विदेशी आंकड़ों के बीच देशी टापू!

जब भी चर्चा होती है बजट के बंटवारे की तो हम केंद्रीय बजट आवंटन की तुलना यूरोपियन देशों से करने लग जाते है।यूरोप के देश बेशक अपने बजट में शिक्षा व चिकित्सा को प्राथमिकता देते है मगर भारत मे भी एक ऐसा राज्य है जो पिछले 4 साल से कुल बजट का 26%शिक्षा पर व 20%चिकित्सा पर खर्च कर रहा है मगर कितने लोगों को इसकी जानकारी है?

आज दिल्ली में गरीब व मध्यम वर्ग के परिवार को 50%सस्ती बिजली मिल रही है।हर महीने 20हजार लीटर पानी मुफ्त में उपलब्ध करवाया जा रहा है।दिल्ली के मोहल्ला क्लिनिक देश के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से बेहतर सुविधा दे रहे है।

दिक्कत यह नहीं कि दिल्ली की सरकार क्या सुविधा दे रही है बल्कि दिक्कत यह है कि दिल्ली का सीएम जाति से लाला व डिप्टी सीएम जाति से राजपूत है!

असल दिक्कत है कि हमारे जितने भी जातीय व धार्मिक नेता हुए है उन्होंने बरगलाया तो जाति व धर्म के नाम पर मगर कार्य किया ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मजबूती देने के लिए,पूंजीवादी व्यवस्था को स्थापित करने के लिए।

जब तक अपने बुनियादी मुद्दों पर लड़ने वाले लोगों के पीछे खड़े नहीं होंगे तब तक जातीय व धार्मिक गधों के पीछे चलने वाली भेड़ बनकर ही बरबाद होते रहोगे!

जिसके पीछे तुम जातीय व धार्मिक प्रतिनिधित्व की बात करते हो उस शंका को दूर करने के लिए बता दूँ कि लोकसभा में 12%स्वर्ण कौम के लोगों का प्रतिनिधत्व 29%,65%ओबीसी का नेतृत्व 22%,14%मुसलमानों का नेतृत्व 4%है!

सामाजिक न्याय के मंच पर सबसे पीटा हुआ वर्ग ओबीसी है।65%आबादी मुर्दासन कर रही है इनके नेता एक बंगले,गाड़ी व अपने बच्चों के भविष्य के लिए पूरे ओबीसी वर्ग को बेच दिया है दलालों के अड्डों पर!

जब अपने लोगों ने ही हमारे हकों की लड़ाई का सौदा कर लिया,अपने समाज के नेताओं ने पूरे समाज के बच्चों की बलि पर अपने बच्चों का भविष्य संवारने का रास्ता अख्तियार कर लिया,जब हमारे धर्म के लोगों ने धार्मिक आस्था को ठेंगे पर रखकर अपनी पूंजी के प्रति आस्था जता दी तो क्या फर्क पड़ता है हम समाज के गरीबों,धर्म के गरीबों के लिए कि हमारे बच्चों की शिक्षा की उचित व्यवस्था करने वाले की जाती क्या है,धर्म क्या है?

क्या फर्क पड़ता है कि परिवार में बीमार लोगों के लिए उचित चिकित्सा व्यवस्था करने वाले की जाती क्या है या धर्म क्या है?क्या फर्क पड़ता है कि 50%सस्ती बिजली देने वाले व मुफ्त पानी देने वाले की जाति या धर्म क्या है?

जब हमारे अपने ही बेगाने हो गए तो राहत जो दें उनको क्यों न सम्मान दें?

ऐसा एक भारतीय संघ का कोई राज्य बता दो जिसने विभिन्न जातीय-धार्मिक नेताओं की सरकारों में शिक्षा पर 26%व चिकित्सा पर 20%खर्च किया हो!

दिल्ली देश की राजधानी व सबसे बड़ा मेट्रो शहर है मगर तुलना करके बताइए कि इससे सस्ती बिजली कौनसी पार्टी,किस जातीय,किस धार्मिक नेता की सरकार ने अब तक उपलब्ध करवाई है?

देश के भीतर तुलना करो,बुनियादी मुद्दों पर चर्चा करो।सामाजिक न्याय एक अलग मुद्दा है और नागरिक के तौर पर चुनाव की प्रक्रिया अलग मुद्दा है।

जब सामाजिक न्याय के तमाम पुरौधा,तमाम जातीय व धार्मिक नेता कुर्सी के कीड़े बन गए हो और नए नेता तैयार कर पाने में असफल महसूस कर रहे हो तो जाति-धर्म को किनारे रखकर बुनियादी जरूरतों पर कार्य करने वाले लोगों के साथ खड़े हो जाइए!

लोकतंत्र का अंतिम टापू,गरीबों की उम्मीदों का अंतिम टापू बस दिल्ली में बचा है,तानाशाहों की नाक के नीचे का टापू है।सब अपनी मति मरेंगे मगर दिल्ली का टापू देश की मति से मरेगा!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts