अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने विरोध-प्रदर्शन करना समाज के हर वर्ग का संवैधानिक अधिकार है।धारा 44 लगाने का वादा करने वाले लोग लोकतान्त्रिक मूल्यों की हत्या करते हुए हर जगह धारा 144लगाकर आंदोलन का दमन करना चाह रहे है।आज कहा जा रहा है कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी है तो आपने तीन दिन पहले ही राज्यों के गृह सचिवों को दिल्ली कूच रोकने का निर्देश व् अतिरिक्त अर्द्धसैनिक बल उपलब्ध करवाने की पेशकश कैसे की थी?क्या दिल्ली पुलिस बिना सरकार के निर्देश के किसी लोकतान्त्रिक प्रदर्शन को रोक सकती है?आज के इस सूचना के युग में अनजान व् इतना नासमझ कोई नागरिक नहीं होता।
आज आपको सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली की सड़कों पर से ट्रेक्टर हटाने की रुपरेखा पेश करने वाला निर्देश याद आ गया जबकि आज भी दिल्ली की सड़कों पर सैंकड़ों ट्रेक्टर बेलगाम दौड़ रहे है।ट्रेक्टर लेकर दिल्ली नहीं आ सकते!क्या माने?दिल्ली मर्सिडीज,BMW, फेरारी आदि गाड़ियां रखने वालों के लिए आरक्षित कर दी गई है!क्या अब इस देश के गरीब लोग अपने साधन से यात्रा नहीं कर सकेंगे?क्या देश की राजधानी से शुरू हुई यह मुहीम हर राज्य की राजधानी की तरफ रुख करने वाली है?क्या धीरे-धीरे अब गरीबों-दलितों-कमेरों को शहरों की सीमाओं से दूर करने की योजना पर काम शुरू हो गया है?क्या नये तरह के स्वर्णयुग का आगाज हो गया है?
क्या अब हर किसान को,जो जन्तर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहता है,अन्ना हजारे की तरह चार्टर्ड प्लेन से ही आने का विकल्प चुनना होगा?अगर सरकार ने शांतिपूर्वक किये जा रहे प्रदर्शन का दमन किया तो इस देश में लोकतंत्र दम तोड़ते हुए तानाशाही का चोला ओढ़ लेगा क्योंकि आगे से फिर सत्ता के खिलाफ कोई प्रदर्शन करने की हिम्मत नहीं जुटा पायेगा।यह सवाल सिर्फ जाट समाज का नहीं है बल्कि सवाल हर उस जागरूक सोच व् आवाज का है जो देश में सुधार चाहती है।जाट समाज सीमा पर ही जमावड़ा डालकर वो नमूना सरकार को पेश कर देगा जो सरकार ने कभी सोचा नहीं है।दिल्ली के अंदर दिल्ली के 20लाख जाट ही काफी है।अगर सरकार ने कुछ गड़बड़ करने की कोशिश की तो इस पूंजीवादी दौर में हर विक्रेता को यह अधिकार होता है कि कौनसी चीज कब व् किसको बेचीं जाए?
दिल्ली में घुसने से रोकने का इंतजाम तो सरकार कर सकती है लेकिन गाय-भैंस पालकर दिल्ली के हर घर तक दूध नहीं पहुंचा सकती।सरकार टैक्टर ट्रॉलियों के प्रवेश पर रोक तो लगा सकती है लेकिन खेतों को सींचकर सब्जियों से भरकर लोरियां दिल्ली के बाजारों तक नहीं ला सकती।सरकार ताकत के बल पर किसी के मुंह से निवाला तो छीन सकती है लेकिन धान-गेहूं पैदा करके किसी की थाली को गुलजार नहीं कर सकती।हर नागरिक-हर समाज का इस देश के निर्माण में अपना योगदान है व् अपने-अपने हिसाब से दे भी रहे है लेकिन सरकार ने दमन का रास्ता चुना तो हम भी 100% असहयोग का रास्ता चुन लेंगे।इससे देश को जो भी हानि होगी उसके लिए सिर्फ और सिर्फ हरियाणा व् केंद्र की सरकारें जिम्मेवार होगी।
जाट समाज का मकसद किसी भी नागरिक को परेशान करने का नहीं है।जाट समाज लोकतान्त्रिक तरीके से अपनी मांग चुनी गई सरकार के सामने रख रहा है।यह हर वर्ग का संवैधानिक अधिकार है।अगर सरकार ने तानाशाही रवैया अपनाकर लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन करने की कोशिश की तो गंभीर परिणाम सामने आएंगे।सभी किसान-कमेरे वर्ग से अपेक्षा है कि लोकतान्त्रिक मांग का समर्थन करेंगे व् एकजुट होकर लोकतंत्र का दामन बचाने में अपना योगदान देंगे।
सरकार डराने-धमकाने के नजरिये से बाहर आये व् खुद की लगाई आग को शांत करने में अपना योगदान दें
आज आपको सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली की सड़कों पर से ट्रेक्टर हटाने की रुपरेखा पेश करने वाला निर्देश याद आ गया जबकि आज भी दिल्ली की सड़कों पर सैंकड़ों ट्रेक्टर बेलगाम दौड़ रहे है।ट्रेक्टर लेकर दिल्ली नहीं आ सकते!क्या माने?दिल्ली मर्सिडीज,BMW, फेरारी आदि गाड़ियां रखने वालों के लिए आरक्षित कर दी गई है!क्या अब इस देश के गरीब लोग अपने साधन से यात्रा नहीं कर सकेंगे?क्या देश की राजधानी से शुरू हुई यह मुहीम हर राज्य की राजधानी की तरफ रुख करने वाली है?क्या धीरे-धीरे अब गरीबों-दलितों-कमेरों को शहरों की सीमाओं से दूर करने की योजना पर काम शुरू हो गया है?क्या नये तरह के स्वर्णयुग का आगाज हो गया है?
क्या अब हर किसान को,जो जन्तर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहता है,अन्ना हजारे की तरह चार्टर्ड प्लेन से ही आने का विकल्प चुनना होगा?अगर सरकार ने शांतिपूर्वक किये जा रहे प्रदर्शन का दमन किया तो इस देश में लोकतंत्र दम तोड़ते हुए तानाशाही का चोला ओढ़ लेगा क्योंकि आगे से फिर सत्ता के खिलाफ कोई प्रदर्शन करने की हिम्मत नहीं जुटा पायेगा।यह सवाल सिर्फ जाट समाज का नहीं है बल्कि सवाल हर उस जागरूक सोच व् आवाज का है जो देश में सुधार चाहती है।जाट समाज सीमा पर ही जमावड़ा डालकर वो नमूना सरकार को पेश कर देगा जो सरकार ने कभी सोचा नहीं है।दिल्ली के अंदर दिल्ली के 20लाख जाट ही काफी है।अगर सरकार ने कुछ गड़बड़ करने की कोशिश की तो इस पूंजीवादी दौर में हर विक्रेता को यह अधिकार होता है कि कौनसी चीज कब व् किसको बेचीं जाए?
दिल्ली में घुसने से रोकने का इंतजाम तो सरकार कर सकती है लेकिन गाय-भैंस पालकर दिल्ली के हर घर तक दूध नहीं पहुंचा सकती।सरकार टैक्टर ट्रॉलियों के प्रवेश पर रोक तो लगा सकती है लेकिन खेतों को सींचकर सब्जियों से भरकर लोरियां दिल्ली के बाजारों तक नहीं ला सकती।सरकार ताकत के बल पर किसी के मुंह से निवाला तो छीन सकती है लेकिन धान-गेहूं पैदा करके किसी की थाली को गुलजार नहीं कर सकती।हर नागरिक-हर समाज का इस देश के निर्माण में अपना योगदान है व् अपने-अपने हिसाब से दे भी रहे है लेकिन सरकार ने दमन का रास्ता चुना तो हम भी 100% असहयोग का रास्ता चुन लेंगे।इससे देश को जो भी हानि होगी उसके लिए सिर्फ और सिर्फ हरियाणा व् केंद्र की सरकारें जिम्मेवार होगी।
जाट समाज का मकसद किसी भी नागरिक को परेशान करने का नहीं है।जाट समाज लोकतान्त्रिक तरीके से अपनी मांग चुनी गई सरकार के सामने रख रहा है।यह हर वर्ग का संवैधानिक अधिकार है।अगर सरकार ने तानाशाही रवैया अपनाकर लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन करने की कोशिश की तो गंभीर परिणाम सामने आएंगे।सभी किसान-कमेरे वर्ग से अपेक्षा है कि लोकतान्त्रिक मांग का समर्थन करेंगे व् एकजुट होकर लोकतंत्र का दामन बचाने में अपना योगदान देंगे।
सरकार डराने-धमकाने के नजरिये से बाहर आये व् खुद की लगाई आग को शांत करने में अपना योगदान दें
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