दुनियाँ में जितने भी धर्मों का उदय हुआ उनका उद्देश्य मानव जीवन को सरल बनाने के लिए हुआ था मगर धर्म के ठेकेदारों ने इन्हें जटिल बना दिया।मानवीय प्रवृति होती है जटिलता से सरलता की तरफ गमन करना।मानव चाहता है सरलता की तरफ चले मगर धर्म के ठेकेदारों में होड़ मची है जटिलता की तरफ ले जाने की।
आज हर धर्म का धर्मगुरु धर्म की नहीं,धर्म के पहचान की लड़ाई लड़ रहा है।हर धर्म आज खतरे में नजर आ रहा है।धर्म को खतरे में बताकर धर्मवाद पैदा किया जा रहा है और धर्मवाद ही धर्म के पहचान की लड़ाई का आधार है।
इस पहचान की लड़ाई में,इस धर्मवाद में गरीब इंसान लुटता है,पिटता है और मरता है।धार्मिक ठेकेदारों की इतनी हैसियत नहीं कि वो अमीरों के गिरेबां में हाथ डाल दें क्योंकि अमीर लोग शारीरिक परिश्रम के सबसे बड़े शोषक होते है।आर्थिक शोषण को जायज बताने,बनाये रखने के लिए धार्मिक शोषकों का सहयोग करना अनिवार्य हो जाता है।मेहनतकश वर्ग को बरगलाए रखने के लिए धार्मिक शोषक,आर्थिक शोषक व राजनैतिक शोषकों का आपसी गठजोड़ होता है।
अगर मानव को जीवन मे सुख,समृद्धि व शांति प्राप्ति करनी है तो सबसे पहले इस धर्मवाद की लड़ाई से खुद को अलग करना होगा।हिन्दूवादी,इस्लामवादी,इसाईवादी की लड़ाई को छोड़कर मानववादी बनना होगा।आज धर्म के ठेकेदार मानव को गिद्धों की तरह नोच रहे है मगर धर्म के प्रति पूर्वाग्रहों व पैतृक संस्कारों का ऐसा जाल बुन दिया गया है कि इसमें उलझकर बर्बाद होने वाले को अहसास तक नहीं हो पा रहा है कि दुःखी क्यों है?खुद को परिमार्जित करना होगा।तमाम जटिल मूढ़ताओं की चादर हटानी होगी।
एक मेरा जानकर है।उसके बच्चे ने मेरे से संपर्क किया कि कोचिंग करने के लिए पैसे नहीं है।तीसरे दिन उसी घर से खबर आई कि उसके घर रात्रि जागरण है।एक रात्रि जागरण का खर्चा 30-35हजार तो आता ही होगा!मजे की बात यह है कि उसके घर रात्रि जागरण हर साल होती है मगर बच्चे की 30हजार कोचिंग की फीस भरने के पैसे नहीं है!
उसको जाल में उलझा दिया गया है,उसको फर्जी संस्कारों से लबरेज कर दिया गया है,धार्मिक पूर्वाग्रहों में फंसा दिया गया है!अगले जन्म के नाम पर,स्वर्ग के नाम पर!धार्मिक ठेकेदार खुद मरेगा तो कहां जायेगा अता-पता नहीं मगर मेहनतकश लोगों की पूंजी लूटने के लिए सबको स्वर्ग में भेजने की व्यवस्था जरूर रखता है!
जब भी कोई धार्मिक लूट के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसको अधार्मिक करार दिया जाता है।समाज को इतना पूर्वाग्रहों से ग्रसित बना दिया गया है अधार्मिक होने का मतलब हो गया है कि वो समाज मे जिंदा रहने लायक ही नहीं है!धर्मवाद की जंग में फंसाकर उसकी आवाज दबा दी जाती है।
धर्म कहीं पीछे छूट गया है और धर्म के ठेकेदारों ने इंसान को पाखंड व अंधविश्वास में उलझा दिया है मृत जानवरों की तरह नोच-नोचकर खा रहे है।मै इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ।सब धर्मों का इतिहास अच्छे से पढ़ा है।सब धर्मों में अच्छाइयां व समयकाल के हिसाब से सुधार न करने के कारण सब धर्मों में बुराइयां पैदा हो गई है।
धर्म के ठेकेदार धर्म सुधार के बजाय पैदा हुई जटिलताओं को बनाये रखने पर आमादा है!उनको डर है कि कहीं सुधार की बात उठी और उससे कहीं उसकी लूट पर पाबंदी न लग जाएं!लूट को बनाये रखने के लिए ठेकेदार कभी धर्मों का सरलीकरण नहीं करेंगे इसलिए कुम्भाराम जी आर्य ने कहा था कि वर्ग चेतना जरूरी है।जब तक शारीरिक श्रम करने वाले अर्थात किसान-मजदूर नहीं जागेंगे तब तक उनके जीवन मे सुख,शांति समृद्धि आना संभव नहीं और उसके लिए मानव को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ विधा अर्थात बुद्धि का उपयोग करना पड़ेगा।
धर्मवाद की जंग से छुटकारे का अंतिम उपाय यही है कि जब आप बाजार जाते हो तो हजारों वस्तुओं के बीच से अपनी जरूरत की चंद वस्तुएं खरीदकर लौटते हो उसी तरह हर धर्म की अच्छी बातों को ग्रहण कर लो।धर्मवादी बनने के बजाय मानववादी बनो।
धर्म लेने का विधान नहीं है।धर्म देने का विधान है। धर्म के नाम पर दान-पुण्य की प्रथा धार्मिक ठेकेदारों का षड्यंत्र है।किसी भी स्वरूप में अगर धर्म के नाम पर मेहनतकश लोगों से कोई लेता है तो धार्मिक अपराध है।किसी भी धर्म ग्रंथ में पंडे-मौलवियों,पादरियों को दान देने का उल्लेख नहीं है।सब धर्मों में दीनहीन अर्थात गरीबों की मदद का उल्लेख है और यही मानववाद है।
प्रेमाराम सियाग
(नोट-वीडियो सांकेतिक है।किसी जाति,धर्म या समुदाय को ठेस पहुंचाना मेरा उद्देश्य नहीं है)
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