क्षितिज चिलचिलाने लगा है। दोपहर होते ही तवे-सा दहकने लगेगा। देखो! हवाएँ भी गर्म हो चली हैं। कब से इंतजार कर रहा था, कितना समय लगा दिया। तुम्हारे आने में विलम्ब से ये दिल कुछ घबरा सा गया होगा। तुमको पता है थोड़ी देर पहले कितने-काले -काले बादल घिड़ आये थे,तुम्हारे आते ही न जाने कहा चले गए। कमबख्त कुछ फुहारे तो छोड़ जाता, खैर चलो तुम आ गए पता नहीं दिल में क्या -क्या ख्याल उठ रहे थे। अरे तुम कुछ बोलते ही नहीं। किस सोच में डूबे गए। चलो तुम कुछ मत कहो.....केवल सुनो.....हवाओं के स्वर, पंछियों के चहकने के स्वर ......प्रेम को जबान नहीं चाहिए। यह केवल बरसाती नदी का उफान नहीं है, यह गंभीरता से बहता वह सागर है जिसकी हर लहर को काटता, हर लहर को तराशता एक समर्पित मुकाम है जहाँ आकर फिर कहीं और जाने को रास्ते शेष नहीं बचते...इसी मुकाम से जिन्दगी अपने अर्थ खींच लाती है। जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो कभी कभी उसकी यादें हवा के झरोखों की तरह आपके मन में आ जाती है। प्रेम के चुम्बक में वे खिंचे चले जाते है। एक सौंधी-सी महक दोनों की साँसों में समा जाती है। जैसे तपती जमीन पर बादल की बूँदों के छींटे। उस ठंडे झौंके की छुअन, जो कभी हौले से आकर आपकी तन्हाई को तोड़ गई हो। या उस हथेली की गर्माहट जो अब नज़रों से बहुत दूर होकर भी जेहन में ताजा है। फूलो के चटकने और सुखी लकडियो के चटकने में अंतर तो होता ही होगा ।शायद तुम्हारे आने में विलम्ब से ये दिल कुछ घबरा सा गया होगा। चिंता नहीं बल्कि बिन तुम्हारे स्वयं को अधूरा सा समझता हूं। तुम रातरानी की महक सी हो ....जिसने मेरे जीवन का बगीचा गुलजार किया है। हमें ईश्वर ने मिलाया है तो कोई वजह जरूर होगी। बिना उसकी मर्जी के पत्ता भी नहीं खड़कता। प्रेम होने का सबसे बड़ा सबूत भावुक होना है न कि तर्कसंगत होना।तर्क आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है लेकिन भावुकता प्रेम को जिन्दा रखने का वाहन है। जिज्ञासु मन की दुनिया बड़ी आकर्षक होती है लेकिन उतनी ही खतरों से भरी और उतनी ही तकलीफ देने वाली भी। प्रेम का अद्भुत कोष थे कृष्ण। हद है कि रुक्मणी से मिलने आई राधा के प्रेम को आजमाने के लिए रुक्मणी राधा को गर्म-गर्म दूध पीने को देती है। दूध राधा पीती हैं और छाले कृष्णजी के हलक में पड़ जाते हैं.....ऐसा प्रेम तो आज तक सुना ही था। लेकिन मौन के साथ जब आप भँवर शून्य में ताकते हो तो ऐसा ही महसूस होता है। दरिया बहता है, नदियाँ मचलती हैं, झरने छलकते हैं, मौसम बदलते हैं, मेघ घिरते हैं, फूल मुस्काते हैं। यही प्रेम तो है जो भौंरों से गवाता है, तितलियों को नचाता है....शकुन्तला, कादम्बरी और शैक्सपियर के कुछ नाटकों की पुस्तकें मैनें बहुत सँभालकर रखी हुई थी। सोच कभी साथ मिलकर पढ़ेंगे। ।लेकिन आसमान में चमकने वाले सितारों को भी गर्दिश की धूल फांकने में देर नहीं लगती। जुगनुओं को कहाँ पता था कि सूरज की रोशनी में उनका क्या वजूद है। आज दिल पँखुड़ी-पँखुड़ी टूटा है। कितने दिन टिकेगा यह बरसाती नदी-सा प्यार जो आज मर्यादा की चट्टाने तोड़ बहा जा रहा है, भूल गया है अपने किनारे। कुछ जिद्दी लटें कान के पास जो उड़ रही है उसी भांति तुम इस दिल के मिलन को नहीं समझ सकती । मैं मानता हूँ कि लड़कियाँ अपने स्वभाव के अनुसार मन में प्रेम अंकुरित होते हुए भी मुँह से यही कहती हैं कि वे प्रेम नही करतीं, देखने की इच्छा होते हुए भी अनिच्छा प्रकट करती हैं, क्योंकि मुश्किल से प्राप्त वस्तुएँ बहुमूल्य होती हैं। राधा और कृष्ण को देखो, राधा तो बरसाने गाँव के वृषभानु की छबीली कन्या है लेकिन दूध दही बेचने नंद के गाँव मथुरा और वृंदावन तक जाती है। इन्हीं गलियों में मिल गए उसे कृष्ण। प्रथम मिलन में ही कृष्ण ने राधा का इंटरव्यू ले डाला-‘‘तुम कौन हो? किसकी बेटी हो? कहाँ रहती हो?’’ राधा चतुर थी.... कृष्ण के मन में उतर जाने वाले उत्तरों को उसने बड़ी चतुराई से कृष्ण से कहा। मोहित हो गए कृष्ण......अब आते-जाते ठीक उसी स्थान पर खड़े हो उसकी राह तकते......राधा आँख मिचौली खेलने के लिए बहुत बदनाम थी। वह उस राह से ऐसे गुजरती कि कृष्ण को न दिखे। कृष्ण की व्याकुलता देख वह परम आनन्दित होती। राधा के न मिलने पर कृष्ण ने उदास होकर यमुना तट की राह ली और कदम्ब के वृक्ष पर जा बैठे। यमुना के उस पार बरसाने गाँव था। वे उस ओर टकटकी लगाए मुरली बजाने लगे। पेड़ों के पीछे छुपी नटखट राधा अपनी सुध-बुध खो बैठी और कृष्ण की ओर दौड़ी आई। दोनों के हृदय में प्रेम के अंकुर फूट चुके थे। कृष्ण राधा के सौंदर्य और चतुराई के दीवाने हो गए और राधा.....उसने संपूर्ण पुरूष कृष्ण को अपना दीवाना बना लिया। छोड़ो जाने दो, हम कोनसे राधा कृष्ण हैं । फिलहाल तेज हवाओं में घर के परदे.....हलकी-फुलकी चीजें खड़खड़ा उठी। हलकी-हलकी बरसात शुरू हो गई और गरमी से झुलसी धरती से सौंधी महक उठने लगी। अब मन तुम सेे मिलने के लिए कसक उठा...बरसात की आवाज में मन का दर्द सिमट आया.....और बादलों के संग-संग नयनों ने भी बरसना शुरू कर दिया है। अब अदब की इच्छा है कि अगर जन्म लें पुष्प-जाति में खिलें एक ही डंठल पर , अगर जन्म लें पक्षी के रूप में बैठें संग-संग हर डाली पर , अगर उगें पौधों के रूप में लिपट जाऊँ बनकर लता। अगर थोड़ा सा गाना आता तो इस बरसात के साथ मैं भी तुम्हारे लिए अपनी तूमड़ी बजा रहा होता।
सुनील मोगा
सुनील मोगा

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