अन्नदाता.......

मैं वाकई चिंतित हुं, किसानों को लेकर । मैं ही क्यों, मुझे लगता है कि लगभग हर कोई चिंतित रहता है, खासकर बुध्दिजीवी वर्ग । मैं उलझन में हूं और असमंजस में भी । आखिर ये शासन तंत्र की कोनसी साजिश  है कि किसान आदिकाल से जिस रूप में थे आज भी उसी रूप में चल रहे है और बाकि सब का विकास क्रम अनवरत जारी है । मुझे लगता है कि इस धरती पर कोई ऎसा काल नहीं रहा, जहां अन्नदाता की किसी ने सुध ली हो । गुजरे दौर में इस देश, समाज को अपनी उपयोगिता का प्रत्यक्ष अहसास सभी को कराया, वो किसान ही था।  हिन्दी फिल्मों में इसका चित्रण और गीतों में का दर्शन संभवत कितना है, कहना मुश्किल है । अब किसानों की कहानी समाज के बदलते स्वरूप और भागते समय के साथ कहीं पीछे छूट गई है और बिखरते सामाजिक परिद्रश्य में कहीं खो गई है । आजादी के बाद से ही विभिन्न राजनीतिक आन्दोलनो ने बेशक इस उपेक्षित और पिछ्ड़े वर्ग में राजनैतिक चेतना को जगाया है, उसका स्थान इतिहास में योगदान के रूप में दर्ज अवश्य होगा । किंतु उस उपलब्धि को कुछ ही लोगों के द्वारा हर बार चुनावी फसल काटने भर से इस वर्ग का उत्थान हो जाएगा, ऎसा नहीं है । मीडिया और सरकारें आज भी किसानों के प्रति उदासीन है और औपचारिकता निभा रहें है । जो कि विचारणीय है  |
भारत जैसे कृषिप्रधान देश में यदि किसानों के प्रति ऎसी उदासीनता  हो तो हमारी प्रगति और विकास की सारी बातें, हमारी सारी उपलब्धियाँ अर्थहीन हैं | देश के अर्थशास्त्रियों, देश की सरकार को सबसे पहले इसी पर पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts