शाम को मैने 15सवाल सामने इसलिए रखे ताकि पता तो चले कि जो राजनैतिक-सामाजिक लड़ाई चल रही है वो कहाँ खड़ी है?इन तमाम सवालों से जो सच्चाई मुझे पता चली है वो आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।
पहली बात तो साफ जाहिर है कि अब जातीय गोलबंदी के दिन लद चुके है।एक जाट एकता,राजपूत एकता,गुर्जर एकता,पटेल एकता,मीणा एकता या अन्य किसी भी जातीय एकता की बातें करना बेमानी है।चाहे सामाजिक हको के लिए लड़ना हो या अपराधियों से इंसाफ के लिए जातीय गोलबंदी का कोई महत्व नहीं है सिर्फ अपने-अपने समाज को बरगलाने या बर्बाद करने के।
दूसरी बात ओबीसी वर्ग की जितनी भी जातियाँ यथा जाट,पटेल,गुर्जर,यादव,कुर्मी,कापू,लिंगायत आदि आरक्षण प्राप्त करने या आरक्षण बंचाने की लड़ाई लड़ रही है उनका कोई महत्व नहीं है।अब लड़ाई लड़नी है तो सबको एकजुट होकर जनसंख्या के हिसाब से 65%आरक्षण की लड़ाई लड़नी होगी।
तीसरी बात जो जातीय सम्मेलन,सभा आदि हो रहे है वो सिर्फ कुछ लोगों को लाइमलाइट में लाने के हथियार तो बन सकते है मगर सामाजिक परिवर्तन में इनकी कोई भूमिका नहीं रहती है और न भविष्य में इनका कोई महत्व रहेगा।
बात राजनैतिक तौर पर करे तो मुझे यह समझ मे आया कि पहली पंक्ति के नेताओं के जाते ही दूसरी पीढ़ी के नेता जो जेपी,लोहिया,चौधरी चरणसिंह तैयार हुए थे उनके अनुयायियों ने राजनीति में सामाजिक न्याय का जो शुरुआती रुझान दिखाया था वो धीरे-धीरे खुद ही समाप्त कर दिया।
पहली बात तो यह है कि अब राज्यवार तीसरे विकल्प या क्षेत्रीय पार्टियों के दिन लद गए है।जब तक राज्य से बाहर निकलकर देशभर के नेता 1977की तरह एकजुट नहीं होते है तो धीरे-धीरे ये दल खत्म हो जाएंगे।
उत्तर भारत की सारी क्षेत्रीय पार्टियां संकट में है और समर्थक भी निराश है,मनोबल टूट चुका है और टीडीपी के नेताओं का बीजेपी में शामिल होना यह साबित करता है कि संकट दक्षिण भारत की तरफ भी बढ़ रहा है।
भारत मे लोकतंत्र के इन क्षेत्रिय टापुओं का इस तरह डूबना सामाजिक न्याय के लिए गंभीर संकट की तरफ इशारा कर रहा है।भारत द्विदलीय व्यवस्था को अपनाने की हालत में नहीं है और जिस तरह की वर्तमान सत्ता व सिस्टम है वो करोड़ों लोगों की उम्मीदों को पूर्ण करने के काबिल नहीं है।यहां तो दूसरी मुख्य पार्टी ही गंभीर संकट में है तो ऐसे में इन क्षेत्रीय दलों का खत्म होना एक पार्टी शासन यानि तानाशाही स्थापित होने जैसा है।
मुझे लगता है कि अब अगर लड़ाई के मैदान में डटे रहना है तो दो विकल्प है।पहला विकल्प है 85%लोगों की गोलबंदी करके सत्ता की तरफ कुछ करना व दूसरा विकल्प है गरीब वर्ग बनाम अमीर वर्ग की लड़ाई शुरू करना।भारत सामाजिक भेदभाव,असमानता आदि में इतना उलझा हुआ है कि गरीब बनाम अमीर की लड़ाई के लिए वो आधार तैयार नहीं जिसके बल पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ी जा सके।बहुजन राजनीति की गोलबंदी के लिए काफी हद तक आमजन तैयार हो चुके है मगर बहुजन समाज के वर्तमान नेताओं का बोरिया-बिस्तर समेटकर ही लड़ाई का आगाज हो सकता है बाकी मुमकिन नहीं।
अंत मे आरएलपी व उनके समर्थकों से निवेदन है कि नए-नए अब्दुल्ला बने हो तो भाग-भाग कर घुटनों के बल बैठने से नमाज अदा नहीं होती है!सकारात्मक सोच,सभ्य भाषा,सवालों को झेलने की क्षमता,आलोचना को सहन करने की कुव्वत पैदा करनी होगी।आप लोगों में जोश है,कुछ कर गुजरने का माद्दा है,आपके नेता ने आपका मनोबल अभी तक बरकरार रखा है इसका सदुपयोग करो।इसी तरह चलते रहे तो गठबंधन तो हो चुका है और आपके कृत्य विलीन करने को मजबूर न कर दें।हम तो वैचारिक आलोचक है और सबकी कमियों पर लिखते है।एक तरह से आपके ट्रेनर है।70%सुधार हुआ है और बाकी 30%करने की तरफ सोचो।
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