ऐंटी फेसबुक

बचपन में मुझे लिखने का बहुत शौक था।शौक तो आज भी है लेकिन लिखने से पहले बहुत सोचता हूँ।
बचपन में कॉपियां सीमित मिलती थी तो दीवारों पर लिखकर अपना शौक पूरा करता था।लिखता तो आज भी हूँ  लेकिन आभासी दुनियां की इन दीवारों पर।जहाँ मुझे खुद नहीं पता होता कि कौन-कौन पढ़ते होंगे? किस-किस को पसंद आया होगा।लेकिन लिखता जाता हूँ कभी 16 साल के युवा द्वारा मिर्जा ग़ालिब के अंतिम  क्षणों की लिखी शायरी पढ़कर हँसता हूँ तो कभी बुजुर्ग द्वारा अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव में मंजिले प्राप्त करने की चाहत लिखी पोस्ट गुदगुदाती है।क्या जीवन व् आसपास में इतनी नकारात्मकता आ गई है कि इसके लिए हमें इधर-उधर से चुराई शायरी के साथ खुद का फोटो चस्पा करके इस गुमसुम सी दुनियां से पूछना  पड़ रहा कि दोस्तों मैं कैसा लग रहा हूँ?वाकई सोशल साइट्स को बनाने का मकसद तो कुछ और ही रहा होगा लेकिन मानव की नकारात्मक रचनात्मकता ने इसको भी नहीं छोड़ा।शुरू शुरू में मैंने फेसबुक को अपना विचार व्यक्त करने का माध्यम माना।लेकिन धीरे-धीरे इस दीवारों पर चहुँ और छाई हताशा,निराशा व् ड़ास निकालती पोस्ट देखकर परेशान हो गया।नफ़रत,साम्प्रदायिकता,जातीय विद्वेष में सिमटी लोगों की सोच ने इन दीवारों पर भी कब्ज़ा कर लिया।अगर किसी ने पोस्ट पर मतभेद व्यक्त कर दिया तो ऐसी भाषा में प्रतिशोध होगा कि आपको लगने लगेगा सामने वाला 9 महीने माँ की कोख के बजाय संस्कारवान गालियों के कल कारखाने में निर्मित होकर आया हो।वाकई दुनियां अजीब है।डरपोक लोगों की दुनियां।किसी लड़की को चाहते तो हो लेकिन सामने कह नही पाते इसलिए यहाँ आकर भड़ास निकाल दो।दिल में किसी के प्रति चाहत न होते हुए भी झूठी शान के लिए यहाँ आकर मनमौजी आशिक बन सकते हो।ऑफिस में किसी से अनबन हो गई लेकिन मुँह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाये,लेकिन यहाँ पर शेर की तरह दहाड़ती अँगुलियों से शब्द बाण चलने लगते है।कुछ करने की चाहत तो होती है लेकिन हौंसला कर नहीं पाते,तो अपनी खुन्दस निकालने के लिए इससे बेहतर जगह हो नहीं सकती। है न अजीब दुनियां।घर में छोटा भाई सही दिशा-निर्देश के अभाव में गलत राह पकड़ रहा है लेकिन हमारे पास वक्त नहीं है लेकिन यहाँ सबको ज्ञान की टोकरियाँ मुफ़्त में थमाते न तो वक्त की कमी होती है न जानने की आवश्यकता कि ज्ञान जा कहाँ रहा है?ज्ञान की झूठी  शेखी जो बघारनी है।तो करना ही पड़ेगा।अगर किसी बात पर किसी से बहस हो गई तो हिम्मत व् निडरता  दिखाने के लिए ऐसा ज्ञान पेलने लग जाते है जैसे दुनियां का निर्माण ही इन महापुरुष के हाथों से हुआ हो! सुबह-सुबह उठकर अपना फेसबुक अकाउंट खोलते ही हताशा,निराशा,हिंसा,क्रोध आदि से लबरेज दीवार खुलती है।सोचता हूँ काश यह दीवार आभासी न होती तो रंग का ब्रश लेकर रंग-बिरंगी बना दूँ।अन्धविश्वास का महिमामंडित करती किसी शिक्षित युवा की पोस्ट देखता हूँ तो खुद भी क्रोधित हो जाता हूँ।कमेंट्स करने की इच्छा होती है लेकिन खुद को रोक लेता हूँ।अगर कुछ लिख दिया तो लोग मेरे बारे में नकारात्मक धारणा बना लेंगे।जो लोग व्यक्तिगत तौर पर मुझे नहीं जानते है वो इसी माध्यम से मेरा विश्लेषण करते है।सोच तो जाहिर होती ही है।लेकिन किसी एक पोस्ट के माध्यम से आंकना जायज भी नहीं है। मैं मानता हूँ कि इस माध्यम से  मैं आपके विचार व् धारणा को नहीं बदल पाउँगा।लेकिन यही बात सबको ध्यान में रखनी होगी।सकारात्मक  सोच सृजनात्मक कदम व् सतत लगन कुछ नया परिणाम दे सकती है।इस नकारात्मक आभासी दुनियां के चक्कर में वर्षों से सींचे उस पौधे को नहीं सूखने देना है जो वास्तविक अपना है।दोस्तों की संख्या के चक्कर में मैं मेरे बचपन के चंद दोस्तों को भूलना नहीं चाहता।फेसबुक पर मैंने कभी सवाल नहीं उठाये है लेकिन इसके उपयोग करने के तरीके पर सवाल जरूर है और आगे भी रहेंगे।
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