लोकतंत्र का चौथा स्तंभ उद्योगपतियों के हाथों में है।एंकर-पत्रकार तो बिचारे ख़रीदे हुए घोड़े-गधे है। सच को छुपाकर झूठ को महिमामंडित करने के लिए ध्यान मालिकों पर दिया जाना चाहिए न कि इन पत्रकारो पर। इनको माँ -बहन की गालियां देने से क्या होगा?जब चौथा स्तंभ लोकतंत्र के प्रहरी से हफ्ता-वसूली वाली गैंग में तब्दील किया जा चूका है तो अपना घर चलाना पत्रकारों की भी मज़बूरी है। इसमें जनता भी कम दोषी नहीं है।जब टीवी में झूठ की झनकारे गूंजती है तो डाइनिंग रूम में सोफे पर बैठकर कूदने लगती है।पता होता है कि यह झूठ बोल रहा है लेकिन विरोधी पर हावी होकर जीत का आगाज तो कर ही रहा है। यहाँ भी उनको जीत से मतलब होता है। अगर हकीकत में कुछ बदलाव चाहे तो झूठ देखते ही चैनल बंद कर दो! हो जायेगा काम....
इस मामले मैं अख़बार वालों को मामूली राहत देने के मूड में हूँ क्योंकि ये लोग समस्याओं को आज भी जगह देते है व् हर तबके को उसकी रूचि के हिसाब से खबर परोसते है।इस देश में कुछ भाग्य हो या न हो लेकिन रोज भाग्यफल देखने वालों की कमी नहीं है इसलिए "कैसा रहेगा आज का दिन आपके लिए"जरूर देते है।बच्चे स्कूल जाने के बजाय आवारा घूमते रहते है।काम धंधा कुछ करना नहीं लेकिन रोज सुबह चौक-चौराहों पर अख़बार लिए भाग्यफल देखते चाचा-ताऊ नजर आ जायेंगे।कुछ बुढ़ापे की बीमारियों से ग्रसित लोग भावुक होकर अख़बार में उठावनी देखते रहते है।एक पेज अख़बार का बुढ़ापे के लिए आरक्षित होता है।आधे पेज में बिजली कटौती की टाइम-टेबल है इलाकों का नाम होता है जैसे इस टाइम के अलावे तो क्या मजाल है कि बिजली कट जाये?लोगों को चिढ़ाने के लिए अख़बार वाले ऐसी सूचनाएं जरूर देते है।एक पेज रोमियो टाइप के प्रेमी लोगों के लिए भी होता है।हर हीरो-हेरोइन की मिलने-जुलने की कथाएं ऐसे लिखी होती है जैसे महाभारत जैसे युद्ध के साक्षात् दर्शन करवा रहे हो! रसोई की रेसिपी के लिए तो बाकायदा एक अलग से छोटा अख़बार साथ में मुफ्त देते है जैसे यह रेसिपी पढ़कर ही गृहणियां व्यंजन बनायेगी और शाम को उनको न्यौता मिलने वाला हो!एक पेज शिक्षा के लिए भी समर्पित रखते है जैसे स्कूल तो बंद हो गए हो व् भावी शिक्षा का जिम्मा इनके कन्धों पर आ गया हो!एक पेज छुटभैये नेताओं के लिए जरूर रखते है जिसमे माला पहनना,साफा पहनना व् चीखते-चिल्लाते दिखाया जाता है ताकि अख़बार हॉकर के साथ-साथ ये छुटभैये नेता खुद खरीदकर बांटने लग जाये।कुछ नेता तो बाकायदा सोशल मीडिया में भी अख़बार की फोटो लेकर चस्पा करके बताते है कि देखो फलां अख़बार में मेरा नाम व् फोटो आया है।हो गया न मुफ्त में इंटरनेशनल प्रचार!मुख्य पृष्ठ पर जिलास्तर व् राज्यस्तरीय किसी गुंडे टाइप के नेताओं को जगह देते है ताकि लोग पढ़ने को उत्सुक ज्यादा हो! अगर 2रुपये में 16 पेज का अख़बार पाकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता तो वो मेरी तरह अति लालसा में लिप्त व्यक्ति है जो यह सोचता है कि यार ख़बरों के बजाय खाली 16 पेज हॉकर फेंकने लग जाये तो मजा आ जाये।कम से कम बच्चों के ड्राइंग बनाने के तो काम आएंगे!यह लिखकर मैं कोई अख़बार वालों की तौहीन नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनकी मज़बूरी बता रहा हूँ।बेचारे मेरी तरह कंगाली में भी कितनी ऊँची-ऊँची बातें लिख रहे है!बस इनसे एक ही शिकायत है कि ये लोग पाठक के बजाय ग्राहक ढूंढने लग गए जिससे कलम की ताकत कमजोर हो गई।मैं तो आज भी इनको पूरा सम्मान देता हूँ।टीवी-सोशल मीडिया के दौर में भी एक अख़बार रोज मंगाता हूँ चाहे सुबह हॉकर गेट पर फेंके तो ऐसा लगे कि कोई लाश फेंककर गया हो!हत्या-बलात्कार आदि से भरे पड़े होते है।यह नो नेगेटिव न्यूज़ वाला फंडा समझ से परे है।अगर अख़बार कमियां नहीं बताएगा तो सत्ता की नाकामियां जनता के सामने कौन लायेगा?लोकतंत्र में कलम सत्ता का मुखोटा बनकर चलेगी तो कलम का अंतिम संस्कार डिब्बों में बैठकर भौंकने वाले घोड़े एक दिन जरूर कर देंगे।मैं तो राजनैतिक कार्यकर्ताओं को आगाह कर रहा हूँ कि अगर आज मीडिया जिस रास्ते पर है उस पर लगाम नहीं लगी तो तुम्हारा रोजगार छीन जायेगा।पैसे के बूते मीडिया वाले प्रचार कर देंगे।तुम्हारी नौकरियां खतरे में है।
हमे मालूम है जन्नत की हकीकत
लेकिन खुश रहने के लिए ग़ालिब
ऐसे ख्याल भी अच्छे होते है.....
