नेता पाला इस तरह बदल रहे है जैसे इस देश की जनता मुर्ख है!असल में नेता अनुमान लगाकर पार्टी बदल रहे है क़ि शायद उधर जाऊं तो कुर्सी बच जायेगी और भक्त समझ रहे है कि वो बड़े नेताजी उधर चले गए है तो उस पार्टी की जीत पक्की हो ही जायेगी! जरा सोचिए! लोकतंत्र में जब जनता अपना महत्व भूलकर नेताजी के पाला बदलने को ही सबकुछ समझने लगे तो हालात बहुत विकट होने लग जायेंगे।यह न इस देश के लिए शुभ संकेत है और न लोकतंत्र के लिए। चुनाव मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए लेकिन वादे हवा व् मुद्दे बोझ लगने लग जाते है तो लुटेरे नेताओं की फितरत जनता को उन्मादी आग में धकेलने की हो जाती है। पंजाब व यूपी में हार के डर से भारतीय जज्बाती पार्टी गरीबों के जज्बातों को मोहरा बनाने लग जाती है। नेताओं की अदला-बदली व् मीडिया के ओपिनियन पोल बुनियादी सवालों व् जवाबों को गर्त में डालकर आम जनता को एक बार और मुर्ख बनाने की कोशिश में लगे नजर आते है।आप पिछले एक महीने से रोज उछाले जाने वाले मुद्दों को दरकिनार करके सोचिये। लोगों को रोटी,कपडा,मकान, चिकित्सा व् शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता है। कुपोषण,भुखमरी,ठण्ड से सिकुड़कर मरते लोगों के जनाजे इस देश के मुंह पर रोज कालिख पोत रहे है लेकिन कोई राजनेता इस पर नहीं बोलेंगे। जब तक अपने मत का उपयोग न कर लो तब तक मीडिया चैनल को देखना छोड़ दो! अगर देखना चाहो तो उनके बोल निर्मल बाबा की कृपा से ज्यादा न समझे। खूब असली मुद्दों व समस्याओं से ध्यान भटकाने की कोशिश करेंगे लेकिन हमें मुद्दों पर ही जमे रहना है। निजी शिक्षण संस्थान जहाँ शिक्षा कम भविष्य की बर्बादी ज्यादा होती है!निजी अस्पताल जहाँ इलाज कम अर्थी सजाने का इंतजाम हरदम तैयार होता है। हर सरकारी खिड़की को सेवा करने वाली खिड़की के बजाय लूट के द्वार बनाने वाले लोगों को कतई माफ़ नहीं किया जाना चाहिए।
जो जितनी बड़ी हांकते है उनको उतना ही ज्यादा रगड़ो। शुरुआत राष्ट्रिय पार्टियों से करों। दोनों बड़े नागनाथ व् सांपनाथ का इलाज कर दो छोटे वाले जनता को सर्वोपरि समझने की आदत डाल लेंगे।जब इस देश के नेताओं ने सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी,सरकारी तंत्र ने सिद्धांतों को दफन कर दिया,जजों ने जमीर बेच दिया हो तो नैतिकता का जामा पहनकर घूमने का ठेका सिर्फ जनता ही क्यों ढोये? जिस दिन जनता अवसरवादी व् मौकापरस्त हो जायेगी उस दिन नेता-अफसर-जज सिद्धान्तवादी हो जायेंगे...
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