तस्वीरों से नसीहत!

तस्वीरों से नसीहत!

जब आप लोग इन दो तस्वीरों को देख रहे होंगे तो कई तरह के ख्याल आपके मन मे आ रहे होंगे!तस्वीरें उम्मीदें जगाती है तो तस्वीरें विचलित कर देती है!तस्वीरें जोश पैदा करती है तो तस्वीरें निराशा पैदा कर जाती है।इसलिए कहा जाता है कि तस्वीरें बोलती है।ये दोनों तस्वीरें बोल रही है,हमसे कुछ कह रही है,कुछ निवेदन कर रही है सोचने,समझने,बोलने,लिखने, करने को!

गुरबत,अज्ञानता व मानसिक गुलामी पर धर्म की बुनियाद टिकी होती है।धर्म के झंडा-बरदार विलासिता पूर्ण जीवन जीते है और गुरबत इनको नमन करती है,अज्ञानता इनका बोझ उठाती है व मानसिक गुलामी इनके वजूद को कायम रखने में मददगार होती है।एक तरफ धर्मखोर ऊंचाइयों का आचमन करते है तो दूसरी तरफ इनके पीछे चलने वाले लोग बर्बादी के मंजर में फंसकर खत्म होते जाते है!

दिवाली पर अयोध्या में सरकारी तामझाम के साथ लाखों दीपक जलाने का जलसा करके धर्म को मजबूत किया जा रहा था उसके बाद दीयों में बचे तेल को एकत्रित करती मासूम बच्ची की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई तो धर्म की महानता का लवाजमा उतर गया!एक तस्वीर ने सब कुछ बयाँ कर दिया!यह तस्वीर बताती है कि धर्म का गरीबों के कल्याण में,मानवता के उद्धार में कितना योगदान रहा है!

दूसरी तस्वीर शादी के त्यौहार पर दरबान बने एक बच्चे की है जो कड़ाके की ठंड में नंगे बदन खड़ा है।चंद रुपयों के लिए बचपन ही इंसानियत का ताबूत बनकर झकझोर रहा है!एक हाथ मे धर्म व दूसरे हाथ मे पूंजी आ जाती है तो अमीरी मानवता का अभिशाप बन जाती है!

जहां अमेरिकी उद्योगपति वारेन बफेट अपनी पूंजी का 90%हिस्सा गरीबों के कल्याण में खर्च करता है भारतीय उद्योगपति मुकेश अम्बानी कहता है कि मै चैरिटी नहीं करता,देश की संपदा बढ़ाने में योगदान करता हूँ!जहां युवा अमेरिकी उद्योगपति मार्क जकरबर्ग अपनी पूंजी का 98%हिस्सा चैरिटी में देता है तो भारतीय उद्योगपति चैरिटी करने के बजाय सरकार द्वारा चलाई जा रही जन-कल्याणकारी योजनाओं को ही गलत साबित करने में लगे है!

भारतीय संस्कृति की महानता का कितना ही ढिंढोरा पीट लिया जाए मगर इस संस्कृति में गरीबों के उद्धार के लिए कोई जगह नहीं है!भारतीय इतिहास में गरीबों के कल्याण के कार्यों के उदाहरण नगण्य है तो शोषण की गाथाओं का विराट साहित्य है!धर्म हो चाहे अमीरी भारतीय संदर्भ में सदा दिखावे की विषयवस्तु रही है।न धर्म की लिखित शिक्षाओं पर कोई चलता है न अमीरी के उपभोग का तरीका हमे आता है!

शादीस्थल के गेट पर ठंड से कराहते इस बच्चे को सैंकड़ों लोगों ने देखा होगा मगर किसी के दिल मे इतनी सी भी इंसानियत नहीं बची कि 200-500रुपये देकर बालक को इस तड़प से छुटकारा दिलवा सके!यहां खड़ा होना इस अबोध की मजबूरी है!हो सकता हो बीमार माँ की दवाई का इंतजाम करना हो!हो सकता हो घर पर छोटे भाई-बहन रोटी का इंतजार कर रहे हो मगर शादी में शरीक होने वाले लोगों की क्या मजबूरी रही होगी कि आंखों के आईने में देखकर भी असलियत से मुँह मोड़ गए!यह हम भारतीयों का चरित्र है।सिर्फ वर्तमान का ही नहीं बल्कि हजारों सालों से भारतीय समाज का यही चरित्र रहा है!

जब अयोध्या नगरी में धर्म अपना प्रदर्शन करके उठा तो इसके इतिहास की विचलित करने वाली सच्चाई का ख़ौफ़नाक चेहरा बनकर यह मासूम हमारे दिमाग मे बैठ गई!हम न धर्म को मानवता के पटल पर ला सके न पूंजी को!दोनों का प्रयोग मात्र दिखावे के लिए करते है।हम धर्म के मोर्चे पर भी असफल समाज रहे है व पूंजी प्रदत प्रगति के मोर्चे पर भी।हमारे अंदर आत्मसात करने का गुण नहीं है।हम जुलूस,जलसों,शोभायात्राओं को ही धर्म व पूंजी के प्रदर्शन को ही निहायत अमीरी समझ बैठे है!यही कारण है कि चंद धर्मखोर धर्म पर कब्जा किये बैठे है तो खालिस लुटेरे पूंजीपति बने बैठे है!

क्या ये दो तस्वीरें दोनों मोर्चो अर्थात धर्म और अमीरी के मुँह पर तमाचा नहीं मार रही है?

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