इस मामले मैं अख़बार वालों को मामूली राहत देने के मूड में हूँ क्योंकि ये लोग समस्याओं को आज भी जगह देते है व् हर तबके को उसकी रूचि के हिसाब से खबर परोसते है।इस देश में कुछ भाग्य हो या न हो लेकिन रोज भाग्यफल देखने वालों की कमी नहीं है इसलिए "कैसा रहेगा आज का दिन आपके लिए"जरूर देते है।बच्चे स्कूल जाने के बजाय आवारा घूमते रहते है।काम धंधा कुछ करना नहीं लेकिन रोज सुबह चौक-चौराहों पर अख़बार लिए भाग्यफल देखते चाचा-ताऊ नजर आ जायेंगे।कुछ बुढ़ापे की बीमारियों से ग्रसित लोग भावुक होकर अख़बार में उठावनी देखते रहते है।एक पेज अख़बार का बुढ़ापे के लिए आरक्षित होता है।आधे पेज में बिजली कटौती की टाइम-टेबल है इलाकों का नाम होता है जैसे इस टाइम के अलावे तो क्या मजाल है कि बिजली कट जाये?लोगों को चिढ़ाने के लिए अख़बार वाले ऐसी सूचनाएं जरूर देते है।एक पेज रोमियो टाइप के प्रेमी लोगों के लिए भी होता है।हर हीरो-हेरोइन की मिलने-जुलने की कथाएं ऐसे लिखी होती है जैसे महाभारत जैसे युद्ध के साक्षात् दर्शन करवा रहे हो! रसोई की रेसिपी के लिए तो बाकायदा एक अलग से छोटा अख़बार साथ में मुफ्त देते है जैसे यह रेसिपी पढ़कर ही गृहणियां व्यंजन बनायेगी और शाम को उनको न्यौता मिलने वाला हो!एक पेज शिक्षा के लिए भी समर्पित रखते है जैसे स्कूल तो बंद हो गए हो व् भावी शिक्षा का जिम्मा इनके कन्धों पर आ गया हो!एक पेज छुटभैये नेताओं के लिए जरूर रखते है जिसमे माला पहनना,साफा पहनना व् चीखते-चिल्लाते दिखाया जाता है ताकि अख़बार हॉकर के साथ-साथ ये छुटभैये नेता खुद खरीदकर बांटने लग जाये।कुछ नेता तो बाकायदा सोशल मीडिया में भी अख़बार की फोटो लेकर चस्पा करके बताते है कि देखो फलां अख़बार में मेरा नाम व् फोटो आया है।हो गया न मुफ्त में इंटरनेशनल प्रचार!मुख्य पृष्ठ पर जिलास्तर व् राज्यस्तरीय किसी गुंडे टाइप के नेताओं को जगह देते है ताकि लोग पढ़ने को उत्सुक ज्यादा हो! अगर 2रुपये में 16 पेज का अख़बार पाकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता तो वो मेरी तरह अति लालसा में लिप्त व्यक्ति है जो यह सोचता है कि यार ख़बरों के बजाय खाली 16 पेज हॉकर फेंकने लग जाये तो मजा आ जाये।कम से कम बच्चों के ड्राइंग बनाने के तो काम आएंगे!यह लिखकर मैं कोई अख़बार वालों की तौहीन नहीं कर रहा हूँ बल्कि उनकी मज़बूरी बता रहा हूँ।बेचारे मेरी तरह कंगाली में भी कितनी ऊँची-ऊँची बातें लिख रहे है!बस इनसे एक ही शिकायत है कि ये लोग पाठक के बजाय ग्राहक ढूंढने लग गए जिससे कलम की ताकत कमजोर हो गई।मैं तो आज भी इनको पूरा सम्मान देता हूँ।टीवी-सोशल मीडिया के दौर में भी एक अख़बार रोज मंगाता हूँ चाहे सुबह हॉकर गेट पर फेंके तो ऐसा लगे कि कोई लाश फेंककर गया हो!हत्या-बलात्कार आदि से भरे पड़े होते है।यह नो नेगेटिव न्यूज़ वाला फंडा समझ से परे है।अगर अख़बार कमियां नहीं बताएगा तो सत्ता की नाकामियां जनता के सामने कौन लायेगा?लोकतंत्र में कलम सत्ता का मुखोटा बनकर चलेगी तो कलम का अंतिम संस्कार डिब्बों में बैठकर भौंकने वाले घोड़े एक दिन जरूर कर देंगे।मैं तो राजनैतिक कार्यकर्ताओं को आगाह कर रहा हूँ कि अगर आज मीडिया जिस रास्ते पर है उस पर लगाम नहीं लगी तो तुम्हारा रोजगार छीन जायेगा।पैसे के बूते मीडिया वाले प्रचार कर देंगे।तुम्हारी नौकरियां खतरे में है।
हमे मालूम है जन्नत की हकीकत
लेकिन खुश रहने के लिए ग़ालिब
ऐसे ख्याल भी अच्छे होते है.....
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