शिक्षा और मनोरंजन का भारतीय कलेवर

आज जो भी समाज विकसित,सभ्य व भाईचारे की भावना से आगे बढ़ रहे है उन्होंने विज्ञान आधारित कार्य व कारण के सिद्धांत को अपनी शिक्षा पद्धति का अहम किरदार बनाया है।शिक्षा फिल्म सीरियल कार्टून आदि में जेंडर विभेदीकरण नगण्य नजर आता है।पश्चिम की शिक्षा पद्धति व मनोरंजन के साधनों का भारतीय शिक्षा पद्धति व मनोरंजन तलाशते समाज का तुलनात्मक अध्ययन करते है तो बड़े गजब के परिणाम सामने आते है। बच्चा स्कूल में जाता हो या घर मे टीवी देखता हो,अगर हम उस पर नजर रखते है तो शिक्षा अर्जित करने का तरीका हो या मनोरंजन करने का माध्यम,एक अजीब सी कुंठा का शिकार होता है।रहस्य व चमत्कारों की अतिरंजित पौराणिक कथाओं से शुरू होकर विज्ञान की किताब पढ़ते हुए शाम होते-होते वापिस पौराणिक काल्पनिक नायकों को देखकर सो जाता है।

प्राथमिक स्कूलों से लेकर विश्विद्यालय स्तर तक,फिल्मों से लेकर टीवी सीरियल तक, कार्टून नेटवर्क से लेकर बड़े-बड़े नाटकों तक का तार्किक विश्लेषण करते है तो समझ मे आता है कि समाज कहाँ से चलकर किधर जा रहा है!मानव सभ्यता के विकास का सूचकांक मनोविज्ञान पर निर्भर करता है।संविधान निर्माताओं ने बड़ी दूरदृष्टि दिखाते हुए रोडमैप दिया था कि हम भारतीय समाज मे वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए कार्य करेंगे मगर बालाजी टेलीफिल्म के माध्यम से रामायण आई और अंकुरित होती वैज्ञानिक सोच को रौंद दिया। उसके बाद एक से बढ़कर एक पौराणिक नायकों पर आधारित सीरियल आते गए।भारत मे नब्बे के दशक तक जो भी फिल्में आई है उनमें ठाकुरों व जमींदारों को खलनायक दिखाया गया है व किसी गरीब को नायक दिखाया गया है मगर उस गरीब के संघर्ष में कोई वैज्ञानिकता का पुट,स्वतंत्र साहस,हौंसला दिखाने के बजाय किसी दैवीय चमत्कार से हासिल ऊर्जा से अपना नायकत्व साबित करता दिखाया गया है।

नब्बे के दशक के बाद वैश्वीकरण के दौर के साथ फिल्मों में थोड़ा बदलाव आया मगर ज्यादातर फिल्में पुरूष प्रधान नायकों के रूप में ही आती रही है।साथ मे सीरियल का कांसेप्ट आया और आधुनिक चमत्कारों से लैस संतोषी माता धमाकेदार एंट्री करती है और फिर प्राचीन मिथकों के नायकों को उठाकर नये-नये सीरियल्स की झड़ी सी लग जाती है।मूर्खताओं पर आधारित सीरियल के मिथक फिक्शन जितने प्राचीन होते जाते है उतने ही रोमांचपूर्ण व चमत्कारिक होते जाते है जैसे कल ही निर्मित हनुमान मंदिर के आगे तख्ती पर लिखे अति प्राचीन हनुमान मंदिर को देखकर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है। इन फिल्मों,टीवी सीरिअल्स में रातदिन मेहनत करके नवाचार करने वाले को नायक बनाने के बजाय मुंह से मंत्रों के साथ आग निकालकर भस्म करने वाले,पहाड़ लेकर उड़ने वाले,सूर्य निगलने वाले आदि को नायक के रूप में रोपित किया जाता है।आत्माएं एक औरत के अंदर घुसती है और सीरियल को इस तरह खिंचती है कि घर मे खाली बैठी महिलाओं की मनोदशा उसके पीछे खिंचती जाती है और घर से विज्ञान,तर्क,कार्य-कारण गायब होते जाते है।

बच्चा स्कूल पहुंचते ही सरस्वती माँ से हाथ जोड़कर शिक्षा का वरदान मांगता है,घर आकर छोटा भीम,बाल हनुमान के चमत्कार देखता है!शिक्षक बन गया तो स्कूल में हारमोनियम लेकर वरदानी भजन सिखाताहै,डॉक्टर बन गया तो हनुमान चालीसा का ऑडियो बजाकर आपरेशन शुरू करता है,वैज्ञानिक बन गया तो नारियल फोड़कर सेटेलाईट का बटन दबाता है!मतलब जीता विज्ञान को है और जपता कृपा व चमत्कारों को है!

विज्ञान व पौराणिक मिथकों का ऐसा घर्षण चलता है कि हर बार मूर्खता विजित होती प्रतीत होती है!यही कारण है कि इस देश मे विज्ञान आयातित है और चमत्कार प्रतिपादित!काल्पनिक पौराणिक साहित्यों के नायक व्यक्तिकेन्द्रित,आत्मकेंद्रित व स्वार्थ भरी सोच पैदा करते है और विज्ञान सामूहिकता,सर्व कल्याण,स्वतंत्र व मानवतावादी सोच पैदा करती है।पश्चिम का समाज मिथकों की धुंध हटाकर आगे निकल चुका है।वहां थ्रिल व रहस्यों के नाम पर साइंस फिक्शन बनते है तभी छोटे-छोटे बच्चे वैज्ञानिक नवाचार ले आते है और यहां चमत्कारिक पुष्पक विमान देखकर पैदल यात्राओं की भीड़ का हिस्सा बनते है। यहां स्कूल से लेकर फ़िल्म सीरियल,नाटक आदि के किरदार तय करते हुए इस बात का विशेष ख्याल रखा जाता है कि स्थापित मूर्खता अवैज्ञानिकता,पुरातन मूढ़ सदाचार,जाली नैतिकता की धारणा पर कोई प्रश्नचिन्ह खड़ा न हो जाये!अगर किरदार भाग्यवादी,चमत्कारों से लैस,मानसिक गुलामी का समर्थक हो तो उसे भारतीय समाज मे सुपरहिट के रूप में स्वीकार किया जाता है। हम शिक्षा पद्धति/नीति व मनोरंजन के साधनों पर ज्यादा गौर नहीं करते है इसलिए आयातित विज्ञान पर गुजारा करते है,विज्ञान से सुख-सुविधा हासिल करना चाहते है मगर मूर्खताओं को ढोते रहते है इसलिए विकास की गति धीमी रह जाती है।जीत सदा वैज्ञानिक सोच की ही होनी है मगरवैज्ञानिक खोजें पश्चिम में होगी!आज जो वैज्ञानिक खोज अमेरिका में हुई है उसको भारतीय समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में 100साल लग जाते है।इसलिए हमारे जैसे जाल में फंसे मानसिक गुलाम लोग कहते है कि यह सुविधा भविष्य में होगी मगर मेरे मरने के बाद क्योंकि हमें पता होता है कि हम कहाँ फंसे हुए है लेकिन जाल तोड़ने की साहस नहीं होता।एक जाल नहीं बल्कि कदम-कदम पर जाल का जंजाल है!
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