मैं संतोष रेड्डी,निवासी-करीमनगर,तेलंगाना,भारत......आत्महत्या कर रहा हूँ क्योंकि मैं स्कूल फीस नहीं भर पा रहा हूँ। एक गरीब किसान का बेटा इसलिए आत्महत्या कर लेता है कि हमारी व्यवस्था उसकी शिक्षा के लिए समुचित बंदोबस्त नहीं कर पाई।सरकारी स्कूलों का क्या हाल है,आप सब जानते हो?इसलिए गुस्ताखी कर डाली निजी स्कूल से शिक्षा लेने की,लेकिन उस स्कूल ने सूखे से तबाह किसान के बेटे की जिंदगी ही ले ली।हजार रूपए फीस में कम क्या पड़ गए गुरु-घंटाल ने इतना जलील किया कि उस गरीब को मौत को गले लगाना पड़ा। इस देश में किसान होना अपने आप में एक कलंक बन गया।न बच्चों को अच्छा खाना खिला सकते है न कपडे दिला सकते है।न शिक्षा की व्यवस्था कर पाते है न चिकित्सा की।नेताओं व् अफसरों के बच्चों को सब कुछ ग्रेड एक की सुविधा मिलती है।किसान के बच्चे हाशिये पर धकेल दिए जाते है।जो आरक्षण आदि संवैधानिक अधिकारों के सहारे आगे बढ़ रहे है वो आज आँखों में कंकड़ की तरह चुभने लगे है।गैर-बराबरी दूर करने व् न्याय देने की बजाय गरीबों के बच्चों को अँधेरे के गर्त में धकेला जा रहा है।जो नियति मानकर स्वीकार कर लेते है वो जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है।जो इक्के-दुक्के संघर्ष कर लेते है वो उदाहरण बन जाते है लेकिन व्यवस्था उस उदाहरण का भी उपहास उड़ाती है।ज्यादातर संतोष रेड्डी की तरह दुनियां को अलविदा कह देते है। जिस देश की व्यवस्था अन्नदाता को न्याय नहीं दे पाती उस व्यवस्था को एक दिन उजड़ना ही है। जिस दिन किसान ने अपने चैनल का स्विच-ऑफ कर दिया,उस दिन सबकी उम्मीदों का नेटवर्क जाम हो जायेगा।आज सिर्फ एक संतोष रेड्डी नहीं मरा है बल्कि हमारे सिस्टम का वो हर किरदार मरा है जो रोज हालात बदलने का दावा करता है।आज वो हर नेता मरा है जो अपने आप को किसान नेता समझता है।आज हर उस शख्स की आत्मा मरी है जो रोज गरीबों के लिए चल रही योजनाओं को कठघरे में खड़ा करता है।
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