जागृतिकाल के मसीहा कबीर.....

  15वीं शताब्दी में धार्मिक-सामाजिक ताने बाने में एक अजीब से परिवर्तन देखा गया था।एक तरफ ब्राह्मणधर्म की जकड़न से छुटकारे का उचित अवसर नजर आ रहा था तो दुसरीं तरफ इस्लामिक कट्टरता अपने पैर जमा रही थी।इस धार्मिक संक्रमण का सामाजिक व्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा था।इसी बीच इस्लामिक कट्टरता के विरोध में सूफी परंपरा के फकीर खड़े हुए तो ब्राह्मण धर्म की कट्टरता का पिंड छुड़ाने के लिए संत परंपरा के लोग आगे आये।ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती,निजामुद्दीन औलिया रैदास,दादू,दरियाव,नानक आदि लोग बगावत का बीड़ा उठा रहे थे लेकिन एक नाम ऐसा था जिसकी जाति व धर्म को लेकर किसी को कोई जानकारी नहीं थी।बाकी लोग अपने नजदीकी धर्म की कट्टरता,पाखंड के खिलाफ बोल रहे थे लेकिन एक नाम ऐसा था जो दोनों तत्कालीन मुख्य धर्मों अर्थात ब्राह्मण व इस्लाम के पाखंडों के खिलाफ पूरे उत्तर भारत मे घूम-घूमकर जनता को जागृत कर रहा था।वो नाम था कबीर।

मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने एक साखी कही...

पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।
वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार।।

इस्लाम के पाखंड के बारे में कहते है.....

कंकर-पत्थर जोरि के  मस्जिद लई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे का बहरा भया खुदाय!

    दोनों धर्मों की कट्टरता व पाखंड के खिलाफ इस तरह खुलकर बोलने वाला उस काल मे कोई नहीं था।

कबीरदास जी खुद अनपढ़ थे।उन्होंने खुद कहा है "मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।'' उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया।कबीर के शिष्यों ने इनको बीजक के रूप में संकलित कर लिया।इनके तीन भाग है।
1.साखी -इसमें कबीरदास के धर्म के बारे में कहे दर्शन अर्थात धर्मोउपदेशों को दोहों के रूप में लिखा गया है।
2.सबद - यह गेय है अर्थात संगीत के रूप में गाकर लोगों को जागृत करने के लिए उपयोग में लिए जाते रहे है।हेली व हंस के रूप में गाये हुए संगीत घर-घर तक पहुंच गए।
3.रमैनी- इसमें कबीरदास जी द्वारा कहे गए धार्मिक रहस्यों व दार्शनिक विचारों का संकलन  चौपाईयों के रूप में किया गया है।

        कबीरा खड़ा बाजार में,सबकी मांगे खैर!
ना कहूँ से दोस्ती,ना कहूँ से वैर!!
कबीरदास जी ने कहा था कि सत्य के मार्ग पर चलने के लिए किसी से अति वैर या अति दोस्ती का भाव भी ठीक नहीं है।ऐसी दोस्ती किस काम की जिसमे दोस्त के अपराध को,गलतियों को,झूठ को छिपाने के लिए खुद को झूठ बोलना पड़े।कबीर वैराग्य भाव वाला व्यक्तित्व था।राम नाम के प्रेम में दुनियाँ के जाल से विरक्त हो गए।कबीर का राम निर्गुण राम है,एकेश्वरवादी राम है,हर जगह व्याप्त राम है,घट-घट में राम है,कण-कण में राम है वो ही हमारा अभिवादन वाला राम-राम है।मंदिर-मस्जिद से परे खुद के अंदर,खुद के कृत्यों में समाहित,खुद के भावों में घुला प्रेम का प्रतीक राम ही कबीर का राम है और वो ही हमारा राम है।कबीर का राम नदी का पानी है।पानी मे कोई भेद नहीं है,नदी किसी से भेद नहीं करती बस पानी लेने वाले बर्तनों में भेद है।एक घड़ा भरकर मंदिर में ले जाकर पवित्र बना दिया गया तो दूसरा महतर के घर रखने से अपवित्र करार दिया गया।

          आजकल जो गौरक्षक बनकर स्ट्रीट जस्टिस करने वाले गुंडे है उनके लिए भी कबीरदास जी  ने उस समय बड़ी खूबसूरती के साथ लिखा है...

कबीरा तेरी झोम्पडी, गल कटियन के पास!
करेगा सो भरेगा,तूँ क्यों भयो उदास!!

     अगर भगवान को मानते हो,उन पर तुम्हे भरोसा है,तुम्हारा धर्म सत्य पर आधारित है तो डर किस बात का?चिंता किस बात की?शायद तुम्हारा भरोसा न भगवान में है न तुम्हारे धर्म मे!स्वरचित पाखंड व अंधविश्वास के अपराधों पर पर्दा डाले रखने के लिए तुम लोग नरभक्षी जानवरों जैसा काम करते हो!

     धर्म परिवर्तन करने वाले या अन्य नये धर्म में शामिल होने को लालायित लोगों के बारे में कबीरदास जी लिखते है.....

बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।'

   एक धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म मे जाने वाले लोग उस हाथी की तरह होता है जो जंगल को छोड़कर भाग गया लेकिन जंगल किनारे बहरूपिये द्वारा खोदे गए गड्डे में जा गिरा हो और अब अपनी व्यथा किससे कहें!

हिन्दू कहे मोहे राम प्यारा, मुसलमान कहे रहमाना!
आपस मे दौउँ लड़ि-लड़ि मरे,मरहम कोउ न जाना!!

          आजकल धर्म के नाम पर जो भी दंगे फसाद हो रहे है या जो लोग कर रहे है उनका न राम से कोई प्रेम है न रहमान से कोई प्रेम है!इनको सिर्फ और सिर्फ पाखंड के फलक पर खुद की पहचान से मतलब है।

        अगर धार्मिक पाखंड को समझना है तो कबीर को पढ़िए।अगर धार्मिक धंधे को समझना है तो कबीर को पढ़िए।सब कुछ समझ मे आ जायेगा।बड़ी विडंबना है कि जिस कबीर ने कभी अपना स्थायी ठिकाना नहीं बनाया उसके अनुयायी बड़े-बड़े कबीर आश्रम बनाकर खुद कबीर की भगवान के रूप में पूजा कर रहे है!कहते है कि किसी के विचारों की हत्या करनी हो तो उसको भगवान घोषित कर दो।कबीर आश्रमों में तंत्र,झाड़ फूंक आदि का इलाज हो रहा है!स्वर्ग-नरक के रास्ते तय हो रहे है जबकि यह कहा जाता था कि जिसकी मौत काशी में होती है वो स्वर्ग जाता है और मगहर में मरने वाला नरक में जाता है और इसी को चुनौती देते हुए कबीर अंत समय मे जाकर मगहर में रहे और उनकी वहीं मौत हुई।

       सबसे मजे की बात तो यह है कि "पत्थर पूजे हरि मिले तो मैँ पूजूँ पहाड़"गुनगुनाते हुए लोग गांव-गांव मंदिर बनाने के लिए चंदा एकत्रित करते हुए देखे जा सकते है।कुछ काम तो जागृतिकाल के प्रभाव को कम करने के लिए उतारे गए तुलसी,सूरदास जैसे भक्तिकाल के पाखंडियों ने पूरा कर दिया और बचा-खुचा काम कबीरदास के अनुयायियों ने खुद ही निपटा दिया!भारतीय खून हजारों सालों की मानसिक गुलामी में इतना जम चुका है कि जो भी महानायक समझाने निकलता है उसकी प्रशंसा तो खूब करता है लेकिन उनके विचारों से खून में बगावत करने की हिम्मत नहीं जुटाता!कबीर,नानक, ओशो आते रहेंगे लेकिन यह मुर्दो का देश है कपड़े झाड़कर उठने की ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए।हमने रैदास को मारा, कबीर को मारा, नानक को मारा, धन्ना को मारा, ओशो को मारा और आगे कोई और आएगा तो उसे भी मार डालेंगे!हमे जीने में नहीं मारने में मजा आता है!

कबीरदास जी की जयंती पर नमन करता हूँ।उनके हौंसले व हिम्मत को सलाम करता हूँ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts