फांसी से पहले उन्होंने कहा था-मैं अपना जीवन एक ध्येय के लिए कुर्बान करने जा रहा हूं। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सांत्वना हो सकती है। ईश्वर में विश्वास करने वाला हिंदू पुर्नजन्म पर एक राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनंद की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिए पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किंतु मैं किस बात की आशा करूं। मैं जानता हूं कि जिस क्षण रस्सी का फंदा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख्ता हटेगा, वही पूर्ण विराम होगा। वही अंतिम क्षण होगा। बिना किसी स्वार्थ के, यहां या यहां के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतंत्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता।जब भी ये लगे हम हताश है तो भगतसिंह को पढ़ें.
शहीदे आजम के वकील आसफ अली ने 1949 में कहा- भगतसिंह से मैं कई बार मिला और मैने पाया कि वे एक भले और नेक इंसान हैं। आम आदमी तो यही सोचता है कि वो क्रातिकारी हैं तो खूंखार और कठोर होंगे। अभी तक मैं जितने भी युवकों से मिला, उनमें वह निश्चित ही सबसे बहादुर थे। एक बार भी उनका मनोबल नहीं टूटा। भगतसिंह बहुत सुंदर थे और स्वभाव में भी सबसे भले और स्नेही थे। क्रांतिकारियों के बारे में जनमानस के मन में बसी कठोर और खून के प्यासे वाली छवि के बिल्कुल विपरित थे वो। उम्र की अवस्था से कहीं अधिक, उनकी विलक्षण बुद्धि थी। अगर वो जीवित होते तो जीवन के किसी भी क्षेत्र में उनका सर्वश्रेष्ठ स्थान होता।
![]() |
| Add caption |

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें