जब कलम सत्ता का मुखौटा बन जाये तो कहा जाता है कि लोकतंत्र लंगड़ा हो जाता है।लगातार 6साल तक तमाम मीडिया संस्थान व बड़े-बड़े पत्रकार सरकार की तरफ से देश की जनता के खिलाफ लड़ रहे थे मगर जनता से जीत नहीं पाए।
आज हालात ये हो गए है कि लोग मीडिया को सिर्फ तमाशबीन मदारी समझते है,विश्वसनीयता खो चुका मीडिया अब सनसनी के माध्यम से टीआरपी की जंग लड़ रहा है।
दूसरी बात यह सामने आ रही है कि दलाल पत्रकार,बुद्धिजीवी, आईटी सेल और भटकी व भक्त बनी जमात देश की जनता के आगे हारने लगी तो पुलिस का उपयोग कानून के रखवालों के रूप में लेने के बजाय संघी गुंडों की तरह लेने लग गई जिसके कई फोटो/वीडियो सामने आ चुके है!
तीसरी बात यह सामने आ रही है कि अब मोदी-शाह की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है।बार-बार दिए गए आश्वासन हवाई हो गए।अब अंधभक्तों की फौज को जनता के खिलाफ सड़कों पर उतार दिया है।सरकार के दिग्गज अब जनता को समझाने निकल रहे है कि उनसे क्या कांड हो गया!
चौथी बात यह सामने आ रही है कि तमाम पुरानी विपक्षी पार्टियाँ विरोध की रस्म-अदायगी तक सीमित रही मगर देश के युवा सशक्त विपक्ष के रूप में उभरे व सरकार आज घुटनों के बल पर है चाहे खुलकर जाहिर न कर पाएं!
पांचवी व महत्वपूर्ण बात यह रही कि सियासत ने जो धार्मिक ध्रुवीकरण का खेल खेलना चाहा उसे जागरुक युवाओं ने नकार दिया और विरोध के बीच बेरोजगारी,आर्थिक मंदी,महंगाई,किसान-मजदूर के मुद्दों की आवाज गूंज रही है।
अब मीडिया युवाओं के निशाने पर है व सरकार जनता के बीच जा रही है तो जरूर इन मुद्दों पर सवाल होंगे जिसका जवाब देते नहीं बनेगा!इस आंदोलन से सुकूनभरी बात यह निकलकर सामने आ रही है कि तमाम कोशिशों के बावजूद युवाओं के बीच धार्मिक दीवारें ध्वस्त हो रही है!
युवा जाहिलयत से बाहर निकलकर बुनियादी मुद्दों पर एकजुट हो रहा है,अपनी आवाज बुलंद कर रहा है,पिछली पीढ़ी द्वारा की गई गलतियों पर मिट्टी डालकर आगे बढ़ना चाह रहा है जिसका सबूत धारा 370 हटाने,मंदिर-मस्जिद फैसले व अभी चल रहे आंदोलन से मिलता है!
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