Great indian democracy

ऐसा देश जहाँ लोगों को दो वक्त का खाना नहीं मिलता,पीने को पानी नही मिलता,उलटी दस्त के इलाज के  लिए 5 रूपए का जीवन रक्षक घोल नही मिलता।किसी को सोमालिया समेत गरीब अफ़्रीकी देशों में मरती इंसानियत पर दया आ रही हो तो आपको उसका नज़ारा देखने के लिए वहां की यात्रा करने की कतई आवश्यकता नहीं है।आप झारखण्ड व् पश्चिमी बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र का दौरा कर यह परम कार्य कर सकते है।आप ओड़िसा का दौरा कर सकते है। जहाँ अपार प्राकृतिक सम्पदा हो,बड़े बड़े उद्द्योग लगे हो,देश को रोशन व् आर्थिक विकास को गति देने वाले लोहे व् कोयले के अथाह भंडार हो वहां गरीबी का दुष्चक्र क्यों है? रानी गंज मयूरभंज बोकारो,जमशेदपुर आदि शहरों के नाम तो किताबों में पढ़े होंगे!गर्व भी खूब किया होगा। हो भी क्यों नही?जो देश को रोशन करने के साथ-साथ दुनिया के बराबर खड़ा किया है।ये ऐसे क्षेत्र है जहाँ सदियों से गरीब आदिवासी लोग रहते आये है।काले कानूनों की आड़ में जमीन छीन ली गई,पुनर्वास के नाम पर बिचौलियों ने खूब चांदी काटी।मुवावजे के नाम पर जो कागज तैयार हुए वो समय बीतने के साथ खुद-ब-खुद ख़राब हो गए,कुछ करने की जरुरत ही नही पड़ी। आदिवासी लोगों पर बहुत झुल्म् ढहाये गए,नक्सली लोगों ने खाने का लालच देकर अपने साथ जोड़ लिया।ईसाई मिसनारियों ने भी प्रार्थना करवा करवा कर खूब बेवकूफ बनाया।अब घर वापसी के नाम पर फिर से ठगने की तैयारी होने लग गई।नहीं बदलता तो बस इनका बदनसीब।क्या करे इस भूखी मानवता की दौड़ में दौड़ना ही पड़ेगा।जिधर खाना दिखे उधर ही तो जायेंगे!जितनी क़ानूनी कोयले की खाने है उससे ज्यादा गैरकानूनी खाने है।कोई बोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता। समाचारों में सुनते होंगे किस प्रकार एक IPS अफसर को सफेदपोशों के गुंडों ने मार दिया।ऊपर सफेदपोश बैठे है तो मैदान में उनके गुर्गे काम कर रहे है। खेती की जमीन छीनकर खुदाई शुरू।दरोगा के पास जाये तो जान व् परिवार की हिफाजत का हवाला देकर चुप रहने की हिदायत दी जाती है।बंदूक की नोक पर थोक में वोट पड़ते है इसलिए सफेदपोशों ने जन सुनवाई को अपने सेलेबस में रखा ही नहीं।किसके सामने दुखड़ा रोये?अपने किस्मत को कोसकर ऊपर वाले को गाली देकर संतुष्ट होने का ढोंग करते है।ऐसे समय कोई नक्सली आकर उनके हाथ में बंदूक थमा देता है।वही गरीब देशद्रोही घोषित हो जाता है।या तो पुलिस की  गोली से ऊपर वाले से मिलान हो जाता है या जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। ना मीडिया स्वतन्त्र है यह पक्ष दिखाने के लिए ना ही स्वतन्त्र सोच के लोग है।सरकार में बैठे लोगों के चेहरे बदल जाते है,ठगने के तरीके बदल जाते है लेकिन गरीबों के बारे में नीतियाँ नही बदलती।थोडा बहुत ढोंग रच दिया जाता है।भूमि छीनने का नया बिल आ गया।जिसमे आपकी बिना सहमति के भी जमीन ले ली जायेगी।अरे जनाब इसमें नया क्या है?पहले भी कौनसी सहमति ली जाती थी?अगर सहमति ली जाती तो नक्सलवाद क्यों पैदा होता?जो लोग खेती करते थे वो रेल की पटरियों के पास झुग्गियों में रहने को क्यों मजबूर होते?विकास हमेशा गरीबों की कीमत पर ही क्यों होता है?जब अमीर लूटता है तो वो व्यापर कहलाता है।जब गरीब अपने हक़ के लिए खड़ा होता है तो कहा जाता कि वो दंगा फसाद कर रहा है,उपद्रव कर रहा है।नई नई परिभाषाएं गढ़कर लूटते रहो और गरीब हमेशा कुर्बानी देता रहे। हुक्मरानो व् अमीरों का गठजोड़ निराला होता है।जब सरकारी अधिकारी इनमे शामिल हो जाये तो सपनों व् उम्मीदों की हत्या होनी निश्चित है।यहाँ एक डिप्टी कलेक्टर 1000 करोड़ का मालिक बन जाता है,एक इंजीनियर हजारों करोड़ की सम्पति एकत्र कर लेता है। राजनेता कफ़न बेचकर खा जाते है।DGP खुद बुलेट प्रूफ जैकेट के नाम पर अपने ही मातहतों को मौत परोस देता है।एक डॉक्टर अपने मरीज का ही गुर्दा बेच देता है।जहाँ के अस्पताल श्मसान नजर आते है।स्कूलों में शिक्षा बिकती है।नकली खाने व् दवाइयों से हजारों लोग काल कवलित हो जाते है।गरीब हो ना!गरीब तो होते ही शोषण के लिए।चुनाव के समय खूब सपने दिखाए जाते है उन सपनो की कीमत भी वसूली जायेगी।कालेधन के नाम पर बहुत खुश हुए थे न!उस ख़ुशी की कीमत तो लगेगी ही। आप भी सोच रहे होंगे कि मैं यह बकवास क्यों कर रहा हूँ?जनाब क्या करूँ?एक नया भूमि अधिग्रहण बिल आया है उसको ध्यान में रखकर एक बार फिर से पढ़ लेना।आपको हर बात सच्ची लगेगी।आप अगर खेत में खड़े है या रास्ते से गुजरते फसले देख रहे है तो जी भरकर देख लीजियेगा।पता नही कब इस जगह किसी कंपनी की ईमारत बन जाये।आप यह कहना तो छोड़ ही दो कि मेरे पास इतनी जमीन है।बच्चों को पढ़ा देना ताकि बुढ़ापे में कम से कम खाली पेट तो ना सोना पड़े।सोओगे तो भी किसी को कोई लेना देना नही होगा।आपने अगर ध्यान से पढ़ लिया तो मेरा काम तो पूरा हो गया....

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