NGO अर्थात गैर सरकारी संगठन

जी हाँ हर व्यक्ति ने अपने जीवन में इस तरह का नाम कई बार सुना होगा।सुने भी क्यों नहीं,जिस देश में 1700 लोगों के लिए एक डॉक्टर हो,943 लोगों पर एक पुलिस वाला हो और उसी देश में लगभग 360 लोगों पर एक एन जी ओ हो तो भला नाम कैसे ना जाने!भारत में 33 लाख एनजीओ है।दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा। 4.8 लाख महारास्ट्र में तो 4.6 लाख आंध्र प्रदेश में।देश के छोटे से राज्य केरल में 3.3लाख एनजीओ है।दुनिया के विकास में इनका बहुत योगदान है।एमनेस्टी,ग्रीनपीस,रेडक्रॉस जैसे इंटरनेशनल एनजीओ है तो मुस्कान,सुमंगलम,बचपन बचाओ आदि लाखों की संख्या में स्थानीय एनजीओ काम कर रहे है। धार्मिक संस्थाओं,सामाजिक संस्थाओं या जन जागरूकता के उद्देश्यों से लबरेज ये संगठन आज हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते है।सत्ता बेलगाम ना हो जाये इसके लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका व् स्वतंत्र मीडिया के साथ ऐसे नागरिक समाज के संगठनो का होना जरुरी है।कुछ एनजीओ कंपनी एक्ट 1956 की धारा 25 के तहत सूचीबद्ध है तो कुछ वक्फ एक्ट 1923 के तहत।कुछ शिक्षा व् कुछ धर्म से सम्बंधित कानूनों के तहत।सबसे आसान तरीका है अपना समूह बनाओ व् कंपनी एक्ट के तहत एक आकर्षक नाम देकर सूचीबद्ध करवा लो। मेरा मकसद आपको यह जानकारी देकर एक एनजीओ खोलने के लिए प्रेरित करना कतई नहीं है।कुकुरमुत्तों की तरह रोज उगते इन संगठनो की हकीकत से रूबरू करवाना है।हर बड़े राजनेता या अफसर की पत्नी एक एनजीओ चला रही है।सारी समाजसेवा का जज्बा इन्हीं लोगों में जागृत हो गया हो ऐसा भी नहीं है।भ्रष्टाचार व् बेईमानी के पैसों को ठिकाने लगाने का काम इसके माध्यम से बखूबी हो जाता है।हर साल एनजीओ को फंडिंग 60 हजार से 80 हजार करोड़ रूपए के बीच होती है।इसके स्रोत देशी व् विदेशी हो सकते है।फंडिंग का 70% सिर्फ कार्यालयी खर्च दिखा दिया जाता है। आज ज्यादातर एनजीओ अपने मूल उद्देश्य से भटक चुके है।समाज सेवा,गरीबी उन्मूलन,शिक्षा,चिकित्सा व् जनजागरूकता को छोड़कर फंडिंग समूह का हित साधने में लगे हुए है।कुछ एनजीओ पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप लगे तो सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से जांच करवाई तो इस मकड़जाल का सच सामने आया।रूस के सहयोग से चल रही कुडनकुलम परियोजना अमेरिका को रास नहीं आई तो उनके फण्ड से चलने वाले एनजीओ ने स्थानीय लोगों को बरगलाकर विरोध में खड़ा कर दिया।परियोजना 2 साल लटकी रही।नुकसान देश को हुआ। नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाने वाली मेधा पाटेकर का काम सिर्फ विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ना था लेकिन वह इस पूरी परियोजना के खिलाफ खड़ी हो गई।सरदार सरोवर बाँध की ऊंचाई बढ़ाने के लिए 6 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा।यही हाल स्वामी अग्निवेश के जैतापुर परमाणु प्लांट के विरोध का है।गुजरात दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए पैसे इकठ्ठा करने वाली तीस्ता शीतलवाड़ पर खुद दंगा पीड़ितों ने केस ठोक दिया तो अब गिरफ़्तारी से बचने का हर हथकंडा अपनाने की कोशिश में है।सारे एनजीओ वाले चोर हो ऐसा भी नहीं है।अरुणा रॉय किसान मजदुर संगठन के नाम पर जमीनी हकीकत की लड़ाई लड़ रही है। अरविन्द केजरीवाल ने भी सुचना के अधिकार में अपनी महती भूमिका निभाई।जनलोकपाल के लिए किये आंदोलन ने देश के कोने कोने में जागरूकता फैलाई है।अन्ना हजारे भी एनजीओ के माध्यम से प्रेरक कार्य कर रहे है।इन चंद लोगों की अच्छाइयों को जानकर सारे एनजीओ को आँख मूंदकर नजर अंदाज कतई नहीं किया जाना चाहिए।पाई पाई का हिसाब लिया जाना चाहिए।उनको मिले पैसे उनकी व्यक्तिगत सम्पति नहीं है,ये पैसे गरीबो व् असक्तों के नाम पर जुटाया गया चंदा है।कहीं भी गड़बड़ी नजर आये तो इन तथाकथित सेवाभावी लुटेरों को सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए। विदेशों से मिले पैसे का हिसाब वार्षिक स्तर पर हर जिले के जिला कलेक्टर को दिया जाना चाहिए।चंदे का 30%से ज्यादा कार्यालयी खर्च नहीं होना चाहिए।कानून में बदलाव की जरुरत पड़े तो बदलाव किया जाना चाहिए लेकिन काले धन को सफ़ेद करने वाले,देश विरोधी कार्यों में लिपटे कार्यकता व् भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाली ये सफ़ेदी की दुकाने बंद होनी ही चाहिए।नहीं तो चाहत व् प्रसिद्धि के भूखे वहशी लोग दुनिया के हर मंच पर देश की गरिमा के साथ खिलवाड़ करेंगे।गरीब के नाम पर लूट के पैसों से ही गरीबों का शोषण करेंगे।
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