारी बढ़ती जा रही है!सेटेलाइट भेजने वाले वैज्ञानिक रातभर हनुमान चालीसा पढ़ते है और सुबह इस देश का प्रधानमंत्री अगरबत्ती करके राकेट लांच करने पर बधाई देता है!
बड़ी विडंबना व भयंकर मंजर में फंसी इस देश की जनता को कौन बचाये?हर कोई गरीब बेबस लोगों को अपने उपभोग की वस्तु समझकर अपनी अपनी चालें चल रहा है।धर्म की दुकाने ठंडी होने लगी तो जातीय दुकाने सज चुकी है!ये दुकाने चलती रहेगी व इनकी आड़ में जनता जलती रहेगी!मानवता व इंसानीयत धर्म के प्रेमी लोगों से मेरा निवेदन है कि आलस की चादर को उतारकर अब मैदान में आ ही जाइये क्योंकि अब चमत्कारों की आड़ में दुनियाँ की आंखों में धूल झौंकना आसान नहीं है!या तो तुम्हारी दुकाने बंद होगी या इस देश की जनता कीड़े-मकोड़ों की मति मरेगी!
"हस्ती है कि कभी मिटती नहीं!"
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