अक्सर जब भी सड़क पर कोई दुर्घटना होती है तो भीड़ जुटते हमने देखा है।जब अपने परिवार का हो तो मजबूरी में हमारी मानवीय संवेदना जागती है बाकी हम तमाशबीन भीड़ होते है।
सड़क दुर्घटनाओं में बढ़ती मौतों के आंकड़े को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि घायल को अस्पताल पहुंचाने वाला चाहे तो अपनी पहचान बता सकता है बाकी न अस्पताल प्रबंधन और न पुलिस उसको पहचान बताने को मजबूर कर सकती है।किसी भी कानूनी कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।
दरअसल हमारी मानसिकता यह है कि कोई दुर्घटना हो गई तो पुलिस आयेगी, एम्बुलेंस बुलाकर इलाज करवा देगी!सोशल मीडिया व एंड्राइड फ़ोन ने और भी हमारी संवेदना का क्षरण कर दिया है।पहले तो हम मूकदर्शक बने रहते थे मगर अब तड़पते इंसानों का वीडियो बनाते है फिर दोस्त-रिश्तेदारों को भेजते है सनसनी के रूप में!हमारे साथ-साथ जो घर मे बैठे है उनकी संवेदनाओं का भी ऐसी घटनाओं के प्रति समान्यकरण कर देते है।
हर बात पर पुलिस को दोष देने वाला समाज खुद के गिरेबां में कब झांकेगा?हमारे देश की जनसंख्या व क्षेत्रफल को देखते हुए अभी तक ऐसी घटनाओं के लिए त्वरित मेकैनिज्म हम खड़ा नहीं कर पाए है मगर क्या हम तब तक तड़पते इंसानों को यूं मरने देंगे?
ऐसा एक नजारा कल सीकर-बीकानेर बाईपास पर नजर आया।बीकानेर का भोजराज बाइक पर जा रहा था और अनियंत्रित कार ने टक्कर मार दी।भोजराज तड़प रहा था मगर लोग तमाशबीन बनकर खड़े थे।तभी एएसपी मान्यवर नितेश जी आर्य वहां से गुजर रहे थे।घायल को अपनी गाड़ी से अस्पताल ले गए।वो निजी काम से सीकर गए हुए थे व अपने परिवार के साथ थे।
सदा पुलिस व प्रशासन में कमियां ढूंढने के बजाय हमे मान्यवर नितेश जी आर्य से सीख लेनी चाहिए।इंसान कहीं पर भी हो,किसी मकसद से हो मगर मानवीय संवेदना सदा जिंदा रहनी चाहिए।
डीडवाना एएसपी नितेश जी आर्य को महान सलाम।आप जैसे इंसानों से ही देश-समाज प्रेरणा लेता है और उसी से मानवता आगे बढ़ती है।
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